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[मृदुला सिन्हा]। खगोल वैज्ञानिकों के लिए सूर्य सबसे बड़ा ग्रह है। सारे ग्रह नक्षत्र इसकी परिक्रमा करते हैं, मगर लोक मानस पर सूर्य भी एक व्यक्ति है। उनके भी रिश्ते-नाते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश से लेकर सारा देश ही नहीं फिजी, गुयाना, मॉरिशस और अमेरिका, इंग्लैंड (जहां-जहां बिहारी गए) में छठ पूजा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।

कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले व्रत की बड़ी महिमा है। इस अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत बहुत कुछ कहते हैं। इन लोक त्योहारों पर गाए जाने वाले गीतों में सूर्य चंद्रमा से भी मनुष्य के वार्तालाप का वर्णन है। सूर्य, चंद्रमा, तारा, नदी पर्वत, पेड़, पौधों से बात होती रही है। सूर्य प्रतीक है समदर्शिता का। लोकमंगल का। वह अपनी रोशनी फैलाने में भेदभाव नहीं बरतता। उसके लिए धनी-गरीब सब बराबर हैं, परंतु उसकी दयादृष्टि अभावग्रस्त और सभी दृष्टि से पिछड़े लोगों पर ही अधिक रहती है।

बिहार में कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को नदी किनारे जल में खड़े होकर सूर्य की पूजा की जाती है। यह पूजा डूबते और उगते सूर्य की होती है। यह भी अपने आपमें अनोखी धारणा और विधान है। निस्तेज की पूजा कोई नहीं करता, परंतु जो सबको तेज देने वाला है, वह भी प्रतिशाम तेजहीन होता है और लोक परंपरा में उसकी भी आराधना होती है। निश्चय ही इस आशा के साथ कि फिर उसका तेज लौटेगा। छठ व्रत के एक गीत की पंक्तियां हैं...

व्रती

आज सूरजदेव जल्दी डूबली

सांझ भइल सूरज रहब रउरा कहवां

सूर्यदेवरहे

के रहबो नवीन बाबू के अंगना

गाय के गोबर नीपल हई जहमां

गाय के दूध स्नान भेल उहमां

गाय के घीव हवन भेल उहमां

पिअर धोती पहिरन भेल उहमां

अर्घ देने के ढेर सारे सामान जुटाते व्रती महिला व पुरुष को यह अनुभूति होती है कि उस दिन सूर्य जल्दी डूब गए। उन्हें यह भी चिंता है कि सांझ हो गई है तो सूरज कहां रहेंगे। वे व्रती परिवार में सूरज को विलमाने की कल्पना कर लेते हैं। सूर्य से सब कुछ मांगा जाता है। अन्न, धन, स्वस्थ काया, बेटा- बेटी। मनुष्य जीवन में कोई न कोई अभाव रहता ही है। सूरज की आराधना करते हुए व्यक्ति अपनी जरूरतों की पूर्ति चाहता है। परंतु इन लोकगीतों में सूरज की आराधना में सामाजिक जीवन के भेदभाव परिलक्षित नहीं हैं। समाज जीवन को सहज सुंदर और सुगम बनाने के लिए विभिन्न जातियों में बांटा गया। सभी जातियों के कर्तव्य और विशेषताएं निर्धारित की गईं। छठ पूजा में सूर्य देवता की आराधना किसी एक जाति के भी योगदान के बिना संभव नहीं हो सकती।

दीनानाथकथी

केरा नैया रे मलहा, कथिए करूआर

कथी लदनिया मलहा, तोहर नौका भांसल जाए।

मल्लाह-

सोना के नैया हे दीनानाथ, रूपा करूआर

केला लदनिया हे दीनानाथ नैया भांसल जाए।

हाली हाली खेबहि रे मलहा अरग केरा बेर।

इस प्रकार सभी जातियों के प्रतिनिधि के साथ सूर्य का वार्तालाप होता है, क्योंकि सूर्य पूजा में सभी जातियों की जरूरत पड़ती है। सबका व्यवसाय बढ़ जाता है। सूर्य को अर्घ देने वाले सूप में सारे सामान भरे जाते हैं। एक गीत में व्रती बांझ महिला सूर्यदेव से संतान मांगती है। बांझ होने के कारण अपने सामने सामाजिक जीवन जीने में आई कठिनाइयों का वर्णन करती है।

व्रती महिला-

गोबर मांगे गेली हे दीनानाथ गैया के बथान

गैया चरवाहा हे दीनानाथ लेले लुलुआए

दूरी तुहू जाही गे बाझिन छोड़ ही बथान

तोरो परछहिंया गे बाझिन गैया होयत बांझ।

बांझिन विलाप करती है कि वह सूर्य आराधना की वस्तुओं के लिए सभी जातियों के दरवाजे पर जाती है, परंतु वे उसे दुत्कारते हैं। उसकी परछाईं से पेड़, पौधे, फूल, पत्ती, जानवरों और अपने घर की महिलाओं के बांझ होने का अपना भय दिखाते हैं। सूर्यदेव उसकी पूजा से प्रसन्न होते हैं और पुत्र रत्न प्राप्त करने का आशीष देते हैं। व्यक्ति जीवन में अभाव के कारण सामाजिक समरसता छिन्न-भिन्न होने की स्थिति में सूर्यदेव द्वारा अभावपूर्ति के विधान की पुष्टि होती है।

सूरज की किरणें अर्घ दे रहे सभी सूपों और डालाओं पर एक ताप से पड़ती हैं। किरणों में भेदभाव नहीं है। राज्यसत्ता और कल्याणकारी संस्थाओं के लिए सूर्य का समरस व्यवहार मूल्य स्थापना करता है। राज्य व्यवस्था को भी सूर्य की भांति अभावग्रस्त व्यक्ति की जरूरतों की पूर्ति करने वाला होना चाहिए। वंचित पीड़ितों की वाणी को सुनना और तदनुकूल संवेदनापूर्ण हृदय से उसकी सहायता करना। छठ पूजा में सूर्यदेव का भय दिखाकर मनुष्य जीवन में आचार संहिता भी निर्धारित की जाती है। एक गीत में सूर्य देव और व्रती महिला में वार्तालाप होता है।

सूर्य के आशीष से संतान प्राप्ति पर वह कहती है-

व्रतीदेवे

के देलि अई हे दीनानाथ

छीनी जनी लिऊ

बांझी पद छोड़वली हे दीनानाथ

मरोंछी जनी दीऊ

दीनानाथदेवे

के देलीअऊ गे अबला

गर्व जनी बोल

गर्व से बोलवे गे बांझिन

उहो लेबऊ छीन।

अर्थात अन्न, धन, लक्ष्मी और संतान पाकर कभी गुमान नहीं करना चाहिए। अहंकार होने पर ये सारी चीजें पुन: हाथ से चली जाती हैं। इस गीत के माध्यम से यह भी लोक शिक्षण होता है कि सूर्य ही जीवनीशक्ति है। उसकी किरणों में जीवन और असूर्यमयश्य होना ही मृत्यु है। जीवन और मृत्यु का यह राज साधारण मनुष्यों को भी लोकगीत के माध्यम से बताया जाता रहा है। इन गीतों की एक और विशेषता रही है। अपने समाज में किसी भी जाति व धर्म की महिलाएं सदियों से सामाजिक अधिकारों से वंचित रही हैं।

परिवार व समाज में उन्हें पुरुष के बराबर अधिकार नहीं मिले। विकास के अवसर नहीं मिले। खेतिहर परिवारों के मुखिया पुरुष होते आए हैं। महिलाएं घर या बाहर निर्णय की प्रक्रिया में पुरुष से कहीं पिछड़ी रही हैं। बोलचाल और लिखित संदर्भ में भी महिला (जाति) को भी हरिजनों और पिछड़ों के आसपास ही रखने की परिपाटी है, परंतु छठ व्रत के गीतों में महिला ही सूर्य से वार्तालाप करती है। अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने, संपन्न व सुखी बनाने की कामना करती है। पुरुष गौण है।

एक गीत में महिला की सेवा से प्रसन्न होकर सूर्यदेव कहते हैं, ‘मांगो, जो कुछ तुम्हारे हृदय में समाय।’ वह व्रती महिला हल में जोतने के लिए दो बैल, हलवाहा, सेवा के लिए चेरी और दूध पीने के लिए गाय मांगती है। इसके उपरांत सभा में बैठने के लिए बेटा, घर की शोभा के लिए बहू, बायना बांटने के लिए बेटी और पढ़ा पंडित दामाद मांगती है। उसकी मांग को सुनकर सूर्यदेव अति प्रसन्न होकर कहते हैं-

एहो तिरिया सभे गुण आगर

सब कुछ मांगे समतुल

अर्थात वंचित पीड़ित औरतें भी अपने परिवार व्यवस्था को संतुलित करना चाहती हैं। समाज का मन बेटी विरोधी बनाया गया है, परंतु इस गीत में महिला सूर्यदेव से बेटी भी मांगती है। इसलिए सूर्यदेव कहते हैं कि यह महिला सभी गुणों से संपन्न है। परिवार चलाने के लिए संतुलित स्थिति चाहती है। ये लोकगीत और लोक परंपराएं समाज मन के बोल हैं। इनमें महिलाओं की भूमिका अधिक है। लोकपरंपराओं को निभाने में भी और इनकी आत्मा के रूप में भी। छठ पूजा के लोकगीतों की महिला पुरुष से हीन नहीं है। यहां तो पुरुष ही नगण्य है।

छठ पूजा के सूर्य, लोकमंगल के प्रतीक हैं। उनके कारण लोक जीवन बरकरार है, क्योंकि छठ पूजा बिना ‘लोक’ के संपन्न नहीं होती। समाज में सभी जातियों का महत्व व उपयोगिता दर्शाती तथा समान अवसर प्रदान करती छठ पूजा सामाजिक समरसता का अनोखा उदाहरण है- नदी, पोखर या कहीं न कहीं पानी में खड़े होकर अर्घ दिया जाता है। न्यूयॉर्क में रह रही एक बिहारी डॉक्टर महिला ने बताया, पुराना बाथ टब ड्राइंग रूम में ले आए। उसी में पानी भरकर सूरज को देखकर अर्घ दिया।

छठ घाट पर छुआछूत और धनी गरीब का भेद नहीं रहता। वहां सब याचक हैं। क्या राजा, क्या रंक। सवर्ण या पिछड़ा। अत्यंत श्रद्धाभक्ति से किया गया यह व्रत लोकमंगल सिखाता है, लोक जीवन बरकरार रखता है और लोक हित किए गए कार्यों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाता है। शास्त्रीय सूक्तियों, उक्तियों और श्लोकों में वर्णित ज्योतिपुंज सूर्य से किसी मायने में कम नहीं है छठ पूजा के लोकगीतों में वर्णित सूरज। लोक मन पर यह सूरज सदियों से स्थापित है- आगे भी रहना चाहिए।

शास्त्रों और सूक्तियों में ज्ञान ही ज्ञान भरे हैं। निश्चितरूपेण वे ज्ञान मनुष्य के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन को सुखी व समरस बनाने के हैं। किसी भी काल में उस ज्ञान भंडार में प्रवेश करने, वहां रहकर जीवन रत्न बटोरने की शक्ति जनसाधारण में नहीं रही है। इसलिए हर समाज को पंडितों व ज्ञानियों की आवश्यकता होती रही। वे शास्त्रों और सूक्तियों के अर्थ जनसाधारण की बोलियों में भाषांतर करते रहे हैं। इसी परंपरा में कबीर, रहीम, तुलसी, मीरा, रविदास और भी बहुत से संत हुए, परंतु इनके अलावा भी एक परंपरा समाज में संगम तट पर सरस्वती नदी की तरह अदृश्य होकर भी नि:सरित होती रही है। वह है लोकगीतों की परंपरा। लौकिक परंपरा...

[राज्यपाल, गोवा] 

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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