इंदौर [सुमेधा पुराणिक चौरसिया]। देश के 20 राज्यों में हजारों गांवों के लाखों लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने को विवश हैं। इनके लिए राहत भरी खबर मध्य प्रदेश के भोपाल से आई है। एडवांस्ड मटेरियल्स एंड प्रोसेस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एएमपीआरआइ) ने सस्ता और कारगर नैनो फिल्टर विकसित किया है। फ्लोराइड व आर्सेनिक कणों को छानने में यह शत प्रतिशत सक्षम है। इसे शुरुआत में फ्लोरोसिस से प्रभावित मप्र के 20 जिलों में और फिर अन्य प्रभावित राज्यों में भी ग्रामीणों को नाममात्र शुल्क पर उपलब्ध कराया जाएगा। प्रक्रिया की शुरुआत मप्र के सीहोर जिले के आष्टा से हो चुकी है।

बाजार से पांच गुना सस्ता
वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) के सहयोगी संस्थान एएमपीआरआइ ने इस फिल्टर को महज 1500 रुपये की लागत तक सीमित कर उल्लेखनीय सफलता पाई है। बाजार में उपलब्ध इस गुणवत्ता के फिल्टर इससे पांच गुना महंगे हैं। सरकारी उपक्रमों और एनजीओ की मदद से इसकी लागत और कम करने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीणों को फिलहाल चार किस्तों में इसके भुगतान की सुविधा दी जाएगी।

गांव-गांव तक पहुचाएंगे
सीएसआइआर-एएमपीआरआइ, भोपाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ आइबी सिंह ने बताया कि 11 मई 2018 को इसे विधिवत लांच किया गया। मध्य प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) से भी अनुबंध की तैयारी है। फिलहाल सीएसआइआर ने यह तकनीक एमडब्ल्यू सोशल इंटरप्राइजेस नामक कंपनी को हस्तांतरित कर दी है ताकि इसे जमीनी स्तर पर उपयोग में लाया जा सके।

20 राज्यों में है फ्लोरोसिस का कहर
देश के 20 राज्यों के हजारों गांवों में लोग अरसे से फ्लोराइड युक्त पानी की मार झेल रहे हैं। फ्लोराइड के अधिक मात्रा में (1.5 मि.ग्रा. से अधिक) शरीर में जाने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और व्यक्ति लगभग अपंग हो जाता है। लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने के कारण बड़ी संख्या में लोग अपंग और कैंसर का शिकार हुए हैं। इस समस्या का स्थाई हल नहीं निकल सका है। ऐसे में यह पहल एक उम्मीद जगा रही है।

नैनो एडजॉरबेंट तकनीक पर आधारित
सीएसआइआर-एएमपीआरआइ भोपाल के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आइबी सिंह ने बताया कि फिल्टर को तैयार करने में दस वर्ष लगे। नैनो एडजॉरबेंट तकनीक विकसित करना एक चुनौती थी। यह ग्रामीण क्षेत्रों में दूषित पानी की समस्या को खत्म करने में मददगार होगी। छोटे-छोटे वाटर फिल्टर तैयार किए गए हैं जो गांव के मकानों में भी आसानी से लग सकते हैं।

नल से सीधे इसमें पानी भरकर शुद्ध पानी को मटके या बाल्टी में भरा जा सकता है। यह बिना बिजली के काम करता है। साल भर में दो बार इसका फिल्टर बदला जाता है। प्रभावित इलाकों में ग्रामीणों को इसे नाममात्र शुल्क पर उपलब्ध कराए जाने की योजना है।  

By Sanjay Pokhriyal