मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

त्वरित टिप्पणी/प्रशांत मिश्र

भाजपा में एक नए युग की शुरुआत के साथ ही सरकार और पार्टी की प्रकृति और परंपरा भी बदलने लगी है। यह तय हो गया है कि अब न तो सरकार पुराने ढर्रे पर चलेगी और न ही पार्टी। दोनों एक दिशा में एक साथ बढ़ेंगे और संभवत: भाषा भी एक ही होगी।

पिछले कुछ महीनों में जज्बे को जुनून बनाकर ऐतिहासिक जनादेश लाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथग्रहण के साथ ही भाजपा और जनसंघ की तीन पीढि़यों की आस और परिश्रम को पूरा कर दिया। खास बात यह थी कि जब भाजपा और बहुत हद तक कांग्रेस ने भी व्यवहार और सिद्धांत में गठबंधन की सरकार को सच मान लिया था, मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने यह दिखा दिया जनता बहुमत की पार्टी वाली सरकार चाहती है। बशर्ते उसे पार्टी और नेतृत्व पर भरोसा हो। इसके साथ कई समीकरण बदल गए हैं। बदलाव पिछले चार-पांच दिनों में ही दिख गया है। पार्टी और सरकार को भी यह स्पष्ट हो गया कि मोदी 'नो नान्सेंस और जीरो टालरेंस' के सिद्धांत पर चलेंगे। गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद मोदी चार दिनों से दिल्ली के ही गुजरात भवन में टिके थे। इस दौरान मंत्रिमंडल गठन पर चर्चा हुई और संगठन का चेहरा बदलने पर भी। मोदी के मिजाज से वाकिफ राजनीतिक पंडित जो अंदाजा लगा रहे थे ठीक वैसा ही हुआ। मंत्रिमंडल का स्वरूप बदला और कुछ चौंकानेवाले फैसले हुए। शीर्ष नेतृत्व से लेकर नीचे तक कइयों की आशाओं पर तुषारापात भी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से किसी ने उर्फ तक नहीं किया। कम से कम बाहर नहीं दिखा। बीते डेढ़ दशक में भाजपा में बंद कमरे की बैठकों से नेता बाहर देर से निकलते थे और फैसले पहले। छोटी-छोटी बातों पर विवाद भाजपा के लिए आम हुआ करता था। लोकतांत्रिक मूल्यों का नाम देकर पार्टी अंदरूनी विवादों को भी भले ही सही ठहराती रही हो, लेकिन इससे शायद ही कोई इन्कार करे कि पार्टी को इससे काफी नुकसान पहुंचा है।

केंद्र सरकार के लिए तय कोटे से लगभग आधी संख्या में ही मंत्रियों को शपथ दिलाकर मोदी ने यह भी बता दिया कि वह सरकार की परिभाषा बदलना चाहते हैं। वह कथनी नहीं करनी में विश्वास करते है। मोदी कहते रहे हैं -'मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेस।' वह सरकार को जो स्वरूप देना चाहते थे, वह आज के शपथग्रहण में दिखा। मंगलवार सुबह आठ बजे से ही मोदी काम पर होंगे।

भारतीय लोकतंत्र में मजबूत प्रशासन के लिए जरूरी है कि सरकार का शीर्ष नेतृत्व संगठन में भी सबसे मजबूत हो। पिछली सरकार में डा. मनमोहन सिंह बार-बार कमजोर करार दिए जाते रहे तो उसका कारण यही था कि वह संगठन के लिए चेहरा नहीं थे। केंद्रीय राजनीति में आने के साथ ही मोदी ने यह साफ कर दिया है कि वह सरकार के मुखिया हैं और संगठन व कार्यकर्ताओं के चहेते।

नींव मजबूत है। लिहाजा आशाएं संजोना अनुचित भी नहीं है। पिछले 12-13 वर्षो से साढ़े छह करोड़ गुजरातियों के गर्व का कारण रहे मोदी के सामने अब सवा सौ करोड़ भारतीयों का सपना है। शुरुआत अच्छी है।

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