नई दिल्ली, [जागरण स्पेशल]। सब कुछ सही रहा तो भारत अंतरिक्ष विज्ञान में इतिहास बनाने से चंद घंटे दूर है। सोमवार को दोपहर दो बजकर 43 मिनट पर भारत पहली बार चांद पर लैंडर और रोवर उतारने के लिए चंद्रयान-2 छोड़ने जा रहा है। 15 जुलाई को तय लॉन्चिंग में आई खामियों को दूर कर लिया गया है। चंद्रयान-2 को चंद्रमा पर उतारने की पूरी प्रक्रिया में विज्ञान ही वरदान रहा है, लेकिन मान्यता और रीति-रिवाज के मामले में विज्ञान भी अपनी सफलता के लिए भगवान की शरण लेता है। तभी तो इसरो के किसी अभियान से पहले वैज्ञानिक तमाम तरह के धार्मिक अनुष्ठान और मान्यताओं को पूरा करते हैं, जो उनके वैज्ञानिक प्रेक्षणों को और मजबूती देता दिखता है।

13 अंक है अशुभ

रॉकेट पीएसएलवी-सी- 12 के बाद इसरो ने रॉकेट पीएसएलवीसी-14 को अपना सारथी बनाया। तमाम अंतरिक्ष एजेंसियां 13 अंक को अशुभ मानती है। चांद की सतह पर उतरने वाले अपोलो -13 की विफलता के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने उस संख्या के नाम पर किसी अन्य मिशन का नाम नहीं रखा।

मंगलवार को नहीं होती लांचिंग

आमतौर पर इसरो मंगलवार के दिन किसी रॉकेट को अंतरिक्ष में नहीं भेजता है। हालांकि, 450 करोड़ रुपये लागत वाले मार्स ऑर्बिटर मिशन ने मंगलवार को उड़ान भरकर दशकों से चली आ रही इस परंपरा को तोड़ दिया था।

भगवान वेंकटेश्वर की पूजा

किसी भी लॉन्चिंग से पहले इसरो के प्रमुख वैज्ञानिक आंध्र प्रदेश के तिरुमाला में प्रसिद्ध भगवान वेंकटेश्वर की पूजा करते हैं और वहां रॉकेट का एक छोटा मॉडल चढ़ाते हैं, ताकि उन्हें उनके मिशन में सफलता मिले। सिर्फ भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ही नहीं, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा, रूसी वैज्ञानिक समेत दुनियाभर के वैज्ञानिक अभियान की सफलता के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

पहनते हैं नई शर्ट

पुरानी परंपराओं के मुताबिक, रॉकेट लॉन्चिंग के दिन संबंधित प्रोजेक्ट निदेशक नई शर्ट पहनता है।

बना होता त्रिपुंड

इसरो के सभी मशीनों और यंत्रों पर कुमकुम से त्रिपुंड बना होता है, जैसा कि भगवान शिव के माथे पर दिखता है।

देखने का अजीबोगरीब नियम

रूसी अंतरिक्ष यात्री जिस रॉकेट से यात्रा करने जा रहे होते हैं, उसे तब तक नहीं देखते, जब तक वे उसमें बैठ नहीं जाते। कई दशकों से ऐसा चल रहा है।

नहीं होती है उलटी गिनती

राहु काल के समय इसरो के वैज्ञानिक रॉकेट लॉन्च करने के लिए उलटी गिनती शुरू नहीं करते हैं। इसरो के मुताबिक, डेढ़ से दो घंटे का यह समय किसी भी नए काम को शुरू करने के लिए अशुभ माना जाता है। हालांकि, दो ग्रहों के बीच किए जा रहे किसी अभियान के मामले में, रॉकेट के लॉन्चिंग के लिए शुभ समय संभव नहीं होता। इसलिए इस मामले में उस समय को लिया जाता है जब रॉकेट गंतव्य ग्रह की कक्षा में प्रवेश करता है। उस समय के हिसाब से उलटी गिनती शुरू की जाती है।

मूंगफली खाने की प्रथा

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा तभी कोई मिशन लॉन्च करती है तब जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में बैठे वैज्ञानिक मूंगफली खाते हैं। 1960 में रेंजर मिशन 6 बार फेल हुआ। सातवां मिशन सफल हुआ तो कहा गया कि लैब में कोई वैज्ञानिक मूंगफली खा रहा था इसलिए सफलता मिली। तब से मूंगफली खाने की प्रथा चली आ रही है। लॉन्च से पहले नाश्ते में सिर्फ अंडा, भुजिया और मांस मिलता है। ये प्रथा पहले अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री एलन शेफर्ड और जॉन ग्लेन के समय से चली आ रही है।

अंतरिक्ष कूच से पहले मूत्र त्यागा

रूसी अंतरिक्ष यात्री यान में सवार होने के पहले जो बस उन्हें लॉन्च पैड तक ले जाती है, उसके पिछले दाहिने पहिए पर मूत्र त्याग करते हैं। यह परंपरा तब शुरू हुई जब 12 अप्रैल 1961 को जब यूरी गैगरिन अंतरिक्ष में जाने वाले थे। उन्हें बहुत तेज पेशाब लगी थी। उन्होंने बीच रास्ते में बस रुकवा कर पिछले दाहिने पहिए पर मूत्र त्याग दिया। उनका मिशन सफल रहा। तब से यह चल रहा है। यही नहीं अंतरिक्ष में जाने से पहले रूस में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए संगीत बजाया जाता है। इसकी शुरुआत भी यूरी गैररिन ने की थी। यहीं नहीं सभी अंतरिक्ष यात्री गैगरिन की गेस्ट बुक में हस्ताक्षर करके यात्रा को निकलते हैं।

Posted By: Sanjay Pokhriyal