नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। Chandrayaan 2 मिशन के लैंडर विक्रम से दोबारा संपर्क स्थापित करने का ISRO के पास आज अंतिम मौका है। चंदे घंटों बाद लैंडर से दोबारा संपर्क करने की उम्मीद खत्म हो जाएगी। चांद के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर जहां लैंडर मौजूद है, वहां दो दिन पहले से ही अंधेरा होना शुरू हो चुका है। आज देर रात इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पल एक लूनर डे (One Lunar Day) समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही लैंडर से दोबारा संपर्क होने की संभावनाएं भी लगभग खत्म हो जाएंगी।

हालांकि, इससे पहले नासा की तरफ से एक खुशखबरी आई है। चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर के बाद, नासा के यान ने भी तीन दिन पहले लैंडर विक्रम की लैंडिंग साइट की तस्वीरें ली हैं। नासा का यान 17 सितंबर को चांद के दक्षिणी ध्रुव के ऊपर, उस जगह से गुजरा था, जहां विक्रम को लैंड करना था। यहां से गुजरते हुए नासा के यान ने कई तस्वीरें ली हैं। नासा वैज्ञानिक इन तस्वीरों का अध्यय कर रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि इन तस्वीरों के अध्ययन से कई अहम जानकारियां प्राप्त हो सकती हैं।

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दक्षिणी ध्रुव पर जाने लगा अंधेरा

चांद के जिस एक लूनर डे में चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान को सतह पर अहम जांच करनी थी, वह आज देर रात तक समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही दक्षिणी ध्रुव घनघोर अंधेरे में डूब जाएगा। अंधेरे में डूबते ही दक्षिणी ध्रुव का तापमान तकरीबन -200 डिग्री पहुंच जाएगा। अंधेरा और तापमान बहुत कम हो जाने के बाद लैंडर विक्रम से दोबारा संपर्क करने की उम्मीदें भी धूमिल हो जाएंगी।

तस्वीरों का विश्लेषण कर रही नासा

न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एलआरओ यान ने भारत के चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम की लैंडिंग साइट की तस्वीर खींची है। ये तस्वीरें 17 सितंबर को उस वक्त ली गई हैं, जब नासा का यान लैंडिंग साइट के ऊपर से गुजरा था। हालांकि, अभी ये स्पष्ट नहीं हो सका है कि नासा के यान ने लैंडर विक्रम की तस्वीर ली है या नहीं। नासा के अनुसार वह तस्वीरों का विश्लेषण कर रही है। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि इनमें विक्रम की तस्वीर है या नहीं। अगर विक्रम की तस्वीर मिलती है तो उसकी स्थिति को लेकर भी कुछ नई जानकारी सामने आ सकती है। मालूम हो कि इससे पहले चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर ने भी विक्रम के लैडिंग साइट और चांद पर हुई उसकी हार्ड लैंडिंग की तस्वीरें ली थीं। इसरो वैज्ञानिक भी ऑर्बिटर से प्राप्त तस्वीरों का विश्लेषण कर रहे हैं।

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नई-पुरानी तस्वीरों की तुलना करेगा NASA

नासा के यान LRO से जुड़े वैज्ञानिक जॉल केलर ने कहा, ‘टीम पुरानी तस्वीरों से नई तस्वीरों की तुलना करेगी और यह जानने की कोशिश करेगी कि विक्रम उनमें दिख रहा है या नहीं। संभव है कि विक्रम पर कोई परछाई पड़ रही हो या वह तस्वीर के फ्रेम से बाहर रह गया हो।’ एलआरओ ने जिस समय तस्वीरें खींची थीं, वह लगभग लूनर डस्क जैसा समय था। इसका अर्थ है कि उस समय चांद के इस ओर का बड़ा हिस्सा परछाई में था।

आखिरी क्षणों में टूटा था संपर्क

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने छह-सात सितंबर की मध्य रात्रि को लैंडर विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग की कोशिश की थी। इस दौरान लैंडर से उस वक्त संपर्क टूट गया था, जब वह चांद से महज 2.1 किलोमीटर की दूरी पर था। तब से ही इसरो इससे दोबारा संपर्क स्थापित करने की कोशिश में है। बाद में ऑर्बिटर से मिली तस्वीर से पता चला कि लैंडिंग के वक्त विक्रम तिरछा हो गया था। चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लांच किया गया था।

ये थी लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान की भूमिका।

खराब हो जाएंगे लैंडर-रोवर के उपकरण

लैंडर और रोवर को चांद पर कुल 14 दिन ही काम करना था। इस हिसाब से 21 सितंबर तक ही लैंडर से संपर्क की उम्मीद है। कारण यह है कि इसके बाद चांद के दक्षिणी ध्रुव रात हो जाएगी। यहां रात के दौरान तापमान बहुत नीचे चला जाता है। कई बार तापमान शून्य से 200 डिग्री नीचे तक चला जाता है। लैंडर और उसके अंदर फंसे रोवर पर जो वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं, उन्हें इतने कम तापमान पर काम करने लायक नहीं बनाया गया है। इस तापमान तक आते-आते कई उपकरण हमेशा के लिए खराब हो जाएंगे। चांद के दिन और रात धरती के 14-14 दिन के बराबर होते हैं।

ऑर्बिटर कर रहा सही काम

इसरो ने गुरुवार को बताया कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर पूरी क्षमता से काम कर रहा है। इस पर लगे सभी वैज्ञानिक उपकरणों के शुरुआती परीक्षण सफल रहे हैं। उपकरणों का प्रदर्शन संतोषजनक है। लैंडर विक्रम को लेकर एजेंसी ने बताया कि इसरो व कुछ अन्य विशेषज्ञों की एक राष्ट्रीय स्तरीय समिति विक्रम से संपर्क टूटने के कारणों का अध्ययन कर रहे हैं। इससे पहले इसरो ने बताया था कि लांचिंग से लेकर आगे तक की सभी प्रक्रियाएं इतनी सटीक रही थीं कि यान के ऑर्बिटर में उम्मीद से अधिक ईंधन बचा रह गया है। इसलिए ऑर्बिटर पहले से निर्धारित एक साल की तुलना में सात साल तक चांद की परिक्रमा कर प्रयोगों को अंजाम देता रहेगा।

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Posted By: Amit Singh

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