अहमदाबाद, प्रेट्र। भारत का महत्वाकांक्षी मून मिशन चंद्रयान-2 इस महीने की 20 तारीख को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर जाएगा। उसके बाद 31 अगस्त तक चंद्रमा की कक्षा में परिक्रमा करता रहेगा। फिर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की तरफ बढ़ेगा। सात सितंबर को चंद्रयान-2 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। अभी तक चंद्रमा के इस हिस्से में कोई उपग्रह नहीं उतरा है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष के सिवान ने सोमवार को यह जानकारी दी। सिवान ने पत्रकारों से कहा कि चंद्रयान-2 उपग्रह दो दिन बाद पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलकर चंद्रमा की कक्षा की तरफ बढ़ चलेगा। पृथ्वी की कक्षा से चंद्रमा की कक्षा के बीच के गलियारे की यह यात्रा लगभग सात दिनों की होगी।

डॉ. सिवान भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले डॉ. विक्रम साराभाई के जन्म शताब्दी समारोह में हिस्सा लेने यहां आए थे। विक्रम साराभाई के नाम पर ही चंद्रयान-2 के लैंडर एयरक्राफ्ट का नाम विक्रम रखा गया है। चंद्रयान-2 का वजन लगभग 3.8 टन है। इसके तीन हिस्से हैं-ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर। चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण 22 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में डॉ. सतीश धवन अंतरिक्ष प्लेटफॉर्म से प्रक्षेपित किया गया था।

सिवान ने बताया कि प्रक्षेपण के बाद से चंद्रयान-2 की पृथ्वी की कक्षा पांच बार बदली गई है। उपग्रह इस समय पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। अब अगला और सबसे कठिन कक्षा परिवर्तन बुधवार यानी 14 अगस्त को होगा, जब चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा से निकालकर चंद्रमा की कक्षा की तरफ भेजा जाएगा। सिवान ने कहा, '14 अगस्त को तड़के 3.30 बजे चंद्रयान-2 की कक्षा बदली जाएगी, जिसे ट्रांस-लूनर इंजेक्शन कहा जाता है। इस कक्ष परिवर्तन के बाद उपग्रह पृथ्वी की कक्षा से निकलकर चंद्रमा की कक्षा की तरफ बढ़ेगा और 20 अगस्त को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करेगा।'

उन्होंने बताया कि पृथ्वी की कक्षा से निकलने के बाद चंद्र कक्ष सम्मिलन किया जाएगा। इस प्रक्रिया के द्वारा 20 अगस्त तक उपग्रह को चंद्रमा की कक्षा तक पहुंचाया जाएगा। चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के बाद एक बार फिर चंद्रयान के कक्षा में बदलाव की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसके बाद वह सात सितंबर को अपने गंतव्य तक पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-2 अभी तक तय कार्यक्रम के मुताबिक काम कर रहा है। उसके सभी उपकरण सही तरीके से काम कर रहे हैं।

सिवान ने बताया कि आने वाले दिनों खासकर दिसंबर में इसरो के वैज्ञानिकों की व्यस्तता बहुत बढ़ जाएगी। दिसंबर में इसरो छोटे उपग्रहों को लांच करने का अभियान शुरू करेगा। पहली बार इसरो छोटे उपग्रह लांच करेगा।

बता दें कि इसरो ने 22 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से चंद्रयान-2 को प्रक्षेपित किया था। यह प्रक्षेपण इसरो के सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी-मार्क 3 की मदद से किया गया था। इस यान में तीन हिस्से हैं - ऑर्बिटर, लैंडर 'विक्रम' और रोवर 'प्रज्ञान'।

ऑर्बिटर करीब सालभर चांद की परिक्रमा कर शोध को अंजाम देगा। वहीं, लैंडर और रोवर चांद की सतह पर उतरकर प्रयोग करेंगे। तय योजना के अनुसार, लैंडर और रोवर की लैंडिंग चांद की सतह पर सात सितंबर को होगी। लैंडर-रोवर को चांद के दक्षिणी ध्रुव के उस हिस्से पर उतारा जाएगा, जहां अब तक कोई यान नहीं उतरा है। चांद की सतह पर लैंडिंग के बाद भारत ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा।

इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन अपने यान चांद पर उतार चुके हैं। 2008 में भारत ने चंद्रयान-1 भेजा था, जो एक ऑर्बिटर मिशन था। इसने 10 महीने तक चांद की परिक्रमा की थी। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भारत के इसी अभियान को जाता है।

चंद्रयान-2 पर दुनिया भर की नजर
चांद पर अभी तक तीन देशों रूस, अमेरिका और चीन के मिशन ही उतर पाए हैं। चांद पर अपना मिशन लैंड कराने वाला भारत चौथा देश होगा। इसलिए नासा समेत दुनिया भर की नजर चंद्रयान-2 की दक्षिण ध्रुव पर लैंडिंग पर लगी है। चंद्रयान-2 से मिलने वाली जानकारियां अहम हैं। अमेरिका 2024 तक दक्षिण ध्रुव पर अपना मानव मिशन भेजने वाला है, इसलिए उसे चंद्रयान-2 से मिलने वाली जानकारियों का बेसब्री से इंतजार है, ताकि उसके हिसाब से वो अपने मिशन में बदलाव कर सके।

क्या-क्या पता लगाएगा
भारत के पहले मून मिशन चंद्रयान-1 से चांद पर पानी होने का पता चला था। अब चंद्रयान-2 यह पता लगाएगा कि कहां-कहां और किस रूप में पानी है। माना जा रहा है कि दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के रूप में भारी मात्रा में पानी मौजूद है। इसके अलावा वहां के मौसम और रेडिएशन का पता लगाने के साथ ही चंद्रयान-2 यह भी पता लगाएगा कि वहां किस हिस्से में और कब-कब रोशनी होती है और कब-कब अंधेरा छाया रहता है।

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Posted By: Nitin Arora

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