संजय श्रीवास्तव। बीते दिनों आयोजित बार काउंसिल आफ इंडिया की संगोष्ठी में तमाम वकील, सुप्रीम और हाई कोर्ट के कई न्यायाधीश, बार काउंसिल व एसोसिएशन के सदस्यों सहित बहुत से कानूनविद जुटे। सबने न्याय व्यवस्था में तकनीक के इस्तेमाल का स्वागत करते हुए कहा कि इससे न्यायिक व्यवस्था में गतिशीलता, पारदर्शिता का एक नया युग आरंभ होगा। यह सही है कि प्रौद्योगिकी स्वयं में मूल्य-तटस्थ नहीं होती। उस पर भी किसी पक्ष का झुकाव, दबाव हो सकता है, वह पूर्वाग्रहों से प्रतिरक्षित नहीं है। इस बात का सतत मूल्यांकन आवश्यक है कि यह सक्षम सत्ता तथा प्रभुत्व वर्ग की ताकत बढ़ा रही है या अमजन के अधिकारों के रक्षण में योगदान दे रही है। पर महज इसी आधार पर इसे खारिज नहीं किया जा सकता। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस खानविलकर की राय थी कि निचली अदालतों को जल्द से जल्द तकनीक सक्षम बनाना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो पहले से कहते आ रहे हैं कि भारत सरकार न्याय व्यवस्था में तकनीकी संभावनाओं के समावेश को डिजिटल इंडिया मिशन का एक जरूरी हिस्सा मानती है। सरकार ने ई-कोर्ट परियोजना को जिस तत्परता से समर्थन दिया है वह यही बताता है। सबब यह कि न्यायपालिका, न्यायिक क्षेत्र के लोग, मंत्री, मंत्रलय सब का मानना है कि भविष्य में न्याय व्यवस्था और प्रक्रिया तकनीक के माध्यम से ही संचालित होना अनिवार्य है। तय है कि इससे इसकी गतिशीलता में परिवर्तन होगा, करीब साढ़े तीन करोड़ लंबित मुकदमों से त्रण दिलाने के लिए इससे बेहतर कोई उपाय नहीं, सो इसे शीघ्रताशीघ्र अपनाना होगा।

दो साल पहले मई 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक कार्य में दक्षता, पारदर्शिता और आमजन की अदालती सेवाओं तक आसान पहुंच के उद्देश्य से ई-फाइलिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सक्षम निर्देशांकन की नई प्रणाली लागू की। कोरोना के दौरान वचरुअल अदालत, सुनवाई, आनलाइन मामलों की पेशी आरंभ हुई। बेशक अब अगर सरकार चुस्त और न्यापालिका इस बदलाव के लिए प्रतिबद्ध है तो यह उम्मीद की ही जानी चाहिए कि अदालती कामकाज और पूरी न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक का समावेश होने में कोई अड़चन नहीं आएगी। इस तरह के नवाचार न्यायिक प्रक्रिया को आसान, सस्ती, सुलभ और तेज बनाएंगे। पर कई वजहों से यह डगर इतनी आसान नहीं लगती।

न्यायपालिका का ही एक धड़ा इससे पूरी तरह सहमत नहीं है। कुछ दिनों पहले दिल्ली और बांबे हाई कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को यह सलाह दी थी कि वे ‘वचरुअल कोर्ट रूम’ की अवधारणा लागू करने की पहल करें। पर इसके जवाब में बार काउंसिल ने कहा कि वचरुअल कोर्ट रूम की अवधारण उचित नहीं। वीडियो कान्फ्रेंसिंग की पारदर्शिता सीमित है और विश्वसनीय भी नहीं है। खुली अदालत की सुनवाई में संबंधित पक्षों और उनके वकीलों की उपस्थिति के अलावा दूसरे वकील तथा तत्संबंधी लोग भी मौजूद होते हैं। पक्ष, प्रतिपक्ष तथा न्यायाधीश तीनों दूर दूर बैठकर अदालती कार्रवाई सुनें, फैसला करें यह न्याय, समाज और उसके आदर्श व्यवहार के लिए ठीक नहीं होगा।

अदालतों में खुली बहस, गवाह से जिरह, न्यायाधीश के तात्कालिक प्रश्न और प्रतिक्रिया व न्यायिक प्रक्रिया की जगह वचरुअल अदालतें नहीं ले सकतीं। इससे न्याय वितरण प्रणाली में आमजन का विश्वास कम होगा।न्याय प्रक्रिया से जुड़े बहुत से लोग उस उम्र के हैं जहां नया तकनीकी ज्ञान सीखना कठिन है। इस क्षेत्र में शिक्षा के स्तर, तौर तरीके, संसाधन और तकनीक में भी भारी विभेद है। सभी विधि स्नातकों का तकनीक ज्ञान और रुझान तथा मूलभूत जानकारी एक जैसी नहीं है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Edited By: Sanjay Pokhriyal