नई दिल्ली [नीलू रंजन]। गुजरात में एक युवती की कथित जासूसी मामले में नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए न्यायिक जांच का एलान कर चुकी केंद्र सरकार अब इससे पीछा छुड़ाने की तैयारी में है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश के जांच के लिए तैयार नहीं होने के कारण गृह मंत्रालय ने कैबिनेट के निर्णय को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला किया है।

ध्यान देने की बात है कि ठीक एक महीना पहले 26 दिसंबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कैबिनेट में इस जासूसी कांड की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन का फैसला किया था। भाजपा पहले ही ऐसे आयोग को अदालत में चुनौती देने का एलान कर चुकी है।

उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, कानून मंत्रालय और गृह मंत्रालय ने अब न्यायिक जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश की तलाश भी बंद कर दी है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि न्यायिक आयोग के गठन की अधिसूचना जारी नहीं होने की स्थिति में कैबिनेट का फैसला यूं ही लंबित रहेगा। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अल्तमस कबीर एक बार जांच के लिए तैयार भी हो गए थे।

लेकिन बाद में उन्होंने इन्कार कर दिया। पिछले एक महीने में कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीशों के साथ संपर्क कर चुका है। लेकिन सभी ने आम चुनाव के ठीक पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ जांच में शामिल होने से इन्कार कर दिया है। 'दैनिक जागरण' ने पांच जनवरी को सबसे पहले 'मोदी के खिलाफ जांच के लिए नहीं मिल रहे हैं जज' खबर में इस बारे में विस्तार से बताया था।

गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 26 दिसंबर को कैबिनेट के फैसले के तत्काल बाद न्यायिक आयोग के गठन की अधिसूचना का प्रारूप बना लिया गया था और उसमें केवल न्यायाधीश का नाम लिखना बाकी था।

यही नहीं, न्यायिक आयोग को कानूनी वैधता देने के लिए उसके जांच के दायरे में गुजरात में युवती की जासूसी के साथ-साथ दिल्ली में भाजपा नेता अरुण जेटली के फोन कॉल रिकार्ड गैरकानूनी तरीके से निकालने और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की प्रेम कुमार धूमल सरकार द्वारा कांग्रेसी नेताओं की फोन टेपिंग को शामिल कर दिया गया था।

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वैसे भाजपा ने शुरू में ही फैसले को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित करार देते हुए इसे अदालत में चुनौती देने का एलान कर दिया था।

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