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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 03, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Marital Rape: मैरिटल रेप को अपराध मानने के खिलाफ केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में कहा- यह कानूनी से ज्यादा सामाजिक

Published: Thu, 03 Oct 2024 07:04 PM (GMT+05:30)Updated: Thu, 03 Oct 2024 10:01 PM (GMT+05:30)

Centre to Supreme Court On marital rape केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संवैधानिक वैधता के ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट में 'वैवाहिक बलात्कार' पर हलफनामा दायर
सुप्रीम कोर्ट में 'वैवाहिक बलात्कार' पर हलफनामा दायर

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट में 'वैवाहिक बलात्कार' पर हलफनामा दायर
  2. केंद्र ने कहा- यह मुद्दा कानूनी से अधिक सामाजिक

एएनआई, नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया गया है। केंद्र ने कहा कि यौन संबंध पति-पत्नी के बीच संबंधों के कई पहलुओं में से एक है, जिस पर उनके विवाह की नींव टिकी होती है।

दांपत्य संबंधों पर गहरा असर

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि देश में वैवाहिक दुष्कर्म को 'अपराधीकरण' करार नहीं दिया जा सकता। केंद्र का कहना है कि अगर एक पुरुष के अपनी पत्नी से यौन संबंध बनाने को दुष्कर्म करार दिया गया तो इससे दांपत्य संबंधों पर गहरा असर होगा। इससे विवाह संस्था में गंभीर किस्म की उथल-पुथल मच जाएगी।

विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में गुरुवार को वैवाहिक दुष्कर्म (मेरिटल रेप) का अपराधीकरण किए जाने का कड़ा विरोध किया। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इन याचिकाओं में वैधानिक मुद्दा उठाया गया है कि क्या किसी पति को अपनी 'बालिग' पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध स्थापित करने को अपराध-मुक्त माना जाना चाहिए?

पत्नी से यौन संबंध अपराध नहीं

उन्होंने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 375 के तहत अपवाद स्वरूप दिए गए क्लाज को हटाया गया है और उसके स्थान पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत एक पति के अपनी गैर-नाबालिग पत्नी से यौन संबंध स्थापित करने में कोई अपराध नहीं है। यहां तक के नए कानून की धारा 63 (दुष्कर्म) के तहत यही बात कही गई है।

सभी याचिकाएं सीज

हलफनामे में केंद्र का कहना है कि इस याचिका के नतीजे का हमारे समाज पर बहुत गहरा असर पड़ेगा। खासकर भारत में विवाह की अवधारणा प्रभावित होगी जिससे दोनों ही व्यक्तियों के लिए समाज और कानूनी अधिकारों का आधार तय होता है और परिवार के अन्य सदस्यों पर भी इसका सीधा असर होता है।

इसलिए इस मामले पर समग्रता से विचार होना चाहिए नाकि केवल कानूनी रुख अपनाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश डीवाइ चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मुद्दे पर सभी याचिकाओं को सीज कर दिया है।

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