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सबरीमाला मंदिर: केंद्र सरकार ने महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध का किया समर्थन, सुप्रीम कोर्ट में दलील

Published: Tue, 07 Apr 2026 10:48 PM (IST)

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का समर्थन ...और पढ़ें

केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में  महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध का किया समर्थन। (एएनआई)

केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में  महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध का किया समर्थन। (एएनआई)

HighLights

  1. केंद्र ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध का समर्थन किया।

  2. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने धार्मिक आस्था का मुद्दा बताया।

  3. सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ कर रही सुनवाई।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन किया है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने निश्चित आयु की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध का समर्थन करते हुए कहा कि यह मुद्दा पूरी तरह धार्मिक आस्था का है और धार्मिक संस्था की स्वायत्तता के दायरे में आता है। ये न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।

केंद्र ने कहा कि हमें हर संप्रदाय की प्रथा का सम्मान करना चाहिए। ध्यान रहे कि दो दिनों में केरल में चुनाव भी है जहां यह एक बड़ा मुद्दा है।केंद्र सरकार ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में हर आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देने वाला सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला गलत है उस पर पुनर्विचार की जरूरत है।

केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ये दलील नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष दी। मंगलवार को नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने केरल के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के मुद्दे पर सुनवाई शुरू हुई।

केंद्र सरकार की ओर से बुधवार को भी बहस जारी रहेगी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, बी.वी. नागरत्ना, एमएम सुंद्रेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, एजी मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर महादेवन और जोयमाल्या बाग्ची की नौ सदस्यीय पीठ सात कानूनी सवालों पर विचार कर रही है। बहस की शुरुआत केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने की।

उन्होंने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा की अनिवार्यता तय करना न्यायालय का काम नहीं है। हालांकि मेहता ने कहा कि वे सबरीमाला फैसले पर वे बाद में दलीलें रखेंगे पहले वे उन कानूनी सवालों पर दलील दे रहें जिन पर कोर्ट विचार कर रहा है। पीठ ने साफ किया कि वह उस फैसले के गुणदोष पर नहीं जाएगी बल्कि वो संविधान पीठ को विचार के लिए भेजे गए सात प्रश्नों तक सीमित रखेंगे।

मेहता ने सभी संप्रदायों की धार्मिक प्रथाओं के सम्मान की बात करते हुए कहा कि हमें हर संप्रदाय की प्रथा का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं होती। अगर हम किसी मजार या गुरुद्वारे में जाते हैं तो हमे सिर ढकना पड़ता है। हम ये नहीं कह सकते कि हमारी गरिमा के अधिकार या पसंद छीन ली गई है।

उन्होंने ये भी कहा कि अगर कोई नरबलि को जरूरी धार्मिक प्रथा बताता है तो कोर्ट को यह जांचने की जरूरत नहीं है कि वह प्रथा अनिवार्य धार्मिक प्रथा है कि नहीं है, कोर्ट उस याचिका को इस आधार पर खारिज कर सकता है कि यह सीधा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य का उल्लंघन करता है। उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत को संविधान में स्पष्ट नहीं किया गया है बल्कि ये न्यायपालिका द्वारा विकसित एक अस्पष्ट और अनिश्चित धारणा है।

तीन दिन के लिए अछूत नहीं हो सकते

मामले पर सुनवाई के दौरान पीठ की एक मात्र महिला न्यायाधीश ने अस्पृश्यता निषेध करने वाले अनुच्छेद 17 को सबरीमाला मामले में लागू करने के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि महिला को महीने के तीन दिन अछूत और चौथे दिन अछुत न रहना नहीं मान सकते।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि एक महिला होने के नाते मैं कह सकती हूं कि हर महीने के तीन दिनों तक छुआछूत बरतना और चौथे दिन उसे खत्म कर देना, ऐसा नहीं हो सकता। हमें कठोर वास्तविकताओं को ध्यान मे रखते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए। इस मामले का दूसरा पहलू ही असल सवाल है।

इन सात सवालों पर विचार कर रही है संविधान पीठ

  1. संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?
  2. संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों बीच क्या आपसी संबंध है?
  3. क्या संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, और स्वास्थ्य के अलावा संविधान के भाग तीन के अन्य प्रविधानों के अधीन हैं?
  4. संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत नैतिकता शब्द का दायरा और विस्तार क्या है, और क्या इसका मतलब इसमें संवैधानिक नैतिकता को शामिल करना है?
  5. अनुच्छेद 25 में बताई गई किसी धार्मिक प्रथा के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और विस्तार क्या है?
  6. अनुच्छेद 25(2)(बी) में आये वाक्यांश हिंदुओं के वर्ग का क्या अर्थ है?
  7. क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?