विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

शोध क्षेत्र में नौकरशाही सबसे बड़ी चुनौती, हर चीज एक ही फार्मूले से देखती: डॉ. मांडे 

By Rumni GhoshEdited By: Abhishek Pratap Singh
Published: Sat, 28 Feb 2026 09:08 PM (IST)Updated: Sun, 01 Mar 2026 12:55 AM (IST)

डॉ. शेखर सी. मांडे ने भारतीय शोध में नौकरशाही को सबसे बड़ी बाधा बताया है। उन्होंने कहा कि लैब से ...और पढ़ें

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शेखर सी. मांडे से खास बातचीत।

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शेखर सी. मांडे से खास बातचीत।

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

रुमनी घोष, नई दिल्ली। दिल्ली में आयोजित एआइ इंपैक्ट समिट में चीन निर्मित रोबोट को अपना बताकर पेश करने वाली गलगोटिया यूनिवर्सिटी का मामला सामने आने के बाद भारतीय शिक्षण व शोध संस्थानों द्वारा किए जा रहे प्रयोगों की मौलिकता पर सवाल उठने लगे हैं। पेटेंट की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन बमुश्किल 10 से 12 प्रतिशत ही लैब से फैक्ट्री तक का सफर तय कर पा रहे हैं। हालांकि वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआइआर) के पूर्व महानिदेशक और वर्तमान में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शेखर सी. मांडे इन दोनों ही मुद्दों से ज्यादा चिंतित नजर नहीं आते हैं।

वह कहते हैं इन मुद्दों से ज्यादा बड़ी चुनौती है नौकरशाही। सड़क परिवहन हो या रेलवे, बिजली विभाग हो या कोई अन्य, नौकरशाह सभी को एक ही फार्मूले से देखते हैं। यदि भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान व नवाचारों को बढ़ावा देना है तो उन्हें सोच बदलना होगा। वर्ष 2018 से 2022 तक सीएसआइआर में पदस्थ रहे डा. मांडे के नेतृत्व में सीएसआइआर की टीम ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए किए गए अनुसंधानों को बहुत ही कम समय के भीतर उद्योगों के जरिये बाजारों तक पहुंचाया। वह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआइआर) के सचिव भी रहे।

वह पुणे स्थित नेशनल सेंटर फार सेल साइंस (एनसीसीएस) के पूर्व निदेशक भी रह चुके हैं। विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए उन्हें वर्ष 2005 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से नवाजा गया। वर्तमान में वह पुणे में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के बायोइंफार्मेटिक्स सेंटर में विशिष्ट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे शोध की मौलिकता, लैब से निकलकर फैक्ट्री तक पहुंचने की प्रतिशत दर और पेटेंट को लेकर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

एआइ समिट में चीन के रोबोट को अपना बताकर पेश करने की घटना ने भारत के शिक्षण संस्थानों द्वारा किए जा रहे शोध पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या आप इससे सहमत हैं?

नहीं...इस घटना की वजह से सभी शोध पर सवाल उठाना सही नहीं है। एआइ के क्षेत्र में बहुत काम हो रहा है। दुनियाभर में हो रहे शोध की वजह से बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है। ऐसे में इस तरह की कुछ घटनाएं आसपास होती रहती हैं और आगे भी होंगी। इसके बारे में बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है।

क्या भारत जैसे इतने बड़े देश में मौलिक वैज्ञानिक शोध की कमी है। यदि हां, तो क्यों? क्या करना चाहिए?

नहीं। ऐसा नहीं है। आइआइटी मद्रास या आइआइटी बांबे जैसे संस्थानों में बहुत बड़े पैमाने पर और बेहतरीन काम हो रहे हैं। अहमदाबाद स्थित नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन जमीनी स्तर पर हो रहे शोध व अनुसंधानों की कैटालागिंग (सूचीबद्ध) कर रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इंसा) का भी मुख्य उद्देश्य देश-दुनिया में हो रहे शोध कार्यों को आपस में जोड़ना है। हमारे देश में छोटे-छोटे स्तर पर जो अनुसंधान या नवाचार हो रहे हैं, उन शोधों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। यही नहीं सीएसआइआर द्वारा ट्रेडिशनल नालेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) के जरिये हमारे जनजातीय समुदाय (ट्राइबल सोसायटी) के दैनिक जीवन व परंपराओं में मौजूद विज्ञान से जुड़े ज्ञान को संरक्षित कर उसे आधुनिक विज्ञान के सामने रखा जा रहा है।

शैक्षणिक व वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा आए दिन नए-नए शोध के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन वह आम जन-जीवन में उपयोग होते हुए क्यों नहीं दिखते हैं?

यह बिलकुल सही है, लेकिन इसके लिए विज्ञानी या कोई शोध संस्थान को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। इसके लिए हमारा इको सिस्टम जिम्मेदार है। दरअसल, होता यह है कि हम लोग (वैज्ञानिक समुदाय) अनुसंधान करते हैं, तो उससे जुड़ी हुई बहुत-सी चीजों को भी सूचीबद्ध करते हैं। हो सकता है कि उस समय हम उस विषय पर शोध न कर पाएं, लेकिन आगे आने वाले समय में वह शोध का हिस्सा होगा। शोध संरक्षित रहे, इसके लिए पेटेंट करवाया जाता है। जब हम मूल शोध का पेटेंट करवाते हैं तो साथ-साथ में उससे जुड़े उन तमाम शोधों या नवाचारों का भी पेटेंट करवा लेते हैं, जो मूल शोध से जुड़े हुए होते हैं। ताकि हमारे प्रतिस्पर्धी उसे ब्रेक नहीं कर सके। इसे 'डिफेंसिव पैटर्न' कहते हैं। यही वजह है कि आम लोगों को लगता है कि इतने पेटेंट होते हैं, लेकिन वह बाजार तक नहीं पहुंचते हैं।

लैब से फैक्टरी तक कितने प्रतिशत शोध पहुंच पाते हैं। अंतरराष्ट्रीय मानक की तुलना में भारत का प्रतिशत कितना है?

10 से 12 प्रतिशत। यह सिर्फ भारत का आंकड़ा नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही अनुपात है।

इतना अंतर क्यों है?

अनुसंधान के क्षेत्र में एक शब्द का बार-बार उपयोग होता है... टीआरएल, यानी टेक्नोलाजी रेडीनेस लेवल्स। हिंदी में इसे 'प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर' कहते हैं। टीआरएल को एक से नौ के पैमाने पर नापा जाता है। हम लोग प्रयोगशाला में जो शोध करते हैं, वह टीआरएल-1,2,3, यानी बुनियादी अनुसंधान होता है। इससे उलट इंडस्ट्री की प्राथमिकता टीआरएल-7,8,9, यानी सत्यापन स्तर के अनुसंधान की होती है। निश्चित रूप से वे उन्हीं अनुसंधानों पर निवेश करेंगे, जो कमर्शियली वाइबल (व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य) हो, यानी जिसमें सफल रूप से बाजार तक पहुंचने की क्षमता हो। इन दोनों के बीच जो टीआरएल-4,5,6 का अंतर है, यही 'लैब टू फैक्ट्री' के बीच इतनी बड़ी खाई पैदा करता है। इस खाई को हम 'वैली आफ डेथ' भी कहते हैं।

यह 'वैली आफ डेथ' क्या है?

अनुसंधान में सफलता की गारंटी 100 प्रतिशत नहीं होती है। बहुत बार ऐसा होता है कि कोई प्रयोग टीआरएल 1,2,3 तक तो सफल है, लेकिन टीआरएल 4,5,6 के दौरान, यानी प्रोटोटाइप बनाते समय सफल न हो। यानी प्रयोग फेल हो जाए। यदि प्रोटोटाइप बन भी जाए, तो हो सकता है कि सत्यापन के दौरान प्रयोग कारगर साबित न हो। इसे 'वैली आफ डेथ' कहते हैं। जैसा मैंने आपको पहले बताया था कि लैब में जितने प्रयोग होते हैं, उसका 10-12 प्रतिशत ही बाजार या इंडस्ट्री तक पहुंच पाता है।

भारत में पेटेंट को लेकर भी बड़ी परेशानी है। बताया जाता है कि स्टाफ की कमी की वजह से 58 महीने से पेटेंट जारी नहीं हो रहे हैं। ऐसे में क्या भारतीय विज्ञानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ नहीं जाएंगे?

कुछ समय पहले तक यह बड़ी समस्या थी, लेकिन अब व्यवस्था सुधरी है। बीते एक साल में पेटेंट आफिस में बड़े पैमाने पर पेटेंट परीक्षकों की भर्ती हुई है, इसलिए आने वाले समय में यह परेशानी नहीं रहेगी। काफी बैकलाग भी 'क्लियर' हो चुका है।

लैब से फैक्ट्री की बात हो या पेटेंट समस्या... यदि यह सब इको सिस्टम का हिस्सा है, तो क्या अनुसंधान क्षेत्र में कोई बाधाएं नहीं हैं? यदि हैं तो उसे कैसे दूर किया जाए?

हमारे देश में अनुसंधान क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधा है हमारी ब्यूरोक्रेसी... यानी नौकरशाही। रोड कंस्ट्रक्शन हो या पावर मैनेजमेंट। रेलवे हो या ट्रांसपोर्ट सिस्टम। हर सिस्टम के लिए एक ही फार्मेट तैयार है। विज्ञान को भी वे उसी फार्मेट में ढालना चाहते हैं। जब नौकरशाही सभी को एक ही फार्मूले से देखती है तो परेशानी शुरू होती है। उदाहरण के लिए आपने कोई प्रयोग किया। उस प्रयोग को बाजार तक लाने के लिए किसी उद्योगपति द्वारा निवेश जरूरी है। अब इसमें टेंडर फार्मूला लागू नहीं हो सकता है कि जो सबसे बड़ा निवेशक है, उसे दे दो। यहां आपको यह देखना होगा कि किसके पास उस प्रयोग को सफल करने का कौशल है। कई बार हम लोग एक ही चीज कई लोगों को देना चाहते हैं, ताकि बेहतर परिणाम का आकलन किया जा सके, लेकिन नौकरशाही की वजह से सरकारी संस्थानों को इसमें भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। यदि भारत में अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहते हैं तो इस संस्कृति को बढ़ावा देना होगा।

खुला माहौल से क्या आशय है?

खुला माहौल यानी अनुसंधान संस्थाएं या शैक्षणिक संस्थानों को यह छूट हो कि वे अपने स्तर पर यह तय कर सकें कि उन्हें किस कंपनी के साथ प्रयोग करना है। इस सवाल नहीं उठना चाहिए कि आपने अपना प्रोटोटाइप उस कंपनी को क्यों दिया? इसको क्यों नहीं दिया?

सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं?

सरकार और नौकरशाही, दोनों ही स्तर पर सोच में बदलाव की जरूरत है। यह मानसिकता बदलनी होगी कि कोई भी संस्थान या वैज्ञानिक समुदाय निजी फायदे के लिए शोध कर रहा है। उन्हें अनुसंधान संस्थानों पर विश्वास करना होगा कि वे जो भी अनुसंधान और नवाचार कर रहे हैं, वह आम लोगों के फायदे के लिए है। इससे कोई भी कोई निजी लाभ नहीं लेना चाहता है। जब यह स्थिति बनेगी, तभी भारत में अनुसंधान को और बढ़ावा मिलेगा।

शोध के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर कौन-कौन से देश सबसे ज्यादा शोध कर रहे हैं?

अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों में बहुत बड़े स्तर पर शोध कार्य व नवाचार मूवमेंट जारी है। चीन में भी इस दिशा में काम हो रहा है। जिन देशों में स्टार्टअप्स पर बड़े पैमाने पर काम हो रहा है, उनमें यूनाइटेड किंगडम सबसे आगे है। यहां बहुत सारे स्टार्टअप्स को यूनिकार्न बनाने में सफलता मिली है। भारत भी बहुत पीछे नहीं है, लेकिन अभी कुछ क्षेत्रों में बहुत काम करने की जरूरत है।

भारत किन-किन क्षेत्रों में आगे है?

मटेरियल साइंस और केमेस्ट्री दोनों क्षेत्रों में अनुसंधान और नवाचार में भारत के विज्ञानी दुनियभार में बहुत बेहतरीन काम कर रहे हैं। यही नहीं इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर भारतीय मूल के विज्ञानी भी आगे हैं।


अमेरिका में शोध के लिए जीडीपी का 2.3 प्रतिशत हिस्सा आवंटित किया जाता है। चीन में भी लगभग इतना ही हिस्सा अनुसंधानों पर खर्च किया जाता है। इससे उलट भारत में यह हिस्सा सिर्फ 0.6 प्रतिशत है। बतौर विज्ञानी क्या आपको लगता है कि इसे बढ़ाया जाना चाहिए?

 दुनियाभर में दो अलग-अलग तरीके का पैसा रिसर्च फंड में आता है। यदि अमेरिका की बात करें तो वहां शोध के लिए जीडीपी का 2.3 प्रतिशत हिस्सा आवंटित है। इसका एक हिस्सा सरकार तो एक हिस्सा निजी कंपनियों की ओर से आता है। चीन भी जीडीपी का बड़ा हिस्सा रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए निवेश कर रहा है। निश्चित रूप से इसकी तुलना में भारत में जीडीपी का 0.6 प्रतिशत हिस्सा ही शोध के लिए आवंटित होता है, लेकिन यह पूरी तरह से सरकारी फंड होता है। यदि शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ना है, तो हमारे यहां भी निजी कंपनियों को बड़े पैमाने पर आगे आने की जरूरत है। वैसे भारत सरकार ने हाल ही में पांच साल के लिए एक रिसर्च डेवलपमेंट फंड की स्थापना की है, जिसका सालाना बजट 20 हजार करोड़ रुपये है, यानी पांच साल में एक लाख करोड़ रुपये नवाचार या शोध के लिए दिया जाएगा। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि निजी कंपनियों को शोध में निवेश के लिए प्रेरित करना। फिलहाल ये कंपनियां ज्यादा निवेश नहीं करती हैं। निजी कंपनियों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि शोध से उन्हें ज्यादा फायदा होगा।

यह भी पढ़ें: Exclusive Interview: एतिहासिक होगी पीएम मोदी की आगामी इजरायली यात्रा- रुवेन अजार