ओमप्रकाश तिवारी। पिछले वर्ष मार्च महीने के अंतिम चरण में घोषित राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन पूरे देश के लिए एक दहशत भरा एवं अनूठा अनुभव था। किसी ने नहीं सोचा था कि जहां आज हैं, वहीं अगले कई सप्ताहों तक जस का तस बंध के रह जाना पड़ेगा। किसी ने नहीं सोचा था कि मुंबई की लाइफ लाइन कही जानेवाली लोकल ट्रेनें तो क्या, पूरे देश की ट्रेनें एक साथ बंद हो जाएंगी। लेकिन ये सब कुछ हुआ, और दुनिया के साथ भारत ने भी कोविड-19 का एक भयावह स्वरूप देखा, अनुभव किया। इस दौरान घटी घटनाओं ने कई दास्तानों को जन्म दिया है। ये दास्तानें दर्द की भी हैं, और प्रेरणा की भी। दर्द भरी इन दास्तानों पर यदि कोई अपनी कलम न चलाता, तो इतिहास का यह कालखंड लोगों की नजरों से अछूता रह जाता।

लॉकडाउन के दौरान की इन दास्तानों को रोचक अंदाज में समेटने का काम किया मयंक पांडेय ने।कोरोना काल की 50 सच्ची घटनाओं को उन्होंने अपनी नवप्रकाशित पुस्तक पलायन पीड़ा प्रेरणा में समेटा है। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही विदित है, इसमें ज्यादातर कहानियां लॉकडाउन के दौरान हुए श्रमिकों के पलायन की पीड़ा दर्शाती हैं। पुस्तक के आत्मकथ्य में मयंक लिखते हैं कि इन सच्ची घटनाओं में हमने पीड़ा के इंद्रधनुष देखे हैं। अपने कंधे पर चार वर्षीय पुत्र का शव लादे पैदल अपने घर की ओर जा रहे एक मजबूर पिता की कहानी हो, चाहे अपने दिव्यांग पुत्र को ले जाने के लिए साइकिल की चोरी करते एक पिता की दास्तान। अकेले ही अपने बेटे का अंतिम संस्कार करती देवंती चेरो की गाथा हो, या अपनी पत्नी को साइकिल के कैरियर पर बैठाकर आंध्र प्रदेश से ओडिशा ले गए अशोक की कहानी।

पीड़ा की इन कहानियों में मयंक कई ऐसी घटनाओं पर भी कलम चलाते हैं, जिन पर वह न लिखते तो शायद किसी की निगाह ही न जाती। ऐसी ही कहानियों में से एक है- विश्व का पहला और आखिरी व्यापार। कोरोना के कारण जैसे सभी कामकाज बंद हो गए, वैसे ही एक वर्कर्स के सामने भी भुखमरी की समस्या पैदा होने लगी थी। इस कहानी की एक पात्र पुष्पा के लिए भोजन की व्यवस्था करने से ज्यादा विकट था अपनी बेटी रेशमा को उसके शेल्टर होम से लाकर अपने साथ रखना। उसकी 11 वर्षीय बेटी को अभी तक पता नहीं था कि उसकी मां करती क्या है।पीड़ा की इन्हीं कहानियों में कई व्यक्ति अथवा संस्थाएं भी सामने आईं जिन्होंने लोगों की भरपूर मदद की। 

मयंक कहते हैं, अक्सर सुनता हूं कि हमारे देश में 33 करोड़ देवी-देवता निवास करते हैं। इस बारे में मुङो ज्यादा जानकारी तो नहीं है। लेकिन लॉकडाउन के दौरान मैंने एक-दो करोड़ ऐसे लोगों को जरूर महसूस किया, जिनमें देवत्व के गुण विद्यमान हैं। वास्तव में ऐसे ही लोगों के कारण भारत में यह विभीषिका वैसा असर नहीं दिखा पाई, जैसी आशंका थी। पुस्तक के प्रेरणा खंड में कदम-कदम पर मदद के लिए खड़े लोगों एवं समूहों को लेखक ने बड़ी खूबसूरती से रेखांकित किया है। 

इस खंड की पहली ही कहानी प्रशासनिक सेवा में कार्यरत उन अधिकारियों के सामाजिक अवदान को रेखांकित करती है, जो अपनी सरकारी ड्यूटी से इतर भी समाज के लिए कुछ करने सड़कों पर उतर पड़े। इसी खंड में न्यूयार्क में रह रहे भारतीय मूल के विश्व प्रसिद्ध शेफ विकास खन्ना की भी कहानी शामिल है, जिन्होंने पिछले वर्ष अप्रैल से सितंबर के बीच भारत के लगभग 125 शहरों में करीब पांच करोड़ खाने के पैकेट, पांच लाख चप्पलें और 30 लाख सैनेटरी पैड बांटे। लेखक ने फिल्म अभिनेता सोनू सूद द्वारा की गई असंख्य लोगों की मदद को भी अपनी कहानियों में बेहद खूबसूरती से स्थान दिया है। निश्चित तौर पर ये कहानियां कोरोना काल के एक दस्तावेज के रूप में सामने आई हैं।

पुस्तक : पलायन पीड़ा प्रेरणा

लेखक : मयंक पांडेय

प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन

मूल्य : 250 रुपये

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