विवेक भटनागर। पिछले लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले एक फिल्म रिलीज हुई थी, 'उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक'। इस फिल्म का एक संवाद - 'हाउ इज द जोश' सभी की जुबान पर चढ़ गया था। राजनीतिक सभाओं में भी इसका इस्तेमाल हुआ। एक कार्यक्रम में तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने भाषण का आरंभ इसी संवाद से किया था। भाषण आरंभ करते ही उन्होंने पूछा था- 'हाउ इज द जोश'। सभागार से आवाज आती थी 'हाई सर'। इस प्रसंग को बताने का मकसद यह है कि भारतीय सेना के शौर्य पर बनी फिल्में दर्शकों पर खूब प्रभाव छोड़ती हैं। समर चोपड़ा ने युद्ध और भारतीय सेना के शौर्य को केंद्र में रखकर एक दिलचस्प पुस्तक लिखी है,

'बालीवुड डज बैटल, द वार मूवी एंड द इंडियन पापुलर इमेजिनेशन'। समीर चोपड़ा ने युद्ध और उसकी पृष्ठभूमि पर बनी कुछ फिल्मों का विश्लेषण करते हुए यह पुस्तक लिखी है। पूरी दुनिया में युद्ध की पृष्ठभूमि पर कई फिल्में बनी हैं। हिंदी में भी युद्ध की कहानियों पर और युद्ध में हमारे सेनानियों की शौर्यगाथाओं पर फिल्में बनी हैं। माना जाता है कि कोई भी देश अगर किसी देश से युद्ध लड़ता है तो उसका प्रभाव दोनों देशों के अलावा कई अन्य देशों पर भी पड़ता है।

जब हमारा देश आजाद हुआ तो कश्मीर में भारतीय सेना को कबायलियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी थी। सीधे-सीधे उसको युद्ध नहीं कहा जा सकता है। भारत पर पहली बार चीन ने वर्ष 1962 में आक्रमण किया। उसके बाद पाकिस्तान के साथ तीन युद्ध हुए, 1965 में, 1971 में और 1999 में। चीन के साथ हुए युद्ध ने जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक कौशल पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था। 1965 के युद्ध ने लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व को मजबूती प्रदान की। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से एक नए देश 'बांग्लादेश' का जन्म हुआ और इंदिरा गांधी को राजनीतिक मजबूती मिली। चीन और पाकिस्तान के साथ के युद्ध का असर भारत के अन्य देशों के साथ रिश्तों पर पड़ा। नए रिश्ते बने तो पुराने रिश्तों में खटास आई।

चेतन आनंद की फिल्म 'हकीकत' युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी पहली हिंदी फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में चीन की धोखाधड़ी को रेखांकित किया गया है और भारतीय मानस पर चीन के धोखे के असर को भी संवादों के जरिए दिखाया गया। समीर चोपड़ा ने अपनी इस किताब में इतिहासकारों के हवाले से यह कहा है कि किसी भी देश का जनमानस जब जख्मी होता है तो देशभक्ति की भावना प्रबल होती है। फिल्म 'हकीकत' को उन्होंने इसी आईने में देखा है। 'हकीकत' फिल्म का एक गाना 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो' बेहद लोकप्रिय हुआ था। चेतन आनंद की एक और फिल्म 'हिन्दुस्तान की कसम' को भी लेखक ने अपनी इस पुस्तक में परखा है। यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 'ऑपरेशन कैक्टस लिली' को केंद्र में रखकर बनाई गई थी। लेखक ने अपनी पुस्तक में जे. ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'आक्रमण' को भी शामिल किया है। उनका मानना है कि 'आक्रमण' और 'हिंदुस्तान की कसम' में फिल्मकार सार्थक राजनीतिक संदर्भ देने में चूक गए। अपनी इस पुस्तक में समीर चोपड़ा ने फिल्म 'बार्डर', 'एलओसी कारगिल', 'लक्ष्य', 'विजेता' और 'द गाजी अटैक' का विस्तार से विश्लेषण किया है।

पुस्तक के अंतिम अध्याय में लेखक ने युद्ध आधारित हिंदी फिल्मों के विश्लेषण को रामायण और महाभारत की कथा से जोडऩे की कोशिश की है। उनका मानना है कि जिस देश के दो सबसे लोकप्रिय ग्रंथ 'रामायण' और 'महाभारत' युद्ध पर आधारित हों, वहां की फिल्म इंडस्ट्री को युद्ध की पृष्ठभूमि पर फिल्में बनाने में महारत हासिल होनी चाहिए। लेखक अपनी इस पुस्तक में इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि हमारे देश में युद्ध के समय फ्रंटलाइन की कार्रवाईयों की डाक्यूमेंट्री नहीं होने की वजह से या उस वक्त फ्रंटलाइन एक्शन की वीडियो कवरेज नहीं होने की वजह से युद्ध आधारित फिल्में उसकी बारीकियों में न जाकर पापुलर जोनर में चली जाती हैं। यह पुस्तक फिल्म के शोधार्थियों के लिए मददगार हो सकती है, लेखक की दृष्टि से सहमति-असहमति हो सकती है, लेकिन उस पर संवाद की जमीन तो तैयार करती ही है।

----------------------------

समीक्ष्य पुस्तक : बॉलीवुड डज बैटल

लेखक : समीर चोपड़ा

प्रकाशक : हार्पर कालिंस, नोएडा

मूल्य : 399 रुपये

Edited By: Shashank Pandey