मुंबई, पीटीआइ। बॉम्बे हाइकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वो एक नीति बनाए या मौजूदा कानूनों में संशोधन करे, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अभियुक्तों और गवाहों को तत्काल वारंट और समन मिल सके। यह देखा जा रहा है कि अभियुक्‍तों को समन काफी देरी से मिल रहे हैं, जिसकी वजह से मामले लंबे समय तक खिंचते चले जा रहे हैं।

न्यायमूर्ति एस सी धरमाधिकारी और भारती डांगरे की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि लंबित समन और वारंट की बढ़ती संख्या की वजह से विशेष रूप से चेक बाउंस के मामलों में सुनवाई में देरी हो रही है। सितंबर 2016 में पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ता ने यह डाटा भी पेश किया था कि 'नेकेशेबल इंस्ट्रूमेंट्स (एनआइ) एक्ट के तहत चेक बाउंस के करीब 80 फीसदी मामलों में समन नहीं पहुंचा, जिसकी वजह से वे लंबित थे। तब अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को तत्काल कदम उठाने के लिए निर्देश दिया था, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि समन शीघ्रता से पहुंच सके।

गुरुवार को हुई सुनवाई में पीठ ने कहा कि सितंबर 2016 की सुनवाई के बाद से महाराष्ट्र सरकार ने न्यायालय के आदेश का अनुपालन करने के लिए 'बहुत कुछ' किया है। राज्य के वकील जेपी याज्ञिक ने बेंच को बताया कि लंबित वारंट और समन को अंजाम देने के लिए हाल में एक विशेष अभियान का आयोजन किया गया था और राज्य ने एनआई अधिनियम के मामलों में भारतीय डाक सेवा के पंजीकृत पदों के जरिए समन भेजने का फैसला किया था। पुलिस मशीनरी पर पहले से ही 'अत्यधिक बोझ' था। हालांकि, खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसा अस्थायी उपाय अपर्याप्त है और इस समस्या को हल करने के लिए राज्य को वैधानिक प्रावधान बनाना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा, 'गृह विभाग को कुछ बाध्यकारी निर्देश जारी करने चाहिए और दोषियों को दंडित करना चाहिए। कानून सुनिश्चित करने के लिए संशोधन किया जाना चाहिए कि अदालत के मामलों में समन की सेवा या वारंट को निष्पादित करने में कोई देरी नहीं हो।' पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने अदालत के आदेशों का अनुपालन क्यों नहीं किया और नीति या तंत्र तैयार क्‍या नहीं किया गया? क्या उच्च न्यायालय को हर चीज का ख्याल रखना पड़ेगा?

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Posted By: Tilak Raj

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