हिंदी भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने में कई महान लोगों ने योगदान दिया है। अंग्रेजों के अधीन होने की वजह से हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी में तब्दील होने लगी थी। आजादी के बाद भी हिंदी को अपने वर्चस्व के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। ऐसे में कई महापुरुष ऐसे भी थे जिन्होंने हिंदी को उसका स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे ही महापुरुष हैं भारत रत्न से सम्मानित राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन। हिंदी को भारत की राषट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करवाने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी पंक्ति के नेता होने के साथ-साथ पुरुषोत्तम दास जी हिंदी के अनन्य सेवक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे।

पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म 1 अगस्त, 1882 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने लॉ की डिग्री हासिल की और 1906 में लॉ की प्रैक्टिस के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम करना शुरु किया। 1921 में सामाजिक कायरें में अधिक भागीदारी और देश के स्वतंत्रता संग्राम में पूर्ण रूप से काम करने के लिए उन्होंने हाई कोर्ट में काम करना छोड़ दिया।

पुरुषोत्तम दास टंडन जी ने कांग्रेस के साथ 1899 से ही काम करना शुरु कर दिया था। अपने क्रांतिकारी कार्यकलापों के कारण उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के म्योर सेंट्रल कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया था और 1903 में अपने पिता के निधन के बाद उन्होंने एक अन्य कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड का अध्ययन करने वाली कांग्रेस पार्टी की समिति के वह एक सदस्य थे। गांधी जी के कहने पर वे वकालत को छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वे सन् 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के सिलसिले में बस्ती में गिरफ्तार हुए और उन्हें कारावास का दंड मिला। 1931 में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन से गांधी जी के वापस लौटने से पहले जिन स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार किया गया था उनमें जवाहरलाल नेहरू के साथ पुरुषोत्तम दास टंडन भी थे। उन्होंने बिहार में कृषि को बढ़ावा देने के लिए काफी कार्य किए। 1933 में वह बिहार की प्रादेशिक किसान सभा के अध्यक्ष चुने गए और बिहार किसान आंदोलन के साथ सहानुभूति रखते हुए विकास के अनेक कार्य किए।

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने 10 अक्टूबर, 1910 को नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी के प्रांगण में हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। इसी क्रम में 1918 में उन्होंने 'हिंदी विद्यापीठ' और 1947 में 'हिंदी रक्षक दल' की स्थाना की। राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। वह हिंदी में भारत की मिट्टी की सुगंध महसूस करते थे। हिंदी साहित्य सम्मेलन के इंदौर अधिवेशन में स्पष्ट घोषणा की गई कि अब से राजकीय सभाओं, कांग्रेस की प्रांतीय सभाओं और अन्य सम्मेलनों में अंग्रेजी का एक शब्द भी सुनाई न पड़े।

भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पूर्व से ही साम्प्रदायिकता की समस्या अपने विकट रूप में विद्यमान रही। कुछ नेताओं ने टंडन जी पर भी सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया। हिंदी का पुरजोर समर्थन करने वाले राजर्षि जी पर अकसर हिंदी का अधिक समर्थन और अन्य भाषाओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगता रहा है। साथ ही उनके और नेहरू जी के संबंधों को लेकर भी हमेशा मतभेद रहे हैं। 1961 में हिंदी भाषा को देश में अग्रणी स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिया गया। 23 अप्रैल, 1961 को उन्हें भारत सरकार द्वारा 'भारत रत्‍‌न विभूषित किया गया। 1 जुलाई, 1962 को हिंदी के परम प्रेमी पुरुषोत्तम दास टंडन जी का निधन हो गया।

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