'चुनौती विकास बनाम पर्यावरण नहीं, बल्कि सतत विकास अपनाने की', पर्यावरण सम्मेलन में बोले भूपेंद्र यादव
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने पर्यावरण सम्मेलन में कहा कि चुनौती विकास बनाम पर्यावरण नहीं, बल्कि सतत विकास अपनाने की है।

चुनौती विकास बनाम पर्यावरण नहीं।
HighLights
भूपेंद्र यादव ने सतत विकास को अपनाने पर जोर दिया।
भारत 2070 नेट-जीरो लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
CJI ने संरक्षण व विकास में तालमेल की चुनौती बताई।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सतत विकास पर जोर दिया और कहा कि आज दुनिया के सामने चुनौती विकास व पर्यावरण के बीच चुनाव करने का नहीं है बल्कि सतत विकास और अस्थिर विकास के बीच है। ऐसे में हमें पर्यावरण अनुकूल विकास को अपनाना होगा।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां मौजूदा समय में किसी एक देश तक सीमित नहीं है बल्कि इससे पूरी दुनिया प्रभावित है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री शनिवार को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन में दुनिया के करीब 17 देशों के न्यायाधीश, नीति निर्माता, पर्यावरण विशेषज्ञ व संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) व एशियाई विकास बैंक (एडीबी) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन से जुड़े प्रतिनिधि भी शामिल हुए है।
केंद्रीय मंत्री यादव ने इस मौके पर कहा कि भारत की 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे है। विद्युत के उत्पादन में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 54.18 प्रतिशत तक हो गई है।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है व सौर ऊर्जा के विकास के मामले में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। जो यह दर्शाता है कि आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।
उन्होंने इस मौके पर वनों के बढ़े क्षेत्रफल व वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों का भी जिक्र किया है। साथ ही कहा कि वन्यजीव संरक्षण का मतलब सिर्फ जानवरों की रक्षा करना नहीं है बल्कि जीवन के नाजुक ताने-वाने की भी रक्षा करना है, जो हमें जीवित रखता है।
अदालतों के सामने चुनौती संरक्षण व विकास के बीच तालमेल बिठाने कीः सीजेआई
पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन से जुडे इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने भी संबोधित किया और कहा कि अदालतों के सामने अब यह सवाल नहीं है कि संरक्षण या विकास में से किसे चुना जाए बल्कि असली चुनौती यह है कि इन दोनों के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाए। दोनों को एक साथ कैसे कायम रखा जाए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरणीय न्याय का बरगद का वृक्ष बताया।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण कड़ा होना चाहिए, लेकिन इतना व्यावहारिक और समझदार भी होना चाहिए कि वह वास्तविक दुनिया की जरूरतों के साथ तालमेल बिठा सके। उन्होंने जोर दिया कि अब आंदोलन पर्यावरण अधिकारों से बढ़कर जलवायु अधिकारों की तरफ बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव नागरिकों के समानता, आजीविका व स्वास्थ्य जैसे मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करते हैं।
सीजेआई ने कहा कि कोई भी देश अकेले जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से नहीं निपट सकता, इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग व पर्यावरण नुकसान से बचाने के लिए साझा नियमों की आवश्यकता है।
इस मौके पर देश के एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी व एनटीजी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने अपनी बात रखी। वहीं एनजीटी ने अपना एक मोबाइल एप भी लॉन्च किया
