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कुम्हार टोली को नए सिरे से गढ़कर दुनिया को बंगाल की उत्सव धर्मिता से करवाएं परिचय: प्रोबीर कृष्ण देब

By Rumani GhoshEdited By: Deepak Gupta
Published: Sat, 10 Oct 2026 08:11 PM (GMT+05:30)

प्रोबीर कृष्ण देब ने बंगाल के दुर्गोत्सव को कला-संस्कृति का केंद्र बताया और कुम्हारटोली के पुनर्वास पर जोर दिया। उन्होंने ...और पढ़ें

प्रोबीर कृष्ण देब, चित्रकार।

प्रोबीर कृष्ण देब, चित्रकार।

HighLights

  1. प्रोबीर कृष्ण देब ने दुर्गोत्सव को कला-संस्कृति का केंद्र बताया।

  2. कुम्हारटोली के पुनर्वास और पारंपरिक कला संरक्षण पर विशेष जोर दिया।

  3. व्यावसायिकता पर चिंता जताते हुए परंपराओं को बचाने की अपील की।

रुमनी घोष। महालय के मौके पर शनिवार को ऐतिहासिक ईडन गार्डन से 1000 महिलाओं द्वारा उलुध्वनि देकर, शंख बजाकर और 10,000 ढाकियों द्वारा एक साथ ढाक पर थाप देकर मां दुर्गा का आह्वान किया गया... और इसके साथ ही बंगाल की धरती देवी के आगमन की तैयारियों और दुर्गोत्सव के उल्लास से भर उठी है। दुनिया की यह सबसे बड़ी मुक्त कला प्रदर्शनी (ओपन एयर आर्ट गैलरी) बंगाल व बंगालियों के लिए धार्मिक आयोजन न होकर कला-संस्कृति, जनजागरण और शक्ति प्रदर्शन का केंद्र रही। इसी आधार पर वर्ष 2021 में यूनेस्को ने बंगाल के दुर्गोत्सव को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (इनटैंजिबल कल्चरल हैरिटेज) घोषित किया... और 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर सनातन परंपरा की गूंज को और विस्तारित रूप से दुनिया भर में पहुंचाने की कोशिश हुई। कार्पोरेट कल्चर और बाजार के शोर के बीच उत्सव धर्मिता को कैसे बरकरार रखा जाए?

269 साल पहले 1757 में बंगाल के प्रतिष्ठित शोभा बाजार राजबाड़ी के राजा नवकृष्ण देब द्वारा महल प्रांगण में भव्य स्तर पर शुरू किए गए दुर्गोत्सव की परंपरा को उनके वंशजों ने आज भी जीवित रखा है। वर्तमान में इस आयोजन की बागडोर संभालने वाले आठवीं पीढ़ी के उत्तराधिकारियों में से एक और ख्यात चित्रकार प्रोबीर कृष्ण देब का कहना है कि बंगाल के लिए दुर्गोत्सव सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्सव है... और उत्सव धर्मिता को बचाने के लिए सरकार से लेकर समाज तक हर किसी को आगे आना होगा। चौराहे-चौराहे पर पांडाल व प्रदर्शन के बजाय सही मायनों में सर्व साधारण के लिए दुर्गोत्सव का आयोजन हो।

आडंबर के स्थान पर परंपराओं को लौटाकर लाया जाए। कुम्हारटोली को नया स्वरूप देने की बरसों पुरानी योजनाओं को साकार कर दुनिया को बंगाल की असली कला से परिचय करवाया जाए, ताकि लोग दुर्गोत्सव के असल मकसद को जान सकें...'जनजागरण' होते देख सकें। पारिवारिक दस्तावेजों, इतिहास में दर्ज संदर्भों और विरासत में मिली स्मृतियों के आधार पर दुर्गा पूजा की परंपराओं को लेकर 50 चित्रों का संकलन तैयार करने वाले प्रोबीरकृष्ण देब कहते हैं कि हमने अपनी क्षमताओं अनुसार इसे संजोया। अब नई पीढ़ी को यह जिम्मेदारी उठानी होगी। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

कहा जाता है कि प्लासी के युद्ध में मुगलों की हार के बाद शोभा बाजार राजबाड़ी (राजमहल) में दुर्गोत्सव का आयोजन हुआ था?

- सही है... यह इतिहास में दर्ज घटनाक्रम है, लेकिन मैं इस उत्सव के पीछे छिपे उद्देश्य के बारे में कहना चाहता हूं। बंगाल में दुर्गोत्सव की परंपरा कब से शुरू हुई, इसको लेकर इतिहासविदों और जानकारों की अलग-अलग राय है, लेकिन मैं अपनी पारिवारिक परंपराओं की बात रखता हूं। आमतौर पर राजपरिवारों में दुर्गोत्सव की परंपरा पहले से निभाई जाती रही है, लेकिन वह सिंह द्वार (मुख्य द्वार) के भीतर ही आयोजित किया जाता था, यानी आम लोगों या जनता को इसमें शामिल होने का अधिकार नहीं था। मेरे पूर्वज, यानी राजा नवकृष्ण देब ने 1757 में जब दुर्गोत्सव की शुरुआत की, उसमें पहली बार आम लोगों के लिए द्वार खोले गए थे। यही तो असली उत्सवधर्मिता है... जाति, धर्म, वर्ण, रंग, भाषा भेद से ऊपर उठकर हर किसी का एक स्थान पर मिलन। हम लोग मानते हैं कि बंगाल में इसकी व्यापक शुरुआत शोभा बाजार दालान (दहलीज) से ही हुई थी।

शोभा बाजार के दुर्गोत्सव में अंग्रेजों को बतौर अतिथि बुलाया जाता था। इसको लेकर काफी आलोचना भी होती है?

- कुछ लोग आलोचना करते थे, लेकिन अंग्रेजों को बुलाने के पीछे एक बड़ा मकसद था। अंग्रेजों या ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों को हमारे धर्म-संस्कृति से परिचय करवाना था। उन्हें देवी दुर्गा या हमारे इष्ट की शक्ति से परिचय करवाना भी था। आज जो देश-दुनिया तक ढाक और उलुध्वनि की गूंज पहुंची और विश्व रिकार्ड बना, इसका मकसद भी वही था।


दुर्गोत्सव को नवजागरण का मंच कहा जाता है। इस उत्सव के जरिये समाज में कई बदलाव आए? कैसे?

- आजादी की लड़ाई में दुर्गोत्सव के जरिये जन जागरण के कई उदाहरण मिल जाते हैं, लेकिन मैं आपको सामाजिक बदलाव का एक किस्सा सुनाता हूं। यह तो सर्व विदित है कि देवी पूजा में बकरे की बलि का प्रचलन था। शोभाबाजार में नवकृष्ण देव के पोते यानी तीसरी पीढ़ी के उत्तराधिकारी रमाकांतो देब ने बलि प्रथा बंद करवाई थी। तब से शोभाबाजार में जानवरों की बलि नहीं चढ़ाई जाती है। उस समय उन्होंने इसी देवी दालान (देवी मंडप) से परंपरा के नाम पर चली आ रही कुरीतियों को बंद करवाने की दिशा में कदम उठाया था। कालांतर में समाज ने इसे स्वीकारा। इसी तरह अनेक सामाजिक बदलाव आए।

आपकी स्मृतियों में दुर्गोत्सव से जुड़ीं कौन-कौन सी परंपराएं जीवित हैं? कोई ऐसी परंपरा जो अब आपको नजर नहीं आती है?

- मैंने बचपन से लेकर अब तक जितने आयोजन देखे हैं, उनमें सबसे ज्यादा स्मृतियां मेले से जुड़ी हुई हैं। शोभा बाजार राजबाड़ी परिसर में बड़ा मेला लगता था। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित हर धर्म के लोग शामिल होते थे। लखनऊ की छड़ी, बिहार की उल्की (टैटू) की बड़ी मांग रहती थी। अलग-अलग जगह के भोजन और मिठाइयों का स्वाद इसका बड़ा आकर्षण होता था। देशभर से बड़े-बड़े संगीतज्ञ और कलाकारों के कार्यक्रम होते थे। दुर्गोत्सव सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं होता था, बल्कि कला-संस्कृति से लेकर लोगों की आमदनी का जरिया होता था। एक और बात मेरी स्मृति पटल पर बहुत स्पष्ट तौर पर अंकित है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन में शामिल होने बिहारी और उप्र के गांव-देहात से लोगों का हुजूम आता था। वे लोग विसर्जन में जुलूस में शामिल होते थे और हिंदी में दुर्गा माई की जय के नारे लगाते थे। बांग्ला भाषा में गाए जाने वाले गीत और गांव-देहात की हिंदी-भोजपुरी मिलकर एकाकार हो जाते थे। एक लंबे समय से यह दृश्य अब दिखाई नहीं देता है। ऐसी ही कई छोटी-छोटी चीजों को दोबारा जीवित करना चाहिए।

क्या आपको लगता है कि दिनों दिन दुर्गोत्सव पर व्यावसायिकता हावी हो रही है? यह शक्ति प्रदर्शन का केंद्र भी बनता जा रहा है?

- बिलकुल सही। 1980-90 के दशक तक भी कोलकाता में दुर्गोत्सव का माहौल अलग था। चुनिंदा चर्चित पांडालों के बीच एक कलात्मक प्रतिस्पर्धा थी। उसके बाद यह बाजारवाद का शिकार हो गया। अब तो हालत यह है कि हर चौराहे, गली का अपना दुर्गोत्सव। आयोजकों के बीच अहम की लड़ाई में हर साल दुर्गा पांडालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इससे दुर्गोत्सव के सार्वजनिक आयोजन की परिकल्पना को ही धक्का लग रहा है। जाति, धर्म, समाज, वर्ण भेद से ऊपर उठकर एक साथ उत्सव मनाने की परंपरा खत्म होती जा रही है। यही नहीं, इससे आम लोगों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ रहा है। मोहल्ले में यदि चार पूजा पांडाल बनेंगे तो, चारों को चंदा देना मजबूरी है। पांडालों की संख्या सीमित होनी चाहिए और उनमें होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों की गुणवत्ता बढ़नी चाहिए।

क्या विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद भी संरक्षण की जरूरत है?

- हां, बिलकुल है। दुर्गोत्सव को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से निश्चित रूप से इसकी पहचान और ख्याति बढ़ी है। इसकी वजह से पर्यटकों की संख्या भी बहुत बढ़ी है। देश के अलग-अलग राज्यों व दुनियाभर से लोग फोन कर शोभाबाजार राजबाड़ी की पूजा में शामिल होने की इच्छा जताते हैं। टूर-पैकेज वाले भी सैलानियों को लेकर आते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सिर्फ इससे संरक्षण नहीं होगा। सरकार और समाज को बहुत अलग तरह से सोचना होगा।

यूनेस्को लिस्ट में आने के बाद कोलकाता में दुर्गा पूजा अब टूरिज्म इवेंट बन गया है। पिछले साल 4.5 करोड़ लोग आए। उप्र के अयोध्या, वाराणसी (काशी) और प्रयागराज (इलाहाबाद) की तरह क्या बंगाल में भी धार्मिक कारिडोर बन सकता है?

- निश्चित तौर पर। बंगाल में बहुत से धार्मिक पीठ हैं, जिन्हें इस कारिडोर में शामिल किया जा सकता है। कालीघाट, दक्षिणेश्वर काली मंदिर, मायापुरी इस्कान मंदिर, चैतन्य महाप्रभु का जन्मस्थान नवद्वीप, रामकृष्ण परमहंस-जगत जननी मां शारदा के जन्म स्थल, बेलूर मठ सहित कई चर्चित स्थल हैं। और भी कई ख्यात मंदिर हैं। धार्मिक पर्यटन स्थल ही नहीं, बल्कि शांति निकेतन-सुंदरवन भी बंगाल आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है।

पारंपरिक पूजा विरुद्ध थीम पांडाल को लेकर काफी बहस हो रही है? क्या थीम के चक्कर में मां की सनातन एकचाला मूर्ति, चौखट और वैदिक मंत्रों वाली पूजा धीरे-धीरे लोग भूल रहे हैं?

- पारंपरिक पूजा और थीम पांडाल पूजा दोनों का अपना महत्व है। शोभाबाजार में हम पारंपरिक ढंग से ही पूजा करते हैं। हमारे यहां मां दुर्गा की मूर्ति का चेहरा, पहनावा आपको पारंपरिक ही मिलेगा, लेकिन क्लबों या पूजा समितियों द्वारा आयोजित दुर्गोत्सव में थीम पूजा पांडाल का प्रचलन है। एक तरह से यह आकर्षण का केंद्र भी रहता है। लोग दूर-दूर से इन पांडालों को देखने आते हैं। इन सबका बंगाल की जीडीपी को बढ़ाने में बड़ा योगदान होता है। इसे कायम रहना चाहिए। जैसे इस दुर्गोत्सव में एक पांडाल में ख्यात पुतुल नाच (कठपुतली नृत्य) को थीम बनाया गया है। इसमें मेदिनीपुर का पुतुल नाच भी शामिल है, जो लगभग मृतप्राय है। यह खोती जा रही कलाओं और कलाकारों को जीवनदान देने का भी तरीका है। जहां तक थीम की वजह से विवाद की बात है, तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है। कमेटी बनाकर नियंत्रित करने का तरीका ढूंढा जा सकता है। रोक लगाने की जरूरत नहीं है।

क्या आपको नहीं लगता कि जितने ज्यादा पांडाल, उतने मूर्तिकारों, पांडाल बनाने वाले कारीगरों, पंडितों, फूल-सब्जी वालों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजकों व कलाकारों को काम मिलेगा?

- नहीं। संख्या ज्यादा बढ़ाने से हर चीज की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। बेशक मूर्तिकारों को ज्यादा काम मिल रहा है, लेकिन इस दबाव में वह एक अच्छी मिट्टी की मूर्ति बनाने का समय नहीं निकाल पा रहे हैं। मिट्टी की मूर्ति की जगह छोटे-छोटे पांडालों में प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्ति पहुंच रही है। यदि पांडाल कम होंगे, तो वह मिट्टी की अच्छी मूर्ति गढ़कर अपनी कला का बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। इसी तरह कारीगरों, पंडितों, फूल-सब्जी वालों सहित कलाकारों का भी मामला है। हां, यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि चार दुर्गा पांडालों में काम करने के बजाय एक में ही काम कर वह बेहतर रोजगार कर सकें। अपनी मेहनत की लागत निकाल सकें। इसी परिकल्पना को लेकर ही कुम्हार टोली पुनर्वास योजना बनाई गई थी। हालांकि इस पर काम नहीं हो सका।

कुम्हार टोली पुनर्वास योजना क्या थी?

- कुम्हार टोली, कोलकाता शहर के उत्तरी भाग में हुगली नदी के तट पर स्थित लगभग 250 साल पुराना मोहल्ला है। यह स्थान मुख्य रूप से देवी-देवताओं की मिट्टी की प्रतिमाएं बनाने वाले कारीगरों (कुम्हारों और मूर्तिकारों) के लिए विश्वभर में जाना जाता है। गंगा के किनारे बसी इस बस्ती से ही 90 प्रतिशत मूर्तियां सप्लाय होती हैं। यानी, एक तरह से मूर्तिकारों की टोली है।

यूरोप में जिस तरह से पुराने शहरों को संरक्षित किया जाता है, उसी तरह से इस बस्ती को नए सिरे से बसाने की योजना थी, जिसमें आधुनिक सुविधाएं और संसाधन के साथ-साथ इतिहास और कलात्मक पक्ष को भी दुनिया के सामने रखने की परिकल्पना थी। इससे यहां के मूर्तिकारों को अधिक से अधिक रोजगार मिलता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए मिट्टी की मूर्तियों के उपयोग को बढ़ावा मिलता। इसे देश-दुनिया के ख्यात आर्ट्स कालेजों और विश्वविद्यालयों से जोड़ने की भी योजना थी, ताकि नई पीढ़ी इस पारंपरिक कला को सीख सके। कुम्हार टोली सिर्फ मूर्तिकारों का ही गढ़ नहीं है, बल्कि यहां मूर्ति के साथ-साथ देवी-देवताओं की पोशाक, गहनों, पांडाल, फूल के कारोबार को नए सिरे से आकार दिया जा सकता है।

यह शोधार्थियों का गढ़ बन सकता है, जहां सनातन धर्म और बंगाल की लोक कला संस्कृति पर शोध हो। सोचिए, यदि ऐसा होता है तो यह एक पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो सकता है। मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं यहां किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि बंगाल सरकार की बात कर रहा हूं। दुर्गोत्सव बंगाल की जीवनशैली से लेकर आजीविका तक जुड़ा हुआ है, इसलिए हर विचारधारा की सरकार के लिए यह सबसे अहम आयोजन है। बावजूद इसके यह अभी तक आकार नहीं पा सकी। राज्य व केंद्र सरकारों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

एआई के जमाने में कारीगर परंपरा को जीवित रखना क्या चुनौतीपूर्ण नहीं है? इसे कैसे बचाया जा सकता है?

- एआई के जमाने में ही तो इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इसके जरिये ही दुनिया को असल और नकल में फर्क बताया जा सकता है।

पंडाल में डीजे और बालीवुड गाने पंडाल में सुनाई पड़ते हैं। ढाक, शंख, उलू ध्वनि विलुप्त क्यों हो रही है? आज के दौर में भी ढाकियों को दिनभर ढाक बजाने के बाद सिर्फ 500 रुपये मिलते हैं, क्या इसे बढ़ाया जाना चाहिए? इस लोक-कला को बचाने के लिए सरकार और समाज को मिलकर क्या करना चाहिए?

- बंगाल की वर्तमान सरकार द्वारा डीजे पर लगाई गई रोक स्वागतयोग्य है। यह संस्कृति ही नहीं, सेहत को भी दूषित कर रही थी। जहां तक ढाक, शंख की बात तो मुझे नहीं लगता है कि यह कला लुप्त हो रही है। एक समय था जब सिर्फ पुरुष ढाकी ही इस वाद्य को बजाते थे, लेकिन अब बड़ी संख्या में युवतियां इससे जुड़ रही हैं। शोभाबाजार राजबाड़ी में जिनके दादा-पिता ढाक बजाते थे, अब उसी परिवार की बेटियां साड़ी और स्नीकर शूज (कसरत या दौड़ने के लिए डिजाइन किए गए जूते) पहनकर ढाक बजाने आती हैं।

इस परंपरा को संभालने के लिए नई पीढ़ी कितनी तैयार है?

- नई पीढ़ी...यानी जेन जी इस दायित्व को निभाने में पूरी तरह सक्षम है। शायद हमारी पीढ़ी से ज्यादा सक्षम...। कम से कम मैं तो यही उम्मीद रखता हूं। दरअसल उनके पास वैश्विक एक्सपोजर है, नए-नए आइडियाज हैं और प्लानिंग है। बस उन्हें हमारी पुरानी परंपराओं से वाकिफ करवाना जरूरी है। अब आप हमारे परिवार को ही ले लीजिए। हमारी 10वीं-11वीं पीढ़ी हर साल इस मौके पर यह परंपरा हम लोग अभी तक निभा रहे हैं। दुनिया में कहीं भी हो, सभी चार दिन के लिए यहां इकट्ठा होते हैं। इस बार के आयोजन में 11वीं पीढ़ी के बच्चे भी शामिल होंगे। आयोजन का दायित्व भले ही हमारे (आठवीं पीढ़ी) के पास है, लेकिन वे सब हमें देख-देखकर सीखते हैं। एक ओर बड़ी रोचक बात है...हमारी 10वीं-11वीं पीढ़ी में लड़कियों की संख्या ज्यादा है। जाहिर वह उस समय दुर्गोत्सव का दायित्व वास्तव में हमारे घर की दुर्गाओं के हाथ में ही होगा...यह कितना बड़ा सामाजिक बदलाव होगा।

ब्रिटिश काउंसिल स्टडी- 2019 के मुताबिक दुर्गा पूजा की क्रिएटिव इकानामी वैल्यू लगभग 4.5 बिलियन डालर (लगभग 37,000 करोड़) थी। यह बंगाल की जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है और 8 प्रतिशत लोगों के लिए आय का साधन है।