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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 21, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

इमरजेंसी के 44 साल : परिवार की महिलाओं को किया जलील, पिता-भाई को हथकड़ी लगा कोर्ट तक ले गए पैदल

By Sanjay PokhriyalEdited By:
Published: Fri, 21 Jun 2019 09:45 AM (IST)Updated: Fri, 21 Jun 2019 02:19 PM (IST)

सत्याग्रह को विफल करने और मेरी गिरफ्तारी के लिए नमकमंडी स्थित हमारे घर पर एक-एक घंटे के बाद 50-50 पुलिसवालों ने छापेमारी शुरू कर दी।

इमरजेंसी के 44 साल : परिवार की महिलाओं को किया जलील, पिता-भाई को हथकड़ी लगा कोर्ट तक ले गए पैदल
इमरजेंसी के 44 साल : परिवार की महिलाओं को किया जलील, पिता-भाई को हथकड़ी लगा कोर्ट तक ले गए पैदल

विपिन कुमार राणा, अमृतसर। आपातकाल के दौर में कानून नाम की कोई चीज नहीं बची थी। सरकार के आदेश थे, जैसे-तैसे सत्याग्रह को दबाना है। फिर इसके लिए सत्याग्रह की घोषणा करने वालों के परिवारों तक को प्रताड़ित करने में कसर नहीं रखी गई थी। 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा और उसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लगे प्रतिबंध के विरोध में मुझे 16 जुलाई 1975 को नमकमंडी चौक में सत्याग्रह करना था। सत्याग्रह को विफल करने और मेरी गिरफ्तारी के लिए नमकमंडी स्थित हमारे घर पर एक-एक घंटे के बाद 50-50 पुलिसवालों ने छापेमारी शुरू कर दी। परिवार की महिलाओं को जलील व मानसिक प्रताड़ित किया गया। मैं टूट जाऊं, इसलिए पिता व भाई को गिरफ्तार किया और हथकड़ी डाल नमकमंडी से जिला कचहरी तक पैदल ले गए।

सत्याग्रह में 10 माह जेल यात्रा करने वाले अमृतसर के नगर सुधार ट्रस्ट के पूर्व चेयरमैन व पूर्व मेयर बख्शी राम अरोड़ा आपबीती सुनाते हुए भावुक हो गए। यादों के झरोखों के जरिये यकायक उसी दौर में पहुंच गए। सत्याग्रह की यादों को ताजा करते हुए उस समय में रहा जुनून उनके चेहरे पर दिखने लगा। उन्होंने बताया कि परिवार की प्रताड़ना से कहीं न कहीं वह अंदर से टूट रहे थे। पिता रामप्रकाश अरोड़ा और बड़े भाई जसवंत राय अरोड़ा को गिरफ्तार कर जिस तरह जून की गर्मी में आठ दस किलोमीटर पैदल चलाकर कोर्ट में पेश किया गया, वह प्रताड़ना की हद थी।

वेश बदलकर वह भी कचहरी पहुंचे और अपने वकील वासुदेव बलल के जरिये पिता व भाई को संदेश भेजा कि अगर वह प्रताड़ना सहन नहीं कर पा रहे हैं तो मैं सरेंडर कर देता हूं, लेकिन आगे से उनका जवाब मिला- ‘हमारी वजह से कमजोरी नहीं दिखानी। हम ठीक हैं, तुम अपने सत्याग्रह के लिए डटे रहो।’ उनके इन शब्दों में मेरा जज्बा दोगुना कर किया और हम 16 जुलाई 1975 को होने वाले सत्याग्रह की तैयारियों के लिए गुप्त बैठकों में डट गया।

जहां का केस बनाया, वह जगह आज तक नहीं देखी

आपातकाल में मुझ पर और साथियों डॉ. कुलदीप, ओम प्रकाश कालिया, डॉ. तुलसीदास, डॉ. ब्रह्म देव, सुधीर महाजन, अंबा प्रसाद, हरबंस लाल सूरी पर 107/51 और डीआइआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) के तहत केस दर्ज किया गया। सुल्तानविंड थाने की राम बगीची के घटनास्थल दिखाकर केस दर्ज किया गया। खास बात यह है कि जिस जगह को घटनास्थल दिखाकर केस दर्ज किया गया, उसे मैंने तब तो क्या, आज तक नहीं देखा है। पुलिस से एक गलती यह हो गई कि तब मैं जनसंघ का जिला सचिव था, पर केस में मुझे संघ चालक बना दिया गया। इसमें मैं आपातकाल के खिलाफ भाषण दे रहा था और बाकी साथी उसे सुन रहे थे।

जमानत मिलते ही हथकड़ी से हाथ निकाल भाग

हमें पता था कि केस से जमानत मिलते ही पुलिस किसी नए केस में दोबारा गिरफ्तार कर लेगी। हाथ पतला और हथकड़ी का साइज बड़ा होने की वजह से उसमें से अपना हाथ कोर्ट में पहुंचते ही निकाल लिया। जैसे ही कोर्ट ने जमानत दी, वैसे ही पुलिस वाले को धक्का मार वहां से भाग खड़ा हुआ।

खत्म हो गया था टिंबर का कारोबार

परिवार में तीन बेटियां और आठ माह का बेटा था, जब मेरी गिरफ्तारी हुई। गिरफ्तारी से थोड़ा समय पहले ही पिता जी ने उन्हें कटड़ा कर्म सिंह में व्यक्तिगत तौर पर टिंबर का काम शुरू करवाकर दिया था, लेकिन जेल यात्रा के बाद सारा कारोबार ठप हो गया। दस साल का समय कारोबार को दोबारा शुरू करने में लगा, लेकिन जेल में जब लोगों का हाल देखा कि वह किन पारिवारिक हालात में सत्याग्रह में उतरे और गिरफ्तारी दी, उसने हौसला बढ़ाने का काम किया। यही वजह रही कि बाहर आते ही संगठन के काम के साथ-साथ दोबारा कारोबार को खड़ा किया।

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