नीलू रंजन, नई दिल्ली। आयुर्वेदिक दवाओं की दुनिया के बाजार में छाने की भारत की कोशिशों पर जड़ी-बूटियों की किल्लत भारी पड़ सकती है। चार दिन तक चले महामंथन के दौरान आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली कंपनियों ने जड़ी-बूटियों की कमी और उनकी गुणवत्ता का मुद्दा उठाया। आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने इसके लिए जरूरी कदम उठाने का आश्वासन दिया।

अभी तक माना जा रहा था कि आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होना दुनिया के बाजार में पैठ बनाने में सबसे बड़ी बाधा है। लेकिन, गुणवत्ता वाली दवाइयों के सहारे से भारतीय बाजार में एलोपैथ की दवाओं को टक्कर देने वाली कंपनियों का कहना था कि उनकी सबसे बड़ी समस्या गुणवत्तापूर्ण जड़ी-बूटियों का अभाव है। देशी बाजार में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उन्हें उचित मात्रा में जड़ी बूटियां नहीं मिल पा रही है। जो मिल भी रही हैं, उनकी गुणवत्ता संदेह के घेरे में है। ऐसे में दुनिया के बाजार में छाने के पहले सरकार को जड़ी-बूटियों के पर्याप्त उत्पादन सुनिश्चित करना चाहिए।

दुनिया में आयुर्वेदिक दवाओं का निर्यात बढ़ाने पर मंथन के लिए चल रहे सम्मेलन के दौरान एमिल फार्मास्युटिकल के चेयरमैन केके शर्मा ने कहा कि जिस रफ्तार से आयुर्वेदिक दवाओं की मांग रही है, उस रफ्तार इसके लिए आवश्यक जड़ी-बूटियों की उपलब्धता नहीं बढ़ रही है। ऐसे में कंपनियों को कम गुणवत्ता वाली जड़ी-बूटियों से काम चलाना पड़ रहा है। जाहिर है इससे दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल काम है। उन्होंने कहा कि जंगलों में मिलने वाली कुछ जड़ी-बूटियां दुर्लभ हैं। अत्यधिक दोहन से यह विलुप्त हो सकती है। ऐसे में सरकार को इन जड़ी-बूटियों को खेतों में उगाने की तकनीक विकसित करने पर काम करना चाहिए।

जब तक इन जड़ी-बूटियों की बड़े पैमाने पर खेती नहीं होगी और उनकी गुणवत्ता के मानक तय नहीं किये जाएंगे। आयुर्वेदिक दवाओं की विश्व बाजार में धमक बनाना मुश्किल होगा। ध्यान देने की बात है कि एमिल फार्मास्युटिकल बीजीआर-34 नाम की दवा का उत्पादन करती है, जो डायबटीज के इलाज में एलोपैथी दवाओं को कड़ी टक्कर दे रही है और दो सालों के भीतर देश में 20 बड़े ब्रांड में स्थान बना चुकी है। सम्मेलन स्थल के पास ही लगाए गए आरोग्य मेले में विदेशी प्रतिनिधियों की सबसे ज्यादा दिलचस्पी इसी दवा में दिखाई। यह दवा सीएसआइआर के आने वाले लखनऊ के एनबीआरआइ ने विकसित की है।

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Posted By: Manish Negi