माला दीक्षित, नई दिल्ली। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का फैसला आए आठ महीने बीत गए हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अभी तक हिन्दी अनुवाद सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जारी नहीं हुआ है। आम जनता से जुड़ा लोगों की उत्सुकता का केन्द्र बना ऐतिहासिक फैसला अभी सिर्फ अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। अयोध्या विवाद पर फैसला देने वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ की अगुवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने की थी। 

हिंदी समेत नौ भाषाओं में उपलब्ध कराए गए फैसले  

जस्टिस गोगोई ने ही देश की आमजनता की अंग्रेजी भाषा को समझने की कठि‍नाइयों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले अंग्रेजी के अलावा हिन्दी सहित करीब नौ भाषाओं में उपलब्ध कराने शुरू किये थे। उनके कार्यकाल में ही बहुत से फैसले हिंदी व अन्य भाषाओं में उपलब्ध हो चुके थे। कुछ फैसले तो एक से अधिक भाषा में उपलब्ध हैं। अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद सुप्रीम कोर्ट ने अहम मुकदमों में एक माना था और इसीलिए इस मुकदमें की लगातार 40 दिन तक सुनवाई की गई। यहां तक कि सोमवार और शुक्रवार के मिसलेनियस यानी नए मुकदमों को सुनने के लिए तय दिनों पर भी इस मुकदमे की सुनवाई चली थी। इस ऐतिहासिक मुकदमें पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को फैसला सुनाया था। 

वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है हिंदी में फैसला 

9 अगस्त को फैसला आए हुए 9 महीने पूरे हो जाएंगे लेकिन अभी तक फैसले का हिन्दी अनुवाद सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। इस फैसले के हिन्दी अनुवाद की बात इसलिए जरूरी है क्योंकि राम जन्मभूमि मामले में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे अपील थी। उत्तर प्रदेश की प्रादेशिक भाषा हिन्दी है। सुप्रीम कोर्ट के जनसंपर्क अधिकारी राकेश शर्मा कहते हैं कि सामान्य तौर पर मुकदमा जिस प्रदेश से आता है, उस प्रदेश की प्रादेशिक भाषा को अनुवाद में प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि कुछ फैसले एक से ज्यादा भाषाओं में भी अनुवादित हुए हैं। 

दो प्रमुख समुदायों के बीच रिप्रजेन्टेटिव सूट था यह फैसला 

जो फैसले रिपोर्टेबल होते हैं, उनका अनुवाद किया जाता है। इस हिसाब से तो राम जन्मभूमि मामले में आये फैसले का हिन्दी में अनुवाद होना चाहिए। वैसे भी इस मुकदमें का हिन्दी मे अनुवाद जरूरी इसलिए है क्योंकि यह मुकदमा सिर्फ पक्षकारों के बीच जमीन पर मालिकाना हक का नहीं था बल्कि देश के दो प्रमुख समुदायों के बीच रिप्रजेन्टेटिव सूट था यानी प्रतिनिधि वाद था, जिसमें  मूल पक्षकारों के अलावा अदालत के आदेश पर हिन्दू - मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों के प्रतिनिधित्व के लिए भी संगठनों को जोड़ा गया था और हिन्दू महासभा ऐसे ही पक्षकार बनाई गई थी।

 

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