अयोध्या [अमित शर्मा]। अक्सर मंदिरों में आपने श्रीचरणों की प्रतीक पादूकाएं देखी होंगी। बहुत से साधू संत भी पैरों में चप्पल जूते की बजाए लकड़ी की बनी पादुकाएं (खड़ाऊं) पहनते हैं। अयोध्या नगरी में चूंकि मंदिरों की संख्या अधिक है तो जाहिरा तौर पर महंत, संतों, साधुओं का भी डेरा रहता है। लिहाजा, यहां खड़ाऊं की मांग हमेशा बनी रहती है। ऐसे में एक व्यापार यहां स्वत: ही फलीभूत हुआ, वो है खड़ऊ बनाने का।

पीढ़ियों से धार्मिक नगरी अयोध्या में खड़ाऊं बनाने का काम चला आ रहा है। सरयू की नगरी में गंगा जमुनी तहजीब, खड़ाऊं के कारोबार में भी दिखती है। इसका दारोमदार मुस्लिम परिवार संभालते हैं। अयोध्या नगरी में नगर निगम के पास लाइन से बर्तनों, पूजन सामग्री और खड़ाऊं की दर्जन भर दुकाने हैं। यहां ऑर्डर पर भी और हाथों हाथ डिलिवरी के हिसाब से भी खड़ाऊं मिलती हैं।

इसी बाजार के एक कारखाने नुमा दुकान पर जागरण ऑनलाइन की टीम पहुंची। दुकान पर कुछेक खड़ाऊं सजीं थीं। भीतर लकड़ियां बिखरीं पड़ी थीं। कारीगर पूरी तल्लीनता से खड़ाऊं बनाने में जुटे हुए थे। 28 साल के आजम खान कहते हैं कि जबसे उन्होंने होश संभाला, खड़ाऊं ही बना रहे हैं। उनके वालिद भी खड़ाऊं बनाते थे और उनके पिताजी भी यहीं अयोध्या में खड़ाऊं बनाते थे। ये उनका पुस्तैनी काम है।

अयोध्या के अलावा सुल्तानपुर, गोरखपुर समेत आसपास के इलाकों में भी खड़ाऊं की काफी डिमांड रहती है। आजम बताते हैं, साधू संतों का जहां भी डेरा है, हम तक ऑर्डर आ जाता है। अधिकांशतः तो बल्क में ही ऑर्डर आते हैं। इसके अलावा अयोध्या में दर्शन करने के लिए आने वाले बहुत से लोग भी फैशन या शौक में खड़ाऊं लेकर जाते हैं।

रोजी रोटी का जरिया तो जब एक साथ ऑर्डर आता है तभी चलता है। आम और शीशम की लकड़ी से खड़ऊ बनाई जाती है। आरा मशीन से लकड़ी कटाने से लेकर फिनीशिंग तक का काम यहीं परिवार के लोग मिलकर करते हैं। एक खड़ऊ 25 से 28 रुपए की पड़ती है। एक जोड़ा खड़ाऊं, 30 रुपए से लेकर 50 रुपए तक के दाम में बेची जाती है।

आजम खान खुश हैं कि उनकी बनाई खड़ऊ हिन्दू मंदिरों में जाती है। जहां फितनापरस्त ताकतें हिन्दू मुस्लिम को भड़काने का मौका नहीं छोड़ती, वहीं अयोध्या के हिन्दू मुस्लिम अमन की इबारत लिखते नजर आते हैं। चाहे फूलों का कारोबार हो, दीपावली के दिये बनाने का या फिर खड़ाऊं का। आजम खान कहते हैं कि यहां अयोध्या में तो हिन्दू मुस्लिम परिवारों के बीच हमेशा से अमन चैन कायम रहा है।

माहौल कहीं से कैसा भी बनाने की कोशिश की जाए स्थानीय अयोध्यावासी मिलजुलकर रहते हैं। हम दीपावली पर हिन्दू मित्रों के यहां जाते हैं, वो ईद पर हमारे यहां आते हैं। आगे फैसला जो भी आए, अयोध्या की फिजा में घुला हिंदु-मुस्लिम प्रेम का ये रंग कभी फीका नहीं पड़ेगा।

चलते चलते हमने भी एक जोड़ी खड़ाऊं ली। पता था इस फैंसी युग में फैशन के अभ्यस्त हो चुके पैर खड़ाऊं पहन नहीं पाएंगे, लेकिन फिर भी कौमी सौहार्द्र की मिसाल 'खड़ाऊं' को अयोध्या की याद के तौर पर लेकर चल दिए, अगली गली की ओर, अयोध्या डायरी का अगल पन्ना लिखने।

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Posted By: Amit Singh

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