मुकेश पांडेय, अयोध्या। अदालत के आदेश पर साल 2003 में विवादित स्थल पर कराई गई खोदाई में मिले भग्नावशेषों से मंदिर के दावे को बल मिला था। उत्खनन की रिपोर्ट को हाई कोर्ट ने भी आत्मसात किया।दरअसल, उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने मार्च, 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को खोदाई कराने का आदेश दिया था। इसका मकसद यह पता लगाना था कि क्या मस्जिद से पहले प्राचीन मंदिर था? मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि जफरयाब जीलानी ने उस समय कहा, 'जो प्रक्रिया पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपनाई है, उससे हम संतुष्ट हैं।'

अदालत के आदेश पर 12 मार्च को रिसीवर एवं मंडलायुक्त रामशरण श्रीवास्तव के दिशा-निर्देशन में एएसआइ ने हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों के साथ वकीलों की मौजूदगी में खोदाई शुरू की। खोदाई अस्थायी मंदिर के आसपास के 10 फीट इलाके को छोड़कर कराई गई, जो सात अगस्त, 2003 तक चली। इस दौरान कुल 35 ट्रेंचों (गड्ढों) में खोदाई की गई। एएसआइ की टीम में भी दोनों समुदायों के कुल 14 पुरातत्व विशेषज्ञ शामिल थे। खोदाई की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी होती रही। फैजाबाद (अब अयोध्या) में तैनात दो जज प्रेक्षक के तौर पर उपस्थित रहे।

उत्खनन की शुरुआत गर्भगृह के पूर्व आने-जाने वाले दर्शन मार्ग के बीच रामचबूतरे के आसपास की खाली भूमि से हुई। शुरू के चार ट्रेंचों से कुछ खास हाथ नहीं लगा। बाद में पूर्व की तरफ इसी भूमि पर लगे तीन ट्रेंचों में विवादित ढांचे की फर्श दिखी। गड्ढा जे-6 में 72 सेंटीमीटर की गहराई पर सुर्खी एवं चूने से निर्मित फर्श मिला। इसी में रामचबूतरे का फर्श भी मिला, जिसका निर्माण अकबर के काल में हुआ था। इसका उल्लेख आईना-ए-अकबरी में भी मिलता है। इसके बाद एएसआइ दल को सफलता की किरण दिखने लगी। इसी के साथ उत्खनन का क्रम सघन और विश्वसनीय होता चला गया।

मानस भवन में सुरक्षित खोदाई में मिले अवशेष 

उत्खनन में मिले अवशेष उत्तर भारत में पाए जाने वाले मंदिरों से जुड़े विशिष्ट आकार का संकेत देते हैं। इनमें सजावटी ईंटें, दैवीय युगल, आमलक, द्वार चौखट, ईंटों का गोलाकार मंदिर, जल निकास का परनाला और एक विशाल इमारत से जुड़े 50 खंभे शामिल हैं। दैवीय युगल की तुलना शिव-पार्वती और गोलाकर मंदिर की तुलना पुराने शिवमंदिर से की गई है। यह सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच का माना गया है। इसके अलावा मगरमच्छ, घोड़ा, यक्षिणी, कलश, हाथी, सर्प आदि से जुड़े टुकड़े भी मिले।

प्राप्त अवशेष मानस भवन के विशेष कक्ष में रखे गए हैं। खोदाई में नीचे 15 गुणा 15 मीटर का एक चबूतरा मिला। इसमें एक गोलाकार गड्ढा है, जिससे लगता है कि वहां कोई महत्वपूर्ण वस्तु रखी थी। इसके केंद्र के ठीक ऊपर विवादित मस्जिद के बीच का गुंबद था। उत्खनन में मिले आमलक की व्याख्या करते हुए प्रसिद्ध पुरातत्वविद् केके मुहम्मद की मान्यता है कि उत्तर भारत के मंदिरों में शिखर के साथ आमलक लगाए जाने की परंपरा थी और इससे सिद्ध होता है कि उस स्थल पर मंदिर था।

अदालत ने स्वीकारी रिपोर्ट  

एएसआइ ने दो खंडों में विस्तृत रिपोर्ट, फोटोग्राफ, नक्शे और स्केच अदालत में पेश किए। इसके बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 20 बिंदुओं पर अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि रिपोर्ट को सुबूत के तौर पर विचार न करके रद कर दिया जाए। निर्मोही अखाड़ा ने अपनी आपत्ति में कहा कि सही स्थिति का पता करने के लिए पूर्व की ओर और उत्खनन हो। इन आपत्तियों पर लंबी बहस हुई।

इसके बाद फरवरी, 2005 में जस्टिस एसआर आलम, जस्टिस खेमकरन और जस्टिस भंवर सिंह ने सर्वसम्मति से 21 पन्नों का आदेश दिया, जिसमें कहा गया कि संभवत: किसी अदालत ने पहली बार सिविल प्रोसिजर कोड के तहत इतने बड़े इलाके की खोदाई के जरिये जांच-पड़ताल का आदेश दिया। एएसआइ की विस्तृत रिपोर्ट और फोटोग्राफ मुकदमे के सभी पक्षों के पास उपलब्ध हैं। 

जीपीआर सर्वेक्षण के बाद उत्खनन का आदेश

इससे पहले अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से जीपीआर सर्वेक्षण कराया था। यह कार्य टोजो विकास इंटरनेशनल नाम की कंपनी ने किया। फरवरी, 2003 में पेश रिपोर्ट में कहा गया कि जमीन के अंदर कुछ इमारतों के 184 भग्नावशेष हैं। इस रिपोर्ट पर मुकदमे के पक्षकारों की राय सुनने के बाद अदालत ने मार्च, 2003 में सिविल प्रोसीजर कोड के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को आदेश दिया।

13वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक के अवशेष मिले

रिपोर्ट में कहा गया है कि खोदाई में 13वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक के अवशेष मिले हैं। उनमें इतिहास के कुषाण, शुंग काल से लेकर गुप्त और प्रारंभिक मध्य युग तक के अवशेष हैं। गोलाकार मंदिर सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच का माना गया। प्रारंभिक मध्य युग 11-12वीं शताब्दी की 50 मीटर उत्तर-दक्षिण इमारत का ढांचा मिला। इसके ऊपर एक और विशाल इमारत का ढांचा है, जिसकी फर्श तीन बार में बनी। यह रिहायशी इमारत न होकर सार्वजनिक उपयोग की इमारत थी। रिपोर्ट के अनुसार, इसी के भग्नावशेष पर वह विवादित इमारत (मस्जिद) 16वीं शताब्दी में बनी।

विष्णुहरि शिलालेख से होती है मंदिर की पुष्टि 

एएसआइ की रिपोर्ट में 11-12वीं सदी के बीच निर्मित जिस इमारत के भग्नावशेष पर विवादित इमारत निर्मित होने की बात कही जाती है, उसका समीकरण ढांचा ध्वंस के समय मिले विष्णुहरि शिलालेख से भी स्थापित होता है। साकेत महाविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कविता सिंह कहती हैं कि इस पर उत्कीर्ण 20 पंक्तियों के विवरण से ज्ञात होता है कि विक्रमादित्य के करीब एक हजार साल बाद तत्कालीन अयोध्या के गहड़वाल वंशीय राजा गोविंदचंद्र ने भव्य मंदिर बनवाया।

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Posted By: Tanisk

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