सुरक्षित हवाई यात्रा के लिए सबसे जरूरी सही रोस्टरिंग: ग्रुप कैप्टन हांडा
किसी भी मनुष्य के मन में क्या चल रहा है, यह भांप पाना बहुत कठिन काम है, लेकिन रोस्टरिंग करते ...और पढ़ें

सुरक्षित हवाई यात्रा के लिए सबसे जरूरी सही रोस्टरिंग।
HighLights
विमान सुरक्षा में सही रोस्टरिंग और क्रू मैनेजमेंट सबसे अहम।
पायलटों के बीच उम्र, स्वभाव, तालमेल का अंतर महत्वपूर्ण।
फ्लाईदुबई घटना क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट की गंभीर विफलता दर्शाती है।
रुमनी घोष। फ्लाईदुबई विमान के काकपिट में पायलट पर हमला कर को-पायलट द्वारा विमान को हाईजैक कर क्रैश करवाने की कोशिश, फुकेट (थाईलैंड) से दिल्ली आ रहे विमान के पायलट द्वारा गांजा पीकर विमान को हजारों फीट गोता लगवाना और अहमदाबाद विमान क्रैश जैसी एक के बाद एक घटनाओं की वजह से विमान सुरक्षा मानकों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
चौंकाने वाली बात यह है कि 9/11 की घटना के बाद विमान सुरक्षा के लिए जिन मानकों को तय किया गया था, उनमें से कई अब चुनौतियां बनकर सामने आ रही हैं। ऐसे में सुरक्षित हवाई यात्रा को सुनिश्चित करने को लेकर उड्डयन उद्योग (एविएशन इंडस्ट्री) में नई बहस छिड़ गई है कि क्या सिर्फ तकनीकी अपग्रेडेशन से विमान हादसों को पूरी तरह से रोका जा सकता है? यदि नहीं, तो फिर क्या हल है?
112 साल पुराने इस उद्योग से जुड़े देश-दुनिया के विशेषज्ञ इस पर लगातार मंथन कर रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआइबी) के संस्थापक महानिदेशक रहे ग्रुप कैप्टन अरोबिंदो हांडा। 33 साल भारतीय वायुसेना में सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त होकर वह इस इंडस्ट्री से जुड़े और कोझिकोड विमान हादसा सहित अब तक 105 विमान दुर्घटनाओं की जांच कर चुके हैं। अपने लंबे अनुभव का हवाला देते हुए वह कहते हैं- सुरक्षित हवाई यात्रा के लिए तकनीक मददगार है, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है सही रोस्टरिंग...
यानी जिन दो पायलटों के हाथों सैकड़ों जान सौंपने जा रहे हैं, उनके बीच उम्र का अंतर, उनका स्वभाव, आपसी तालमेल और मानसिक स्थिति को भांपकर ड्यूटी चार्ट तैयार करना। वह लंबे समय तक इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन-एशिया पेसिफिक (आइसीएओ) से भी जुड़े रहे हैं। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने ग्रुप कैप्टन (रिटायर्ड) हांडा से विमान दुर्घटनाओं की जांच में सामने आने वाली लापरवाहियां, हादसे रोकने के तय मानक और उन कमियों को दूर करने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
फ्लाईदुबई की घटना को कैसे देखते हैं?
इस घटना को बहुत प्री-प्लान तरीके से अंजाम देने की कोशिश की गई थी। बेशक अभी तक पूरी जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है, लेकिन आप यदि पूरे घटनाक्रम को रिवर्स (उलटे क्रम में) करके देखा जाए तो हम पाएंगे कि कई प्वाइंट्स पर गंभीर चूक हुई। यदि जांच में पुष्टि हो भी जाए, तो भी इसे सिर्फ आतंकी घटना ठहराकर फाइल बंद करना भूल होगी। आतंकी घटना की जांच संबंधित देशों की सुरक्षा एजेसियां करेंगी, लेकिन एविएशन इंडस्ट्री के लिए यह क्रू रिसोर्स मैनजमेंट की गंभीर विफलता (सीआरएम लैप्स) है, जिसकी वजह से यह घटना घटी।
क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट फेलियर क्या है?
मैंने अपने करियर में अब तक 105 छोटी-बड़ी विमान दुर्घटनाओं की जांच की है। अपने अनुभव के आधार पर मैं यह मानता हूं कि सुरक्षित हवाई यात्रा के लिए एवडांस टेक्नोलाजी (उन्नत तकनीक) से ज्यादा जरूरी क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट (सीआरएम) है। 'क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट' ऐसा सिस्टम है, जो सुरक्षित और कुशल उड़ान संचालन सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध सभी मानवीय, सूचनात्मक और उपकरणों से जुड़े संसाधनों का इस्तेमाल करता है। इसमें चालक दलों के चयन से लेकर तकनीकी सुरक्षा तक के बहुत से पहलू होते हैं। इनमें भी सबसे अहम है पायलटों की सही रोस्टरिंग या शेड्यूलिंग, यानी किस उड़ान के लिए किन पायलटों की ड्यूटी लगाई जाए और पायलट, को-पायलट की पेयरिंग (जोड़ी) कैसे तय की जाए।
किस स्तर पर चूक नजर आ रही है?
देखिए, जिस रोस्टरिंग की बात मैं कह रहा था, वह कितना अहम है। फ्लाईदुबई के केस में पहली गंभीर चूक तो सही रोस्टरिंग नहीं होने की वजह से ही हुई है। दोनों देशों के बीच संबंध अच्छे नहीं होने के बावजूद इजरायल जाने वाले उड़ान के लिए को-पायलट के तौर पर ओमान के नागरिक को कैसे चुना गया? अगर उसे को-पायलट के तौर पर नहीं चुना गया होता, शायद यह घटना नहीं होती।
रोस्टरिंग का भी तय मानक है या फिर उपलब्धता के आधार पर चयन होता है?
देखिए, किसी इंसान के मन में क्या चल रहा है, इसे समझना बहुत मुश्किल है, लेकिन रोस्टरिंग करते वक्त कुछ व्यवहारिक पहलुओं का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। जैसे, पायलट और को-पायलट के बीच उम्र का अंतर बहुत ज्यादा नहीं हो। 10 साल। कई घटनाओं की जांच के दौरान यह बात सामने आई है कि पायलट और को-पायलट के बीच उम्र का बहुत अधिक अंतर होने की वजह से दोनों के बीच तालमेल का अभाव होता है।
उम्रदराज व अनुभवी पायलट कई बार जूनियर को-पायलट के सुझावों को नजरअंदाज कर देते हैं और बाद में वही हादसे का बड़ा कारण बनता है। कोझिकोड विमान हादसा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहीं, कई बार अनुभवी पायलट के सामने जूनियर को-पायलट अपनी बात ही नहीं रख पाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि रोस्टिंग के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए पायलट, को-पायलट के बीच अच्छा तालमेल हो। एक-दूसरे के साथ कई बार विमान उड़ा चुके हों।
एक-दूसरे की कार्यप्रणाली से वाकिफ हों। उनका एक-दूसरे के साथ इतना सामंजस्य हो कि आपात स्थिति में मिलकर निर्णय ले सकें। कायदे से तो यह होना चाहिए कि पायलट एक-दूसरे को अच्छे से जानते-पहचानते हों। एक-दूसरे की मानसिक स्थिति और पृष्ठभूमि से परिचित हों, ताकि यदि उनमें से कोई पायलट अवसाद या मानसिक परेशानियों के दौर से गुजर रहा हो, तो काउंटर पार्ट (सहयोगी पायलट) को इसकी जानकारी रहे। वह सतर्कता के साथ उनकी गतिविधियों पर नजर रख सके और आपात स्थिति में मदद कर सके। सेना में हम इसे 'बडी सिस्टम' कहते हैं।
क्या सिविल एविएशन इंडस्ट्री में 'बडी सिस्टम' लागू क्यों नहीं हो सकता?
सेना की कार्यप्रणाली बिलकुल अलग है। वहां बडी सिस्टम, यानी जवान दिन के '24 में 25 घंटे' साथ रहते हैं, यानी सोते-जागते, उठते-बैठते... हर वक्त। इसमें आपको अपने बडी को पूरी तरह से जानने का मौका मिलता है। यदि वह किसी अवसाद के दौर से गुजर रहा है या फिर उसके व्यवहार में यकायक कोई बदलाव आया है, तो वह एक-दूसरे से नहीं छिपता है। सिविल एविएशन इंडस्ट्री में यह संभव नहीं है।
हालांकि इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन (आइसीएओ यानी अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन) समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी कर विमान कंपनियों को सतर्क करती रहती है। देश-दुनिया के पायलटों को प्रशिक्षित करती रहती है, लेकिन कई बार कमियां रह जाती हैं। चूंकि पायलट अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं, तो एक-दूसरे को जानना तो दूर उन्हें एक साथ विमान उड़ाने का अनुभव भी नहीं हो पाता है। हालांकि विमान उड़ाने से पहले पायलटों को ब्रीफिंग दी जाती है... उनके हाथों में विमान सौंपने से पहले ग्राउंड स्टाफ उन्हें विमान की स्थिति से अवगत करवाता है।
मौसम की जानकारी दी जाती है। यदि मौसम खराब हो, उन्हें वैकल्पिक मार्ग (प्रस्तावित डायवर्ट रूट) के हिसाब से फ्यूल (तेल) उपलब्ध करवाया जाता है। इस दौरान दोनों पायलट आपस में मिलते हैं, पर कई बार ट्रैफिक जाम की वजह से पायलट सीधे काकपिट पर मिल पाते हैं। यह सब व्यवहारिक समस्याएं हैं। फ्लाईदुबई में स्मित मच्छर और ओमानी पायलट की इससे पहले मुलाकात हुई थी या नहीं, यह बात अभी सामने नहीं आई है।
क्या इससे पहले काकपिट में कभी दो पायलटों के बीच लड़ाई नहीं हुई? क्या दावे से यह कहा जा सकता है यदि दो पायलट एक-दूसरे को अच्छे से जानते हैं, तो उनमें मतभेद या लड़ाई नहीं होगी?
काकपिट में दो पायलटों के बीच लड़ाई बहुत आम घटना है। अंतरराष्ट्रीय तो छोड़िए, घरेलू उड़ानों में भी कई बार ऐसे मामले सामने आ जाते हैं। मुझे नौ-दस साल पहले की एक घटना याद है... पायलट और को-पायलट लिव इन में रहते थे। एक उड़ान में दोनों की रोस्टरिंग एक साथ कर दी गई। अब एक रात पहले ही दोनों के बीच निजी कारणों से जमकर विवाद हुआ। दूसरे दिन जब दोनों काकपिट में मिले तो दोनों के बीच विवाद बढ़ गया और नौबत हाथापाई तक आ गई। इस तरह की और भी कई घटनाएं हैं, लेकिन काकपिट के भीतर एक पायलट का दूसरे पायलट पर हमला कर विमान को हाईजैक कर क्रैश करने की कोशिश जैसी घटना असामान्य है।
यदि दो पायलटों के बीच तालमेल को लेकर इतनी परेशानी है तो क्या एक पायलट पर विचार नहीं किया जाना चाहिए?
पायलटों की कमी के चलते यह प्रस्ताव आया था, लेकिन इसे सिरे से खारिज कर दिया गया। बल्कि, इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन (आइसीएओ) के अनुसार काकपिट पर दो पायलट अनिवार्य है। यहां तक कि यदि एक पायलट वाशरूम इस्तेमाल करने के लिए काकपिट से बाहर आते हैं तो उस समय हेड केबिन क्रू (एयर होस्टेज) को काकपिट में मौजूद रहना पड़ता है। सोचिए, यह कितना जरूरी है... क्योंकि यदि फ्लाईदुबई विमान एक ही पायलट के हाथ में होता और वह आरोपित ओमानी पायलट की तरह होता तो विमान को हाईजैक करना या क्रैश करना कितना आसान होता।
इस घटना की तुलना 9/11 से क्यों?
विमान का ट्विन टावर से टकाराना और उनका जमींदोज हो जाना...9/11 की घटना सिर्फ इतनी नहीं थी। उन विमानों के कार्गों में विस्फोटक थे और जैसे ही वह ट्विन टावर से टकराए, तो ज्वालामुखी की तरह धधक उठे और दोनों टावर जमींदोज हो गए। यहां अभी यह सामने नहीं आई है कि वह सिर्फ विमान को हाईजैक कर क्रैश करवाना चाहता था या फिर विमान में विस्फोटक या कोई ज्वलशील पदार्थ था, जिससे क्रैश होते ही विमान में भीषण आग लग जाए। यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से ग्राउंड स्टाफ की भी मिलीभगत होगी। ऐसे हालात में इस घटना के पीछे आतंकी संगठन हो सकते हैं।
फुकेट से दिल्ली आने वाले विमान के पायलट ने भांग के नशे में विमान को हजारों फीट का गोता लगवा दिया? इस लापरवाही को आप किस श्रेणी में देखते हैं?
यहां भी क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट फेलियर व रोस्टरिंग में चूक है। तय मानक मुताबिक विमान उड़ाने के 12 घंटे पहले नशा प्रतिबंधित है, फिर ऐसे पायलट की ड्यूटी क्यों लगाई गई? आमतौर पर पायलट और को-पायलट एक ही होटल में रहते हैं। फिर को-पायलट को कैसे पता नहीं चला। यदि उसे पता था तो फिर उसने काकपिट पर पहुंचने से पहले ब्रीफिंग के दौरान स्टाफ को इससे अवगत क्यों नहीं करवाया? या फिर जब काकपिट में उसे पता चला तो क्या उन्होंने टोका था? या फिर किसी ओर को सूचना दी थी। सारी बातें पायलटों के बीच तालमेल पर ही टिकी है।
अहमदाबाद विमान दुर्घटना को किस श्रेणी में रखेंगे?
जांच रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है, इसलिए इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा। इस घटना के बाद एविएशन इंडस्ट्री के सुरक्षा मानकों में क्या-क्या बदलाव होंगे? भारत को क्या सबक लेना चाहिए?
हर घटना के बाद ही इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन लगातार अपने स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिजर (एसओपी) में सुधार करता रहा है। उन दिशा-निर्देशों के आधार पर हर देश अपने-अपने नियम बनाता है। इस घटना के बाद सभी देश अपने मानकों की समीक्षा कर रहे हैं। भारत में इसके लिए नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो यानी, ब्यूरो आफ सिविल एविएशन सिक्यूरिटी (बीसीएएस) अधिकृत एजेंसी है।
और पायलटों के मेंटल हेल्थ (मानसिक स्वास्थ्य) का मुद्दा ?
यह बहुत अहम है। विदेश में इसको लेकर काफी काम हो रहा है। हमारे यहां भी इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। भारतीय वायु सेना के पायलटों को सिविल एविएशन पायलट बनाने की आर्हता दी जाए, तो क्या बेहतर प्रयोग होगा?
फाइटर पायलटों को पायलट बनाने का प्रयोग किस हद तक सफल होगा और कितना व्यवहारिक होगा, यह नहीं कह सकता हूं, लेकिन इस पर विचार किया जा सकता है।
आपने कोझिकोड विमान दुर्घटना का उल्लेख किया। इस घटना की जांच आपने की थी। इसमें आपने क्या गड़बड़ी पाई थी?
प्लेन लैडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। पायलट बहुत वरिष्ठ थे। पायलट 58 साल के थे और को-पायलट 25-26 साल का। यानी दोनों की उम्र में लगभग 32 साल का अंतर था। पायलट स्वभाव से भी रिजर्व थे। जांच के दौरान यह तथ्य उभरकर आया कि को-पायलट ने उन्हें सुझाव दिया था कि मौसम खराब है और वह जो फैसला ले रहे हैं, वह सही नहीं है। लैंडिंग में दिक्कत आ सकती है, लेकिन उन्होंने को-पायलट की बात नहीं मानी और विमान क्रैश हो गया। इसमें लगभग 20 लोग मारे गए थे।
