नीलू रंजन, नई दिल्ली। आक्सफोर्ड-आस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के दो अलग-अलग डोज के अलग-अलग नतीजों ने नया पेंच फंसा दिया है। वैक्सीन का पहले हाफ और फिर फुल डोज कोरोना वायरस को रोकने में 90 फीसद सफल रहा है, वहीं दोनों फुल डोज सिर्फ 62 फीसद कारगर पाया गया है। समस्या यह है कि भारत में इस वैक्सीन के तीसरे फेज का ट्रायल दोनों फुल डोज में किया जा रहा है। ऐसे में बिना ट्रायल के हाफ और फुल डोज वैक्सीन को भारत में अनुमति देना मुश्किल साबित हो सकता है। वैसे इस मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्रालय का कोई भी अधिकारी आधिकारिक रूप से कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन अनौपचारिक बातचीत में वे मानते हैं कि कम कारगर होने के बावजूद भारत में पहले दोनों फुल डोज के वैक्सीन को ही देने की अनुमति मिल सकती है।

भारत में हो रहा है कि सिर्फ दो फुल डोज के तीसरे चरण का ट्रायल

दो दिन पहले मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ कर चुके हैं कि वैक्सीन के बारे में कोई भी फैसला वैज्ञानिकों की राय के आधार पर विशेषज्ञ ही लेंगे और वैक्सीन देने में लोगों की सुरक्षा सरकार की पहली प्राथमिकता होगी।गौरतलब है कि भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (सीआइआइ) कोविशील्ड के नाम से आक्सफोर्ड-आस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का परीक्षण कर रही है। दूसरे फेज के ट्रायल में भी कोविशील्ड के दो फुल डोज का इस्तेमाल किया गया था और तीसरे फेज में भी दो फुल डोज का इस्तेमाल किया जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि दोनों फुल डोज के ट्रायल का परिणाम भी दुनिया के दूसरे देशों में हुए ट्रायल के नतीजों के अनुसार 62 फीसद कारगर होने का ही आएगा।

सीआइआइ को भी वैक्सीन के एक हाफ-एक फुल और दोनों फुल डोज के ट्रायल की जानकारी नहीं

दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन उत्पादक कंपनी भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों में सस्ती वैक्सीन उपलब्ध कराने का करार किया है। कीमत, फ्रीज के सामान्य तापमान पर वैक्सीन के कोल्डचैन और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण कोविशील्ड कोरोना के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ ही पूरी दुनिया के लिए कोरोना के खिलाफ लड़ाई में अहम साबित हो सकता है।एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सीआइआइ को भी वैक्सीन के एक हाफ-एक फुल और दोनों फुल डोज के ट्रायल की जानकारी नहीं थी।

बिना ट्रायल के एक हाफ-एक फुल डोज वैक्सीन की अनुमति देना होगा मुश्किल

आक्सफोर्ड-आस्ट्राजेनेका ने पहली बार ट्रायल के नतीजों का ऐलान करते हुए दो अलग-अलग डोज का राज खोला था। जाहिर है इस लेकर आक्सफोर्ड और आस्ट्राजेनेका पर सवाल भी उठ रहे हैं। लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां लोगों को वैक्सीन 90 फीसद कारगर डोज के बजाय 60 फीसद कारगर डोज से काम चलाना पड़ेगा। यही नहीं, वैक्सीन की जरूरत के मुताबिक उसकी उपलब्धता सीमित होने के कारण एक हाफ डोज अतिरिक्त लोगों को वैक्सीन उपलब्ध कराने में सहायक होगा और उसकी कीमत भी अपेक्षाकृत कम होगी।

भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए यह अंतर काफी बड़ा साबित होगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि योजना आयोग के सदस्य डाक्टर वीके पॉल की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति इस मुद्दे पर विचार कर रही है। लेकिन ज्यादा उम्मीद यही है कि भारत में चल रहे ट्रायल के नतीजे आने के बाद दो फुल डोज के साथ वैक्सीन देने की शुरूआत की जाएगी और इस बीच सीआइआइ को एक हाफ-एक फुल डोज के साथ तीसरे फेज का ट्रायल नए शुरू करने के लिए कहा जाएगा।

 

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