'अपनी मां को पढ़ाओ', असम के शिक्षक को मिला नेशनल अवॉर्ड; स्टूडेंट्स को देते हैं रोज नया असाइनमेंट
असम के शिक्षक राजेश बोरदोलोई को 'ईच वन टीच वन' पहल के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है, जहाँ उनके छात्र अपनी माताओं को पढ़ना और डिजिटल लेनदेन सिखाते हैं।

असम के शिक्षक राजेश बोरदोलोई को मिला नेशनल अवॉर्ड (जागरण)
HighLights
राजेश बोरदोलोई को 'ईच वन टीच वन' पहल के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार।
छात्र अपनी माताओं को पढ़ना, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग सिखाते हैं।
यह पहल आदिवासी माताओं को सशक्त कर रही, शिक्षा अंतर कम कर रही।
डिजिटल डेस्क, दिसपुर। राजेश बोरदोलोई एक ऐसे शिक्षक, जो न केवल अपने स्टूडेंट्स को शिक्षित कर रहे हैं, बल्कि उन्हें इस काबिल बना रहें कि वे अपने घर जाकर अपनी मां को भी पढ़ा सकें।
शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए राजेश बोरदोलोई को नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। वो अपने छात्र-छात्राओं को रोज एक ऐसा असाइनमेंट देते हैं, तो किताबों से कुछ अलग भी उन्हें सिखाता हो।
स्कूल के छात्र, घर पर हैं टीचर
राजेश बोरदोलोई भूगोल के अध्यापक हैं और वे असम के जोरहाट जिले के कालबारी में 'आदर्श ट्राइबल हायर सेकेंडरी स्कूल' में पढ़ाते हैं। उनसे पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे आदिवासी परिवारों से हैं।
राजेश बोरदोलोई अपने स्टूडेंट्स को ऐसे पढ़ा रहे हैं कि वो घर जाकर अपनी माताओं को सभी चीज सिखा सकें। इनके स्टूडेंट्स माताओं को पढ़ना, UPI पेमेंट करना, ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल करना और डिजिटल सेवाओं का लाभ उठाना सिखाते हैं।
इस कदम से वो महिलाएं भी शिक्षा हासिल कर पा रही हैं, जिन्होंने बहुत कम या बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं की है। उनके लिए घर पर अपने बच्चों से सीखना न सिर्फ सुविधाजनक हो गया है, बल्कि यह उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजना जारी रखने के लिए प्रेरित भी करता है।
नेशनल अवॉर्ड विनर राजेश बोरदोलोई
इस साल देशभर से 48 शिक्षकों को नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। वहीं इन टीचर्स की लिस्ट में राजेश बोरदोलोई का नाम भी शामिल है।
साक्षरता के इस मिशन को आगे बढ़ाने वाली "ईच वन टीच वन" (हर कोई एक को सिखाए) पहल के लिए ही राजेश बोरदोलोई को नेशनल टीचर्स अवॉर्ड मिला है।
राजेश बोरदोलोई ने देखा कि एक तरफ जहां युवा पीढ़ी टेक्नोलॉजी को सीखते हुए आगे बढ़ रही है, वहीं उनकी माताओं को आम जानकारी भी नहीं है। ऐसे में माताओं और बच्चों के बीच साक्षरता का अंतर बढ़ता जा रहा है।
बोरदोलोई ने कहा, 'जब कोई बच्चा घर पर टीचर बनता है, तो शिक्षा एक साझा सफर बन जाती है। किसी स्टूडेंट को अपनी मां के पास बैठकर धैर्यपूर्वक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना या डिजिटल पेमेंट करना सिखाते हुए देखना बहुत प्रेरणादायक होता है।'
इस पहल में शामिल 10 में से 9 स्टूडेंट्स खेती पर निर्भर आदिवासी 'मिसिंग' समुदाय से हैं, जो माजुली और आस-पास के इलाकों में रहते हैं। 'ईच वन टीच वन' प्रोग्राम अब कालबारी से आगे बढ़कर बानफला, भेकेलिचापोरि, धनखुली, ललिता चापोरि गांव और सारिघरिया तक फैल गया है।
बोरदोलोई का स्कूल अब पैरेंट-टीचर मीटिंग के दौरान डिजिटल टूल्स का प्रदर्शन करने के लिए सरकार द्वारा दिए गए स्मार्ट बोर्ड का इस्तेमाल करता है। प्रिंसिपल राजीव कुमार बरुआ ने माना कि इस प्रोग्राम ने महिलाओं को तकनीक के प्रति अपनी झिझक दूर करने में मदद की है।
