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सरकारों ने लोगों को सुनना बंद कर दिया और लोगों ने सरकारों को... इसलिए 'सब चलता है': अरुण मायरा

Published: Sat, 12 Sep 2026 08:32 PM (IST)Updated: Sat, 12 Sep 2026 08:45 PM (IST)

पूर्व योजना आयोग सदस्य अरुण मायरा ने 'सब चलता है' मानसिकता पर चिंता व्यक्त की, जिसका कारण सरकारों और जनता के बीच संवादहीनता है।

अरुण मायरा के साथ बातचीत के अंश

अरुण मायरा के साथ बातचीत के अंश

HighLights

  1. सरकारों और जनता के बीच संवादहीनता से 'सब चलता है' मानसिकता बढ़ी।

  2. औद्योगिकरण, शहरीकरण नीतियों में खामियां; पीपीपी मॉडल संवादहीनता का कारण।

  3. सिंगापुर मॉडल अपनाकर कौशल विकास, जनभागीदारी से असमानता कम करें।

रुमनी घोष। दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग के गिरने से हुई सात छात्रों की मौत, चार महीने पहले राजधानी में ही बगैर लाइसेंस के चल रहे ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट होटल में आग लगने से 21 की मौत, कहीं अस्पताल में आग लगने से नवजात की मौत तो कहीं भरभराकर नव निर्मित पुल का गिर जाना...देशभर में न जाने कितनी घटनाएं सरकारी तंत्र की लापरवाही और सामाजिक उदासीनता की भेंट चढ़ रही हैं।

लापरवाह सरकारी तंत्र और सामाजिक उदासीनता के गठजोड़ से 'चलता है' मानसिकता जन्म ले रही है और एक के बाद एक घटनाएं होती जा रही हैं। वर्ष 2009 से 2014 तक योजना आयोग के सदस्य रहे अरुण मायरा कहते हैं कि हमने लोगों को सुनना बंद कर दिया और लोगों ने हमें...इसलिए ' सब चलता है' प्रवृत्ति पूरी व्यवस्था पर हावी होती चली जा रही है।

एक के बाद एक घटनाएं होती जा रही हैं, लेकिन न सरकार को फर्क पड़ रहा है और न ही समाज को। लाहौर में जन्मे 83 वर्षीय मायरा विभाजन के दौरान परिवार के साथ भारत आ गए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कालेज से भौतिकी में एमएससी किया। 25 वर्षों तक टाटा प्रशासनिक सेवाओं का हिस्सा रहे। 1981 से 1989 तक टाटा मोटर्स के बोर्ड सदस्य रहे। वर्ष 2000 से अप्रैल 2008 तक बास्टन कंसल्टिंग ग्रुप के अध्यक्ष रहे। कॉर्पोरेट, सरकारी व सामाजिक विकास क्षेत्र में लंबा अनुभव रखने वाले मैरा भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) की राष्ट्रीय परिषद में भी सेवा दे चुके हैं।

साथ ही वह भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्वालिटी काउंसिल आफ इंडिया) से भी जुड़े रहे। उनका मानना है कि भारत में औद्योगिकरण और शहरीकरण के नीतियों पर सभी सरकारों ने एक दूसरे के माड्यूल को ही आगे बढ़ाया है। किसी ने भी इससे अलग हटकर नए विकल्प के बारे में नहीं सोचा, जबकि हमारे लिए सिंगापुर की तरह यह बेहद जरूरी था।

दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने मायरा से विस्तार से चर्चा कर यह जानने की कोशिश की कि इस प्रवृत्ति से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है? प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

बिल्डिंग गिरना, आग लगना, हाईवे ध्वस्त होना, पुल टूटना जैसी घटनाएं होती रहती हैं, लोग मरते रहते हैं पर व्यवस्थाएं नहीं सुधरती। क्यों?
 
औद्योगिक विकास और शहरीकरण के बीच जो तालमेल होना चाहिए था, वह हम नहीं बिठा पाए। शुरुआत में ही कुछ गड़बड़ियां हुईं, लेकिन तब हमारी अर्थव्यवस्था बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, इसलिए ज्यादा असर नहीं था। 1991 में औद्योगिकरण और उदारीकरण के बाद यह हिसाब-किताब बिलकुल गड़बड़ा गया। यह सिलसिला अभी तक जारी है। 

हर सरकार नीतियां बदलती हैं। फिर आप कैसे कह सकते हैं 1991 से अब तक सिलसिला जारी है? 

यही तो रोचक है कि हमारे यहां सरकारें बदलीं, लेकिन औद्योगिक विकास और शहरीकरण को लेकर जो नीतियां बनीं, वह हर सरकार ने एक-दूसरे की नीतियों को ही आगे बढ़ाया। किसी ने भी ठहर कर दूसरे विकल्प के बारे में नहीं सोचा। यही वजह है कि हर बार नीतियों में खामियां रह गईं और व्यवस्था उदासीन होती गई। 

सत्य निकेतन का गिरना या मालवीय नगर के होटल में आग लगना सरासर नियमों की अनदेखी है। बेशक सरकारी निगरानी तंत्र कमजोर है, लेकिन क्या नागरिकों का दायित्व नहीं?   

बिलकुल है, लेकिन नागरिकों को दायित्व ज्ञान करवाने के लिए पहले उन्हें सुनना होगा। हमने उन्हें सुनना बंद कर दिया तो उन्होंने भी हमें सुनना बंद कर दिया। ...और सरकारी तंत्र के भ्रष्ट होने व उसकी वजह से कमजोर निगरानी तंत्र के जन्म लेने का सिलसिला भी वहीं से शुरू होता है।    
 
तो आपका कहना है लोगों में सब चलता है, जो प्रवृत्ति विकसित हो रही है, उसके लिए नीतियां दोषी हैं, कैसे?  
 
हां, बहुत हद तक। दो उदाहरण आपके सामने रखता हूं। मैं लंबे समय तक मुंबई में रहा। वहीं से अमेरिका गया और 2008 में फिर मुंबई लौटकर आया। 2008 के आखिर में ही मैं मुंबई से गुड़गांव शिफ्ट हुआ। उस समय दिल्ली-गुड़गांव के बीच बनी नवनिर्मित हाईवे के आसपास रहने वाले गुड़गांव के ग्रामीणों द्वारा जबर्दस्त विरोध किया जा रहा था।
 
दरअसल, यह वह दौर था, जब उदारीकरण ने रफ्तार पकड़ ली थी और पब्लिक-प्रायवेट-पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की नसों में घुल-मिल चुका था।
 
सेक्टर-42 में जिस जगह बैठकर हम बात कर रहे हैं, वहां निजी बिल्डर्स अत्याधुनिक हाईराइज इमारतें बना रहे थे। यही नहीं, गुड़गांव के अन्य कुछ सेक्टर्स में भी इस तरह का विस्तार चल रहा था। गुड़गांव के विस्तार और इन अट्टालिकाओं, टाउनशिप्स में रहने वाले लोगों को बेहतर कनेक्टिविटी की जरूरत थी, इसलिए दिल्ली-गुड़गांव नेशनल हाईवे बनाया गया।
 
2008 में जब यह बनकर तैयार हुआ तो हाईवे के आसपास रहने वालों को पता चला कि एक पार से दूसरे पार जाने के लिए उन्हें भी टोल देना पड़ रहा था। हालांकि बाद में स्थानीय लोगों को छूट मिली और मामला सुलझा। अब मेरा कहना है कि जो देश-विदेश से आए धनाढ्य लोगों को बसाने और गुड़गांव के विकास के लिए वहीं के लोगों को दरकिनार कर देना क्या उचित था?
 
निर्माण से पहले ही उन्हें व्यवस्थित ढंग से सुनने और उनकी सुविधा का भी ध्यान रखा जाता तो यह विरोध नहीं होता। बेशक विरोध के बाद आम लोगों की बात सुनी गई और एक विकल्प निकाला गया। अब दूसरा, उदाहरण है मुंबई की धारावी... लगभग 10 लाख की आबादी वाली यह अवैध बस्ती को भी पीपीपी मॉडल पर विकसित करने की योजना है।
 
सरकार के लिए यह शहरीकरण और सौंदर्यीकरण का प्रोजेक्ट है और प्राइवेट कंपनी के लिए यह जमीन का बेशकीमती टुकड़ा है। इस पूरे क्रम में उप्र, बिहार, मप्र, बंगाल, नार्थ ईस्ट, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण से आकर बसे 10 छोटे-छोटे कारोबारी (जिनका मुंबई या महाराष्ट्र के जीडीपी में योगदान है) बाहर हैं।
 
इस मॉडल के तहत धारावी वासियों को पुनर्वास किया जाएगा। स्वच्छ हवा, पानी और नागरिक सुविधाओं (यह उनका मूलभूत अधिकार है) के साथ उन्हें मुंबई से बाहर बसा तो दिया गया, लेकिन उनके छोटे-छोटे धंधे या कारोबार के बारे में नहीं सोचा गया। जैसे कोई टिफिन सप्लायर या बढ़ी-अचार बनाने का काम करने वाला। उसका तो सारा कस्टमर बेस शहर में ही है।
 
यदि उसे शहर से बाहर बसाया जाएगा, तो उसका सप्लाई चेन टूट जाएगा और रोजगार प्रभावित होगा। इसी वजह से गतिरोध जारी है। ठीक इसी जगह पर सरकार और जनता के बीच संवाद की जरूरत है। जब सरकार से संवाद के दरवाजे बंद हो जाते, तो लोग नियम तोड़ने लगते हैं।

गुड़गांव हाईवे प्रोजेक्ट और मुंबई का धारावी दोनों बड़े सरकारी प्रोजेक्ट हैं। इसकी तुलना सत्य निकेतन या मालवीय नगर जैसे हादसों में बिल्डिंग मालिकों से कैसे? क्या इनका दोष नहीं है?     

बिलकुल दोषी हैं। मैं इन दोनों घटनाओं से हटकर एक बड़े दायरे में लोगों में नियम तोड़ने की प्रवृत्ति विकसित होने पर बात कर रहा हूं। जैसे यदि सही विकल्प दिए बगैर धारावी के लोगों को बसा दिया गया और उनमें से अधिकांश का रोजगार प्रभावित हुआ तो बड़े पैमाने पर अंसतुष्ट लोग आगे चलकर ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जो अपने फायदे के लिए खुद नियम तोड़ेंगे और नियमों की अनदेखी के लिए सरकारी तंत्र को भी भ्रष्ट करेंगे। ...और यह प्रवृत्ति बेहद संक्रामक है। जब एक व्यक्ति तीन या चार के बजाय नियम विरुद्ध पांच मंजिला इमारत बनाकर लाखों कमाने लगता है तो सालों तक नियम पालन करने वाला व्यक्ति खुद को ठगा महसूस करता है। और फिर एक समय बाद वह भी नियम तोड़ने लगता है। नियम विरुद्ध निर्माण की मूल वजह तलाशेंगे, तो उसकी जड़ में कहीं न कहीं इससे जुड़ा कारण ही पाएंगे।  

यह तो आदर्श समाजवाद की परिकल्पना है। आज के दौर में जहां दुनिया हर क्षेत्र में निजीकरण की ओर बढ़ रही है, वहां आप पीपीपी मॉडल की आलोचना कर रहे हैं?            

नहीं, मैं न तो आदर्श स्थिति की बात कर रहा हूं और न ही समाजवाद की। मैं सिर्फ प्रबंधन या मैनेजमेंट की बात कर रहा हूं..., यानी मैनेज करना। बातचीत कर बीच का रास्ता निकालना। जहां तक बात पीपीपी मॉडल की है, तो यह हर सरकार का पसंदीदा मॉडल है। चूंकि किसी भी सरकार के पास भी पैसा नहीं है, इसलिए प्रायवेट कंपनियों को समझौते के नाम पर कुछ विशेष छूट दी जाती है। यहां तक भी सब ठीक है, लेकिन गड़बड़ी वहां शुरू होती है, जब कंपनियां छूट के नाम सरकार और जनता के बीच संवाद का दरवाजा बंद कर देती हैं। मेरी आपत्ति पीपीपी मॉडल को लेकर पीपीपी आड़ में बंद दरवाजे को लेकर है।    

आप योजना आयोग के सदस्य रहे हैं, उस समय आपने क्या विकल्प सुझाए थे? क्या उसका सकारात्मक असर दिखाई देता है? 

इस सवाल का जवाब देने से पहले एक छोटा-सा किस्सा बताता हूं कि योजना आयोग के लिए मेरा चयन कैसे हुआ था... और फिर क्या काम सौंपा गया। अमेरिका से लौटने के बाद जब  मुंबई की सड़कों से गुजरा तो दस साल में शहर बदल गया था। लालबत्ती पर शीशे नीचे कर खड़ी रहने वाली कारों की जगह अब एसी कारों की कतार थी। सभी के शीशे बंद थे।
 
भीख मांगने वाले कार के शीशे खटखटा रहे थे, लेकिन अंदर बैठे लोग बेफिक्र थे, क्योंकि उन्हें बाहर की आवाज ही नहीं आ रही थी। मैंने अपनी एक पुस्तक में इस घटना का उल्लेख करते हुए सरकार और जनता के बीच संवादहीनता का उल्लेख किया था। पीएमओ से आमंत्रण मिलने के बाद जब मैं तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिलने गया तो मैंने उनके सामने अपनी शंका जाहिर की कि मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, तो उन्होंने कहा था कि वह तो मैं हूं... और भी हैं, लेकिन मुझे ऐसा कोई चाहिए जो कार के शीशे पर खटखटाने वालों से बात करे और उनकी सुने।
 
मुझे यही सुनने का काम दिया है। जहां तक विकल्प सुझाने की बात है तो मैंने उस दौर में शहरीकरण के उभरते उदाहरण के तौर पर सिंगापुर और गुड़गांव-मुंबई का तुलनात्मक अध्ययन किया था। मैंने सिंगापुर के शहरीकरण के मॉडल को बेहतर पाया था। 

क्या था सिंगापुर शहरीकरण का मॉडल?  

आधुनिक सिंगापुर के संस्थापक ली कुआन यू जब एक छोटे और संसाधनहीन बंदरगाह से विकसित करके वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने का प्रकल्प लेकर चल रहे थे। उन्होंने पीपीपी मॉडल के बजाय अपने लोगों के कौशल का विकास किया और देश को आधुनिक बनाने में अपने ही लोगों के कौशल का उपयोग किया। उन्होंने एक-एक कर दूसरे देशों पर अपनी निर्भरता खत्म की। मुझे लगता है कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए भी इसी तरह का मॉडल जरूरी है। इससे हम आत्मनिर्भर भी बनेंगे और लोगों को रोजगार भी मिलेगा। जहां तक भारत में इसे लागू करने की बात है तो योजना आयोग में सदस्य रहते हुए मैंने दिल्ली-गुड़गांव के विस्तारित क्षेत्रों का दौरा किया। मुंबई के धारावी में भी लोगों से बात की और प्रोजेक्ट बनाया। योजना आयोग में बनाए जाने वाले प्रोजेक्ट को जमीन पर उतरने में कम से कम 10-20 साल लगते हैं। सरकार बदलने के बाद योजना आयोग का स्वरूप बदलकर उसे नीति आयोग किया गया, इसलिए सफलता-असफलता के बारे में नहीं कह सकता। 

 

बाक्स
क्या आपको लगता है कि इस मॉडल से भारत की अर्थव्यवस्था संभल सकती है? हमारी जीडीपी ऊपर जा सकती है?            
मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, इसलिए भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में आकलन करना या अनुमान लगाना सही नहीं होगा, लेकिन मेरी एक अवधारणा है, जिसे मैं किताबों, भाषणों के जरिये लोगों के सामने रखने की कोशिश करता हूं। जैसे, 2008 में जब गुड़गांव में निजी डेवलपर्स द्वारा सबसे विकसित हाउसिंग सोसायटी में फ्लैट की कीमत थी दो करोड़ रुपए।
 
कुछ समय बाद उसके आसपास बनी सोसायटियों में फ्लैट की कीमतें 30-35 करोड़, फिर 70-75 करोड़ और हाल ही में उसी लोकेशन के आसपास अल्ट्रा लग्जरी सोसायटी में 217 करोड़ में फ्लैट की डील हुई है, यानी 18 साल में इतनी उछाल...।
 
अब लग्जरी और अल्ट्रा लग्जरी सोसायटी के नाम पर यहां रहने वाले चंद सैकड़ों या हजारों लोगों को इस तरह की सुविधाएं मुहैया करवाई जा रही हैं, जिससे उन्हें रोजमर्रा के काम, यानी बाजार-राशन-सब्जी आदि से लेकर एंटरटेंनमेंट (जिम, स्पोर्ट्स या थिएटर) आदि के लिए उस सोसायटी से निकलकर सड़क तक न आना पड़ा।
 
यदि कहीं जाना है तो सीधे एयरपोर्ट की कनेक्टिविटी मिले, यानी जिस शहर में आप रह रहे हैं, वहां की समस्याओं से दो-चार न होना पड़े। यदि सरकार-समाज में दखल रखने वाले एक प्रबुद्ध वर्ग, जिन्हें हम 'ओपिनियर मेकर्स' कहते हैं को समस्याओं से दो-चार नहीं होना पड़ेगा तो इस पर बहुत ज्यादा हल्ला नहीं मचेगा।
 
अब इन सोसायटी से बाहर निकलते ही या फिर यह सोसायटी बनाने वाले मजदूरों को ही देखेंगे तो पाएंगे कि उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं है। उनका जीवन सड़कों या पास की किसी बस्ती में टीन की छत के नीचे खानाबदोशों की तरह गुजर रहा है। उनके बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं।
 
भारत जैसे देश में सोसायटी के अंदर और बाहर वालों की संख्या में एक बहुत बड़ा अंतर है... इसलिए हमें ऐसा कोई मॉडल तैयार करना चाहिए, जिसमें दोनों के बीच का अंतर थोड़ा कम हो। हो सकता है, उसमें जीडीपी ग्रोथ शुरू में थोड़ी धीमी हो, लेकिन एक बार रफ्तार पकड़ने के बाद बहुत तेजी से आगे बढ़ेगी।