मुकुल श्रीवास्तव। उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं बड़े शहरों में ज्यादा बढ़ीं, जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा भावनात्मक संबल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें, डेटिंग एप्स का सहारा ले रहे हैं। विवाह तय करने जैसी सामाजिक प्रक्रिया पहले परिवार और यहां तक कि खानदान के बड़े-बुजुर्गो, मित्रों, रिश्तेदारों वगैरह को शामिल करते हुए आगे बढ़ती थी, अब उसमें भी ई लग गया है। मैट्रीमोनी वेबसाइट से शुरू हुआ यह सिलसिला अब डेटिंग एप्स तक पहुंच गया है।

आम तौर पर इंटरनेट की सहायता से किसी संबंध को बनाना एक विशुद्ध शहरी घटना के तौर पर माना जाता था और छोटे शहरों को इस प्रवृत्ति से दूर माना जाता था। इस सांस्कृतिक अवरोध के बावजूद डेटिंग का व्यवसाय भारत में तेजी से पैर पसार रहा है। इंटरनेट वेबसाइट स्टेटीस्टा के अनुसार इस समय देश में 3.8 करोड़ लोग डेटिंग एप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और राजस्व के हिसाब से यह संख्या विश्व में तीसरे नंबर की सबसे बड़ी संख्या है।

देश की सांस्कृतिक विविधता के हिसाब से सभी प्रचलित डेटिंग एप्स अंग्रेजी भाषा को ही प्रमुखता देते हैं, टिंडर ने हिंदी में भी अपनी सेवा देनी शुरू कर दी है, पर अभी भी अंग्रेजी का बोलबाला है, जबकि देश की मात्र 12 प्रतिशत जनसंख्या ही अंग्रजी बोलती है। जानकार मानते हैं कि भारत में भाषा की समस्या अब डेटिंग एप के मामले में उतनी गंभीर नहीं, क्योंकि लोग मोटे तौर पर यह जानते हैं कि एप चलता कैसे है। जब संदेशों के आदान प्रदान की बात आती है तो लोग हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को रोमन में लिख लेते हैं।

सामाजिक रूप से देखें, तो जहां पहले शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता था, अब वह धुरी खिसककर लड़के और लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। वर या वधू तलाशने का काम अब मैट्रीमोनिअल साइट व ऑनलाइन डेटिंग साइट कर रही हैं और वह भी बगैर किसी बिचौलिये के। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे पारदर्शिता आई है। इन वेबसाइटों पर आप सुविधाजनक रूप से प्रोफाइल सेट कर सकते हैं। आप अपनी तस्वीर डाल सकते हैं तथा अपनी पसंद से उन प्रोफाइल को चेक करके कदम बढ़ा सकते हैं। कई वेबसाइटों में चैटिंग की सुविधा भी है, जिसमें ऑनलाइन चैटिंग कर लड़का या लड़की एक-दूसरे को समझ सकते हैं।

लेकिन कुछ और तथ्यों पर गौर किया जाना भी जरूरी है। इन एप्स से बने रिश्तों में धोखाधड़ी के कई मामले भी सामने आए हैं। दी गई जानकारी कितनी सही है, इसे जांचने का कोई तरीका ये एप्स उपलब्ध नहीं कराते। उनकी जिम्मेदारी लड़का-लड़की को मिलाने तक सीमित रहती है। हालांकि झूठ बोलकर शादी कर लेने में नया कुछ नहीं, पर इंटरनेट एप्स से बने रिश्तों के पीछे कोई सामाजिक दबाव नहीं काम करता और गड़बड़ी की स्थिति में आप किसी मध्यस्थ को दोष देने की स्थिति में भी नहीं होते। और न कोई ऐसा होता है, जो बिगड़ी बात को पटरी पर लाने में मदद करे।

[विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, लखनऊ विवि]

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