नई दिल्ली, प्रेट्र।  सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को कहा कि जन्मतिथि (Birth date) में बदलाव का आवेदन सिर्फ प्रासंगिक प्रविधानों के मुताबिक किया जा सकता है और ठोस साक्ष्य होने के बावजूद इसका अधिकार होने का दावा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि विलंब के आधार पर आवेदन को खारिज किया जा सकता है, खासकर तब जबकि यह सेवाकाल के आखिर में या कर्मचारी जब रिटायर होने वाला हो, तब किया गया हो। शीर्ष अदालत कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कर्नाटक रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

हाई कोर्ट ने कंपनी के कर्मचारी एमसी सुब्रमण्यम रेड्डी की जन्मतिथि में बदलाव की याचिका को स्वीकृति प्रदान कर दी थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि सुब्रमण्यम को कर्नाटक स्टेट सर्वेट (डिटरमिनेशन आफ ऐज) एक्ट के मुताबिक जन्मतिथि में बदलाव का आवेदन कंपनी का कर्मचारी बनने (17 मई, 1991) के एक साल के भीतर करना चाहिए था।

 इससे पहले 2020 के फरवरी माह में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी कर्मचारी के सर्विस रजिस्टर में जो जन्मतिथि दर्ज हो जाती है उसमें नौकरी के अंतिम समय में बदलाव की मांग नहीं मानी जा सकती। जस्टिस आर भानुमति और ए एस बोपन्ना की बेंच ने कहा था कि भले ही यह साबित करने के लिए अच्छे सबूत हों कि रिकार्ड में दर्ज जन्मतिथि गलत है तो भी सुधार का दावा अधिकार के तौर पर नहीं किया जा सकता।

दरअसल कोर्ट के समक्ष आए मामले में, कर्मचारी ने नौकरी शुरू करने की तारीख से 30 साल से अधिक समय के बाद, अपने सेवा रिकार्ड में जन्मतिथि सही करने का अनुरोध किया था। उच्च न्यायालय ने कर्मचारी को राहत दी थी और इसलिए, नियोक्ता कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपने दावे के समर्थन में कर्मचारी ने 'भारत कोकिंग कोल लिमिटेड एवं अन्य बनाम छोटा बिरसा उरांव (2014) 12 एससीसी 570' मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया था।

Edited By: Monika Minal