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एनजीटी के आंकड़ों से बड़ा खुलासा, पर्यावरण और जनहित की अपीलों को पहली छमाही में नहीं मिली कोई राहत

Published: Sun, 20 Sep 2026 02:10 AM (IST)

जनवरी से जून के बीच ऐसे पक्षों की 16 मेरिट अपीलों में से किसी में भी उन्हें अनुकूल फैसला नहीं ...और पढ़ें

एनजीटी में पर्यावरण पक्ष की अपीलों को पहली छमाही में नहीं मिली राहत (फाइल फोटो)

एनजीटी में पर्यावरण पक्ष की अपीलों को पहली छमाही में नहीं मिली राहत (फाइल फोटो)

HighLights

  1. 119 अपीलों का विश्लेषण, पर्यावरण व जनहित पक्ष की 16 मेरिट अपीलों में एक भी अनुकूल फैसला नहीं

  2. उद्योग, परियोजना प्रवर्तक और संपत्ति मालिकों की 51 मेरिट अपीलों में 30 के पक्ष में आदेश 

पीटीआई, नई दिल्ली। भले ही सीजेआई सूर्य कांत भारतीय अदालतों को संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने पर जोर दे रहे हों, मगर साउथ एशियन रिपोर्टर फॉर एनवायरनमेंट लाज (एसएआरईएल) के एक विश्लेषण से पता चलता है कि 2026 की पहली छमाही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने एक भी फैसला पर्यावरण न्याय या जनहित के पक्ष में नहीं सुनाया।

जनवरी से जून के बीच ऐसे पक्षों की 16 मेरिट अपीलों में से किसी में भी उन्हें अनुकूल फैसला नहीं मिला। विश्लेषण में एनजीटी की पांच पीठों में दायर कुल 119 अपीलों को देखा गया।

इनमें पर्यावरण या जनहित पक्ष ने 16, जबकि परियोजना प्रवर्तकों, संपत्ति मालिकों और उद्योग से जुड़े पक्षों ने 51 मेरिट अपीलें दायर की थीं। उद्योग पक्ष की 51 में से 30 अपीलों में अनुकूल आदेश आया, यानी सफलता दर 58.8 प्रतिशत रही। छह प्रतिशत मामलों में यथास्थिति कायम रखी गई।

विश्लेषण के मुताबिक, 119 में से 50 से अधिक अपीलें समय-सीमा, अधिकार क्षेत्र, सुनवाई योग्य न होने या अपील वापस लेने जैसे तकनीकी और प्रक्रियात्मक आधारों पर खारिज हो गईं। यानी करीब 44 प्रतिशत मामलों में एनजीटी ने विवाद के मूल गुण-दोष पर फैसला नहीं दिया।

पीठवार तस्वीर भी अलग-अलग रही। दिल्ली की प्रिंसिपल जोन पीठ में उद्योग, परियोजना प्रवर्तक और संपत्ति मालिक पक्ष ने 10 मेरिट अपीलों में पांच जीतीं।

पश्चिमी जोन पीठ, पुणे में 24 में से 15 और दक्षिणी जोन पीठ, चेन्नई में 12 में से नौ अपीलों में अनुकूल आदेश मिला। मध्य जोन पीठ, भोपाल में पांच में से एक अपील जीती गई। पूर्वी जोन पीठ, कोलकाता ने इस अवधि में केवल एक मामले का फैसला किया, जो जनहित से जुड़ी अपील थी और खारिज कर दी गई।

इन आंकड़ों को हालांकि एनजीटी के सभी फैसलों में पर्यावरण संरक्षण के रुख का अंतिम आकलन नहीं माना जा सकता, क्योंकि विश्लेषण केवल मेरिट अपीलों और जनवरी-जून 2026 की अवधि तक सीमित है।

बता दें कि एनजीटी के 19-20 सितंबर के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सीजेआई सूर्य कांत ने कहा कि अदालतों के सामने अब सवाल केवल संरक्षण और विकास में से किसी एक को चुनने का नहीं, बल्कि दोनों के बीच तालमेल बनाने का है।

उन्होंने पर्यावरण कानून के विकास और जलवायु संबंधी अधिकारों पर भी जोर दिया। ऐसे में एनजीटी के छह महीने के आंकड़े यह सवाल जरूर उठाते हैं कि पर्यावरण न्याय की प्रक्रिया में मेरिट पर सुनवाई, तकनीकी बाधाओं और संरक्षण-विकास के बीच संतुलन को व्यवहार में कैसे साधा जा रहा है।