श्रीनगर, पीटीआइ। सेना की 15वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लो ने शुक्रवार को कहा कि घाटी में आतंकी अलग-थलग पड़ गए हैं। ऑपरेशन मां के कारण आतंकी गुटों में स्थानीय युवकों की भर्ती में भी कमी आई है। आतंकियों के नेतृत्व को निशाना बनाया जा रहा है। लोग उनका साथ नहीं दे रहे हैं क्योंकि सेना ने आतंकरोधी अभियानों में पीपुल फ्रेंडली (जन सहयोग) रणनीति को अपनाया है।

आतंकी संगठनों में भर्ती रोकने और आतंकी बने युवकों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए ही चिनार कोर कमांडर ने ऑपरेशन मां शुरू किया है। इसके तहत अगर घेराबंदी में कोई आतंकी फंस जाता है तो उसे जिंदा  पकड़ने या आत्मसमर्पण करने के लिए उसकी मां की मदद ली जाती है। आतंकी बने युवकों को भी मुख्यधारा में लाने के लिए भी उनकी मां की मदद ली जाती है।

कोई भी चीज तभी गुम होती है, जब मां उसे तलाश न कर सके

लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लो ने कहा कि ऑपरेशन मां का परिणाम बहुत उत्साहव‌र्द्धक है। कोई भी चीज तभी गुम होती है, जब मां उसे तलाश न कर सके। हमने सभी आतंकरोधी अभियानों के दौरान आतंकियों को सरेंडर कर मुख्यधारा में शामिल होने का मौका दिया है। कई बार हमने बीच में ही मुठभेड़ को रोका है। आतंकियों के परिजनों, रिश्तेदारों व गणमान्य नागरिकों की मदद से उन्हें हथियार डालने के लिए मनाने का प्रयास किया है। हम अपने इरादों में कई बार सफल रहे हैं।

आतंकियों के अधिकांश कमांडर मारे जा चुके हैं

ऑपरेशन मां के तहत मुख्यधारा में लौटे आतंकियों की सुरक्षा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इनकी संख्या और नामों का उल्लेख करना खतरनाक साबित हो सकता है। यह लोग शांतिपूर्ण तरीके से राष्ट्रीय मुख्यधारा में अपनी जिंदगी जी रहे हैं। आतंकियों के अधिकांश कमांडर मारे जा चुके हैं। यह सब सेना की ओर से जनमित्र तरीके से आतंकरोधी अभियान चलाने से ही संपन्न हुआ है।

65 फीसद आतंकी बनने के एक साल के भीतर ही मारे गए

केजेएस ढिल्लो ने कहा कि आतंकियों के कमांडरों के मारे जाने और आतंकी बनने वाले स्थानीय युवकों में से करीब 65 फीसद आतंकी बनने के एक साल के भीतर ही मारे गए हैं। इससे भी नए लड़कों की आतंकी भर्ती पर रोक लगी है। वर्ष 2019 में आतंकी बनने वाले लड़कों की संख्या वर्ष 2018 से लगभग आधी ही है। अब आतंकियों के जनाजों पर भीड़ भी नजर नहीं आती।  

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