नई दिल्ली, प्रेट्र । सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उत्तर प्रदेश में सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए जिला प्रशासन द्वारा जारी नोटिस निरस्त करने की मांग की गई है। जिला प्रशासन ने सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान के एवज में वसूली के लिए प्रदर्शनकारियों को नोटिस थमाया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति के खिलाफ भेदभावपूर्ण तरीके से नोटिस जारी किया गया है। जिसके नाम से नोटिस भेजा गया है उसकी छह साल पहले 94 वर्ष की अवस्था में मौत हो चुकी है। दो अन्य भी 90 वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं। शुक्रवार को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ऋषिकेश राय की पीठ के सामने सुनवाई के लिए याचिका सूचीबद्ध की गई थी। पीठ के नहीं बैठने से याचिका पर सुनवाई नहीं हो सकी।

मामले में याची वकील परवेज आरिफ टीटू ने नोटिसों पर रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने दावा किया है कि ये उन लोगों को भेजे गए हैं जिनके खिलाफ किसी भी दंड प्रावधान के तहत मामला दर्ज नहीं किया गया है और उनके खिलाफ न तो एफआइआर दर्ज की गई है और न ही आपराधिक मामला बनाया गया है।

यह याचिका वकील निलोफर खान के माध्यम से दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं। यह शीर्ष कोर्ट के 2009 के फैसले में जारी दिशानिर्देश का उल्लंघन करता है। बाद में 2018 में इसकी पुष्टि की गई थी।

इसमें उत्तर प्रदेश सरकार को इस तरह के प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की वसूली के लिए सुप्रीम कोर्ट के 2009 और 2018 में तय किए गए दिशानिर्देश की प्रक्रिया का पालन करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में सीएए-एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान हुई घटनाओं के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच गठित करने की मांग की गई है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्वतंत्र न्यायिक आयोग का गठन किया है।

Posted By: Sanjeev Tiwari

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