राजीव कुमार झा, कोलकाता : बांग्लादेश में पशुओं की तस्करी के लिए सबसे कुख्यात व सुगम रूट रहे दक्षिण बंगाल सीमांत इलाके से होनेवाले अवैध कारोबार पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने पूरी तरह अंकुश लगा दिया है। एक वरिष्ठ बीएसएफ अधिकारी की मानें तो यहां से होकर होने वाली पशु तस्करी को अब 100 फीसद तक नियंत्रित किया जा चुका है यानी पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है।

बीएसएफ के दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के डीआइजी सुरजीत सिंह गुलेरिया ने बताया कि पहले बांग्लादेश में भारत से 70 फीसद पशुओं की तस्करी दक्षिण बंगाल सीमांत इलाके यानी उत्तर व दक्षिण 24 परगना, मालदा, मुर्शिदाबाद व नदिया जिले से होकर ही होती थी। बंगाल के इन 5 जिलों से भारत-बांग्लादेश की लगभग 913 किलोमीटर अंतर्राष्ट्रीय सीमा लगती है जो विश्व के सबसे कठिनतम बॉर्डर में से एक है। इसकी रखवाली का दायित्व बीएसएफ के दक्षिण बंगाल फ्रंटियर पर है। यह बॉर्डर का क्षेत्र नदियों, सुंदरवन तथा लैंड बॉर्डर के बीचो-बीच गुजरता है जो की चुनौतियों से भरा है। करीब 44 फीसद सीमा क्षेत्र में ही यहां फेंसिंग यानी बाड़ लगा जबकि बाकी क्षेत्र खुला (ओपेन बॉर्डर) है। ऐसे में इसी रूट से होकर पहले हर दिन बड़े पैमाने पर बांग्लादेश में पशुओं की तस्करी की जाती थी। डीआइजी ने बताया- 'अधिकतर जनसंख्या जो कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों तरफ रहती है उन्होंने पशुओं की तस्करी, मानव तस्करी, नकली नोटों की तस्करी, नशीले पदार्थों की तस्करी आदि को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। दशकों से पशु तस्करी का धंधा यहां फल फूल रहा था, लेकिन हमने लगातार अभियानों, तस्करों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, बेहतर प्लानिंग व कड़ी मेहनत की बदौलत शिकंजा कस दिया है।' उन्होंने दावा किया कि बीएसएफ के जवानों ने पशुओं की तस्करी पूरी तरह रोकने के साथ हजारों तस्करों को अपना अवैध धंधा बदलने को मजबूर कर दिया है। इस सीमावर्ती क्षेत्र में पशु तस्करी के धंधे में लिप्त 6,000 से ज्यादा लोग अब अपने घरों से दूर देश के कई हिस्सों में राजमिस्त्री, कारपेंटर, मजदूरी इत्यादि जैसे कार्यों के लिए जा चुके हैं। वहीं, 3- 4 हजार से ज्यादा लोग सीमा के पास 2,000 एकड़ से ज्यादा बंजर भूमि को जोतना शुरू कर दिया है। वे अब किसान बनकर यहां धान, गेहूं, दालें, सरसों, मौसमी सब्जियां, पपीता आदि की खेती कर रहे हैं। इस कार्य में बीएसएफ भी उनकी मदद कर रही है।

तस्करी बंद होने के बाद किया खेती की ओर रूख 

बीएसएफ अधिकारी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बहुत सारी जमीनें बेकार पड़ी हुई थीं जहां जंगली घास आदि उगता था। चूंकि लोग तस्करी में लिप्त थे और उससे पैसा कमाते थे, तो खेती-बाड़ी कौन करेगा क्योंकि इसमें बहुत मेहनत लगता है। जब हमने पशु तस्करी पूरी तरह बंद कर दी तो लोगों ने सोचा कि घर तो चलाना है।फिर लोगों ने अपनी जमीन जो बेकार पड़ी हुई थी, उसे जोतना शुरू किया। अधिकारी ने कहा कि अब वे लोग मुख्यधारा में आकर अच्छे काम व मेहनत करने लगे हैं। 

चार दशकों से चल रहा था पशु तस्करी का धंधा 

डीआइजी गुलेरिया ने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में विगत 4 दशकों से पशु तस्करी का काला धंधा फलता-फूलता रहा। हालांकि बीच-बीच में कुछ वर्षों के लिए कमी आई लेकिन पशु तस्करों ने अपने प्रयास जारी रखे। पशु तस्करी के धंधे में कई पशु तस्कर हजारों करोड़ों के मालिक भी बन चुके हैं जो कि सरकारी व्यवस्था तथा राजनीतिक कॉरीडोर को प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं। उन्होंने बताया कि चूंकि सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति दयनीय है। ऐसे में बंगाल सहित दूसरे राज्यों में दूर-दूर बैठे कई सरगना इस सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों का इस्तेमाल कर बांग्लादेश में पशुओं की तस्करी करवाते थे। इसके बदले में इन लोगों को थोड़ा- बहुत पैसा दे दिया जाता था। उन्होंने बताया कि बीएसएफ के लिए इस इलाके में पशु तस्करी को रोकना हमेशा चुनौतीपूर्वक बना रहा। कई मौकों पर पशु तस्करी का होना बीएसएफ के लिए परेशानी का सबब भी बना रहा। क्योंकि कुछ मौकों पर हमारे सीमा प्रहरी भी पशु तस्करी करवाने में लिप्त पाए गए, जिसके कारण बल का नाम भी धूमिल हुआ।

कई राज्यों से पशुओं को क्रूरतापूर्वक लाकर की जाती थी तस्करी

बीएसएफ डीआइजी ने बताया कि बांग्लादेश में तस्करी के लिए भारत के कई राज्यों जैसे- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, राजस्थान इत्यादि जगहों से ट्रकों में क्रूरतापूर्वक तरीके से गोवंशीय पशुओं को लादकर लाया जाता है। पशु तस्करों का पहला प्रयास यही रहता है की पशुओं की तस्करी दक्षिण बंगाल सीमा सुरक्षा बल के इलाके जैसे- हासनाबाद, गोझाडांगा, हकीमपुर, अंग्रेल, हरिदासपुर, बरहमपुर, जंगीपुर, मालदा इत्यादि सीमावर्ती क्षेत्र से ले जाकर बांग्लादेश पार करा दिया जाए। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में पहले 70 फीसद पशुओं की तस्करी दक्षिण बंगाल सीमांत इलाके से ही होती थी, क्योंकि पशुओं को उत्तर पश्चिम बंगाल सीमांत सिलीगुड़ी तथा गुवाहाटी सीमांत के इलाके तक ले जाकर तस्करी करवाने पर बहुत खर्चा होता है। इसीलिए पहला प्रयास दक्षिण बंगाल इलाके होकर ही कराने का होता था। दूसरे राज्यों से आने के लिए भी यह सुगम रूट है। 

जहां से होती थी रोज सैकड़ों पशुओं की तस्करी वहां हुआ शून्य

बीएसएफ डीआइजी गुलेरिया ने बताया कि फरवरी,2019 से दक्षिण बंगाल फ्रंटियर इलाके से पशु तस्करी के आयाम बदल चुके हैं। इसपर पूरी तरह अंकुश लगाया जा चुका है। उन्होंने बताया- 'एक वक्त था कि इस फ्रंटियर की जिम्मेवारी के इलाके से जहां हर दिन सैकड़ों की तादाद में पशुओं की तस्करी होती थी, वह अब प्रतिदिन सिंगल डिजिट अथवा शून्य पर आ गई है। कई सप्ताह में यह संख्या शून्य भी आंकी गई है।' अधिकारी ने दावा किया कि बीएसएफ ने पशु तस्करी के धंधे में लिप्त इस क्षेत्र के हजारों लोगों को यह अवैध धंधा छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। बड़ी संख्या में लोगों ने अब यहां खेती व दूसरे राज्यों में जाकर रोजगार करना शुरू कर दिया है। 

तस्करों के सभी हथकंडों को बीएसएफ ने किया धराशायी

डीआइजी ने बताया कि इस क्षेत्र में पशु तस्करी को रोकने के लिए बीएसएफ को एड़ी- चोटी का जोर लगाना पड़ा। बीएसएफ द्वारा लगातार चलाए जाने वाले अभियान व सख्त निगरानी की वजह से तस्करों ने नित्य नए - नए तरीके व हथकंडे अपनाए, जिससे जवानों को काफी जूझना पड़ा। तस्करों ने तस्करी का तरीका भी बदला। मवेशियों को केले के थम में बांध कर नदी के बहाव के सहारे बांग्लादेश में भेजने की कोशिश की गई। इतना ही नहीं बीएसएफ के जवान तस्करी में बाधक नहीं बने इसके लिए कई बार मवेशियों के शरीर पर बम भी बांधे गए ताकि जवानों को नुकसान पहुंचाया जा सके। जुलाई 2019 में ऐसी घटना मुर्शिदाबाद के हारुडांगा सीमा चौकी इलाके में सामने आई। वहां जब बीएसएफ के जवान केले के थम से बंधे मवेशियों को बाहर लाने के लिए नदी में उतरे तो उन्होंने कई पशुओं के गले में सॉकेट बम बंधा पाया। हालांकि उन्होंने कहा कि तस्करों द्वारा आजमाए गए तमाम हथकंडे को बीएसएफ के सजग प्रहरियों ने विफल करते हुए सफलता पाई। इस दौरान पिछले कुछ सालों में तस्करों के हमले में हमें कई जवानों को भी खोना पड़ा व कई घायल हुए। 

4 वर्षों में 2.15 लाख मवेशियों को तस्करी से बचाया  

बीएसएफ डीआइजी ने बताया कि दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के जवानों ने पिछले 4 वर्षों के दौरान तस्करों के चंगुल से 2.15 लाख से ज्यादा मवेशियों को बचाया जब उसे तस्करी के लिए बांग्लादेश ले जाया जा रहा था। इस अवधि में दो हजार से ज्यादा पशु तस्करों को भी गिरफ्तार किया गया। 2019 में सीमा क्षेत्रों से 29,550 पशुओं को जब्त किया गया। पिछले 4 वर्षों में यह सबसे कम जब्ती रही। वर्ष 2018 में 39,965 मवेशियों को जब्त किया गया। वहीं, 2017 में 52,456 मवेशियों एवं 2016 में 92,606 मवेशियों को जब्त किया गया था। 

सीमा प्रहरियों का आत्मबल व हौसला बढ़ा

बीएसएफ डीआइजी ने बताया कि पशु तस्करी को रोकने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में पारित आदेश जिसके अनुसार पशु तस्करी के दौरान सीमा सुरक्षा बल द्वारा जब्त किए गए पशुओं को कस्टम विभाग के पास जमा ना करना, इन पशुओं को नीलाम ना करना तथा किसी अधिकृत गैर सरकारी संस्था को पुलिस के माध्यम से जमा करने से भी  तस्करी को अवरोधित करने में मदद मिली है। उन्होंने बताया- 'इस कार्यवाही व पुनीत कार्य में एक गैर सरकारी आध्यात्मिक संस्था 'ध्यान फाउंडेशन' ने निस्वार्थ भाव से सीमा सुरक्षा बल द्वारा पकड़े गए पशुओं को पुनर्वासित करके पशु तस्करी को रोकने में अप्रत्यक्ष तौर पर अहम भूमिका निभाई। बॉर्डर गार्डिंग तथा बेहतर प्रबंधन से सीमा सुरक्षा बल की प्रतिष्ठा बंगाल में तथा सभी सिस्टर एजेंसियों की नजरों में बढ़ी है। साथ ही सीमा प्रहरियों का आत्मबल, हौसला तथा पेशेवर सत्य निष्ठा कई गुना बढ़ी है।'

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कोट :::

दक्षिण बंगाल सीमांत से पशु तस्करी पर अंकुश लगाने की सफलता गाथा एक उच्चस्तरीय नेतृत्व, टीम वर्क, पेशेवर दृष्टिकोण, सीमा प्रहरियों की कर्मठता, संसाधनों की गतिशील तैनाती, सिस्टर एजेंसियों से उच्च कोटि का समन्वय, उच्च स्तरीय खुफिया तंत्र तथा निर्धारित क्षेत्र और प्रतिबद्ध दृष्टिकोण का परिणाम है। दक्षिण बंगाल फ्रंटियर, कोलकाता के नेतृत्व ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे बुलंद हो, सोच सत्यनिष्ठा से परिपूर्ण हो तथा प्रतिबद्धता उच्च कोटि की हो तो किसी भी लक्ष्य को साधा जा सकता है। 

- सुरजीत सिंह गुलेरिया, डीआइजी, दक्षिण बंगाल फ्रंटियर (बीएसएफ)।

Posted By: Vijay Kumar

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