रमेश यादव, प्रयागराज। ‘अनाज बैंक’ यानी ऐसी व्यवस्था, जहां से जरूरतमंदों को उधार में दाल-चावल दिया जाता है। मकसद यह कि काम न मिलने पर भी दिहाड़ी मजदूर और उनका परिवार भूखा न सोए। बुद्धिजीवियों के सहयोग से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में ‘अनाज बैंक’ की 70 शाखाएं चल रही हैं। इस व्यवस्था में शर्त इतनी है कि उधार लेने वाले के पास जैसे ही पैसे आएंगे, वह कर्ज चुकता कर देगा। दो हजार से अधिक परिवार इस बैंक के सदस्य हैं।

2016 की बाढ़ में प्रयागराज की आठ तहसीलों के लगभग डेढ़ लाख लोग प्रभावित हुए थे। इसमें ज्यादातर दिहाड़ी पर कमाने वाले थे। बाढ़ से ऐसे लोगों का अपने परिवार का पेट भरना मुश्किल हुआ तो प्रगति वाहिनी ने गरीबों की मदद के लिए पहल की। यमुनापार और गंगापार में सामुदायिक ‘अनाज बैंक’ खोले, जहां पर आज जरूरतमंदों को अनाज उधार में मिलता है। अनाज बैंक शुरू करने के लिए प्रगति वाहिनी ने बुद्धजीवियों और उच्च वर्ग के लोगों से दो क्विंटल चावल, 20 किलोग्राम दाल के साथ उसे रखने के लिए दो कंटेनर, एक संदूक व रजिस्टर लिया।

बैंक के संचालन के लिए 21 सदस्यीय तदर्थ समन्वय समिति बनाई गई। समिति ने गांव का चयन किया। एक जिम्मेदार व्यक्ति के घर पर बैंक खोला गया। इसमें सदस्यता लेने के लिए लोगों से एक किलोग्राम अनाज लिया गया। पंजीकृत सदस्यों की सूची बनाई गई। किसे कब अनाज उधार दिया गया, कब उसने लौटाया, उसका विवरण रजिस्टर में दर्ज किया गया। स्थानीय स्तर पर बनी संचालन समिति (3-5 सदस्यीय) बैंक के कामकाज की निगरानी करती है।

पांच किलोग्राम चावल और एक किलोग्राम दाल की सीमा

नियमानुसार कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति अधिकतम पांच किलोग्राम चावल और एक किलोग्राम दाल उधार ले सकता है, लेकिन 15 दिन में उधार चुकता करना होता है। वह चाहे तो कर्ज से ज्यादा भी अनाज दे सकता है। समय पर न लौटा पाने पर स्थानीय संचालन समिति कुछ मोहलत देती है। अगर किसी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो जाती है तो अन्य लोग सहयोग कर उसका कर्ज भरते हैं।

यहां पर चल रहे अनाज बैंक

यमुनापार, कोरांव, मेजा, मांडा, शंकरगढ़, जसरा कौंधियारा विकास खंड। गंगापार, बहादुरपुर, सैदाबाद, हंडिया, प्रतापपुर, धनुपुर, फूलपुर विकास खंड।

अनाज बैंक का नारा है ‘न कोई भूखा सोएगा, न बच्चा भूख से रोएगा’। इसकी 100 शाखाएं खोलने की योजना है। तीन साल में 70 शाखाएं खुल चुकी हैं। 

-प्रो. सुनीत सिंह, संयोजक, अनाज बैंक संयोजन समिति (गोविंद

वल्ल्भपंत सामाजिक विज्ञान संस्थान)

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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