सीबीपी श्रीवास्तव। कल इस वर्ष का अंतिम दिन होगा। ऐसे में इस वर्ष की तमाम गतिविधियों के संदर्भ में थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो लगभग पूरे वर्ष समाचारों में महामारी, विरोध और राजनीतिक कलह का बोलबाला रहा। एक अत्यंत गंभीर घटना जिसने हमें अपने सोच पर दोबारा विचार करने के लिए विवश किया, वह थी नए बनाए गए तीन कृषि कानूनों का विरोध करनेवालों ने गणतंत्र दिवस पर ऐतिहासिक लाल किले पर कब्जा करने का प्रयास किया। साथ ही पुलिस के साथ झड़प की और हमें सोचने पर विवश कर दिया कि हमारे लिए राष्ट्र हित व्यक्तिगत हित से कम महत्वपूर्ण है। ऐसी घटनाओं के बारे में एक बड़ी हास्यास्पद बात यह है कि हम इन्हें अंजाम देने के बाद आसानी से उसकी कड़ी आलोचना और निंदा कर स्वयं को सभी दायित्वों से मुक्त कर लेते हैं।

भारत जैसे ज्वलंत लोकतंत्र में विरोध तो स्वाभाविक है, लेकिन क्या विरोध ऐसा होना चाहिए जो राष्ट्र हितों की अनदेखी करे या राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों को दुष्प्रभावित करे। स्व-हित के बदले स्व-नियंत्रण और स्व-मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। महात्मा बुद्ध ने कहा है, ‘आत्म दीपो भव’, जिसका अर्थ स्वयं को जागृत करना है तभी हम विकास के मार्ग पर चल सकते हैं। यह जनता और सरकार में शामिल सभी व्यक्तियों के साथ ही संस्थाओं पर भी लागू होता है।

भारत या किसी भी लोकतंत्र में विधि निर्माण की सर्वोच्च संस्था के रूप में संसद प्रतिष्ठित है। संसद की कार्यवाहियां आम लोगों के विचारों को न केवल अभिव्यक्त करती हैं, बल्कि उनसे विचार प्रभावित भी होते हैं। दुर्भाग्यवश संसद का मानसून सत्र पिछले दो दशकों में लोकसभा का तीसरा और राज्यसभा का आठवां सबसे कम उत्पादक सत्र रहा। जहां लोकसभा में बैठकों के लिए 96 घंटे और राज्यसभा में 97 घंटे की अवधि निर्धारित थी, वहीं उनकी बैठकें क्रमश: 21 और 28 घंटे ही हो पाईं जिसका कारण सदनों में व्यवधान रहा। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा जारी आंकड़ों में बैठकों की अवधि के अलावा जो गंभीर बात बताई गई है वह यह है कि लोकसभा में एक विधेयक को पारित करने में औसतन 34 मिनट और राज्यसभा में 46 मिनट लगे।

ध्यातव्य हो कि भारत का संसदीय तंत्र ब्रिटिश माडल (वेस्ट मिन्स्टर माडल) पर आधारित है जिसमें सदन में चर्चा और विमर्श को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन बिना पर्याप्त चर्चा के विधेयकों को पारित किया जाना कहीं न कहीं संसदीय तंत्र की मर्यादा के विरुद्ध प्रतीत होता है। भले हम यह दावा करें कि हमने विधेयकों के प्रविधानों को उतने कम समय में ही समझ लिया था, लेकिन यह सत्य है कि चर्चा के अभाव में न तो सरकार में पारदर्शिता लाना सरल होगा और न ही कानूनों में दूरदर्शिता होगी।

यह भी विदित है कि राजनीतिक लाभ लेने की मंशा से सरकारें कई प्रकार के विधेयकों का प्रस्ताव कर उन्हें यथाशीघ्र पारित भी करा लेती हैं, लेकिन कानूनों की अस्पष्टता के कारण उनके क्रियान्वयन की प्रभाविता कम होती है और दुरुपयोग की आशंकाएं भी बढ़ती हैं। ऐसी स्थिति में देश के सभी राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति के बदले राष्ट्र हित को वरीयता देने वाली मानसिकता लानी ही होगी। उल्लेखनीय है कि उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने ‘मिशन 5000’ की एक संकल्पना सामने रखी है और कहा है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाने के लिए जनता को आगे बढ़कर काम करना चाहिए और निर्वाचन क्षेत्रों में या इंटरनेट मीडिया के माध्यम से उनसे प्रश्न करना चाहिए कि उन्होंने अपने क्षेत्र, राज्य और राष्ट्र विकास में कैसे योगदान दिया है। उप-राष्ट्रपति ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि व्यवधानों के कारण जब विधानमंडल सुचारु रूप से कार्य नहीं करता तब न केवल लोगों का जीवन प्रभावित होता है, बल्कि इससे राष्ट्र के विकास के सपने भी टूटते हैं।

विदेश मामलों की चुनौती : वर्ष 2021 में वैदेशिक क्षेत्र पर दृष्टि डालें तो वहां भी चुनौतियां बनी रही हैं। खासकर चीन का बढ़ता प्रभुत्व भारत के लिए इस वर्ष भी चिंता का कारण रहा है। एक बड़ी पहल के रूप में भारत, इजरायल, यूएई और अमेरिका के बीच हुए समझौते को देखा जा सकता है जिसे ‘मध्य पूर्व चतुष्कोण’ कहा जा रहा है। यह हिंदू-प्रशांत में बने चतुष्कोण के समानांतर अवश्य है, लेकिन इसका उद्देश्य केवल चीन का प्रति संतुलन नहीं है। विकास के लिए इन राष्ट्रों के बीच सहयोग मध्य पूर्व में भारत की उपस्थिति को और ताकतवर बनाने में सहायता करेगा। इससे इन राष्ट्रों के लिए चीन को प्रति-संतुलित करना सरल होगा।

घरेलू स्तर पर उपलब्धियां : जहां तक घरेलू स्तर पर सरकार के कदमों का प्रश्न है, तो वर्ष 2021 में कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम आरंभ किए गए। जैसे, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज (बीमा) योजना, प्रधानमंत्री युवा रोजगार योजना, ई-श्रम पोर्टल, ग्राम उजाला योजना और प्रधानमंत्री उम्मीद योजना आदि। अवसंरचनात्मक विकास और कौशल विकास को वरीयता दिया जाना निश्चित रूप से भारत के सर्वागीण विकास में योगदान देगा बशर्ते इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो और उनपर पूरी तरह निगरानी रखी जाए।

न्याय के क्षेत्र में दिए गए अनेक निर्णय : न्याय तंत्र के क्षेत्र में भी यह वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है और उच्चतम न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। इनमें स्किन टू स्किन टच यानी त्वचा के संपर्क में आने के विषय में पोक्सो कानून की प्रभाविता बनाए रखने वाला निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इसके अलावा महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन का आदेश देकर न्यायालय ने भारत में लैंगिक समानता की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम उठाया है।

मार्च 2021 में शार्ट सर्विस में महिलाओं के लिए जो कमीशन का प्रविधान था, उसे न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि यह भेदभावपूर्ण है और लैंगिक विभेद को बढ़ावा दे रहा है। ध्यातव्य हो कि न्यायालय कई अवसरों पर अपने पहलकारी प्रयासों से सरकार को प्राथमिकताओं के निर्धारण में दिशा-निर्देश देता है। हालांकि ऐसे प्रयासों की कई बार न्यायिक हस्तक्षेप कह कर आलोचना की जाती है, लेकिन ऐसे दिशा-निर्देश अधिकांशत: सरकारों के लिए लाभकारी होते हैं। इसी संदर्भ में न्यायालय द्वारा मई 2021 में कोविड संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान आक्सीजन की उपलब्धता के लिए एक कार्यबल गठित करने का आदेश दिया था। साथ ही, यह भी कहा कि आक्सीजन आपूर्ति का विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए जिससे आपात स्थिति से निपटने में सहायता मिले।

वर्ष 2021 में नए अधिकारों के उभरने और उन पर न्यायालय के भविष्य में निर्णय देने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। हाल ही में सूचना सुरक्षा विधेयक ‘भूल जाने के अधिकार’ की बात उभरी है। इसमें उल्लेख है कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह उससे संबंधित सूचनाओं को हटाए जाने का निर्देश उस निकाय या व्यक्ति को दे जिसके पास उसकी सूचनाएं संग्रहित हैं। इस अधिकार को निजता के अधिकार से जोड़कर देखा गया है।

खिलाड़ियों ने बढ़ाया गौरव : खेल के क्षेत्र में भी भारत के लिए कई खिलाड़ियों ने ओलिंपिक में पदक जीतकर विश्व स्तर पर देश का गौरव भी बढ़ाया है। भारत सरकार द्वारा खेल रत्न सम्मान को मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखना न केवल उस महान खिलाड़ी को वास्तविक सम्मान देना है, बल्कि यह कदम हाकी और अन्य सभी खेलों में भारतीय खिलाड़ियों को प्रेरित करेगा। खेल का क्षेत्र भारत में बहुत विकसित नहीं रहा है, लेकिन पिछले कई वर्षो से विशेष ध्यान देने से निश्चित रूप से इस दिशा में भारत की प्रगति की दर बढ़ेगी और देश विश्व स्तर पर खेल के क्षेत्र में भी शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर सकेगा।

कुल मिलाकर, वर्ष 2021 लगभग सभी क्षेत्रों में घटनाओं से भरा रहा है। यह सत्य है कि इतने बड़े देश में घटनाएं दुखद और सुखद दोनों ही स्वरूप वाली होती हैं। इस संदर्भ में सबसे दुखद घटना यह रही कि भारत के पहले सीडीएस जनरल विपिन रावत शहीद हो गए जिसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था के समक्ष एक बड़ी चुनौती भी उत्पन्न कर दी है। नए वर्ष में हालांकि हम सभी अपने-अपने स्तर पर संकल्प अवश्य लेते हैं, लेकिन समय की मांग यह है कि हम सभी एकजुट होकर और राष्ट्र हित को सवरेपरि बनाकर एक ऐसी शपथ लें जिससे भारत स्थायित्व के साथ प्रगति करे।

इसी वर्ष दिल्ली विधानसभा द्वारा गठित शांति एवं सौहार्द समिति के समक्ष भारत में फेसबुक के प्रमुख द्वारा उपस्थित होने से इन्कार करने के मामले पर भी न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण बात कही है। यह इन्कार मौन रहने के अधिकार के प्रयोग के कारण था। न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न रखा गया था कि क्या विधान मंडल द्वारा गठित किसी समिति को किसी गैर सदस्य को समन जारी करने का अधिकार है? दूसरा प्रश्न यह था कि क्या मौन रहने का अधिकार मान्य है? अजित मोहन बनाम विधानसभा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली 2021 मामले में न्यायालय ने दार्शनिक वाल्टर बैगहाट को संदर्भित करते हुए कहा है कि विधायिका का कार्य केवल विधि निर्माण तक सीमित नहीं है।

वस्तुत: निर्वाचित सदन भारत की जनता के स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति है। ऐसे में वह किसी विशेष परिस्थिति में किसी गैर सदस्य को भी अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकती है। कारण यह है कि वाल्टर बैगहाट ने विधायिका के जिन पांच कार्यो का उल्लेख किया है वे पूर्णत: स्वीकार्य हैं। ये पांच कार्य हैं- निर्वाचक (इलेक्टिव), अभिव्यक्ति (एक्स्प्रेसिव), शिक्षण (टीचिंग), सूचनात्मक (इंफोर्मेटिव)तथा विधायी (लेजिस्लेटिव)।

अत: कोई समिति किसी गैर सदस्य को अपने समक्ष उपस्थित होने और उससे स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार रखती है। लेकिन विशेषकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में पुलिस केंद्र सरकार के दायरे में है। अत: विधायिका की समिति को किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए अनुशंसा करने का अधिकार नहीं है। इस संदर्भ में वह व्यक्ति मौन रहने के अधिकार का प्रयोग कर सकता है। ऐसे कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों से उच्चतम न्यायालय ने भारत में पहले की भांति लोकतांत्रिक मूल्यों की सुदृढ़ता में अपनी प्रभावी भूमिका बनाए रखी है।

[अध्यक्ष, सेंटर फार अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेस, दिल्ली]

Edited By: Sanjay Pokhriyal