मथुरा, विनीत मिश्र। ये कान्हा की नगरी है। यहां भक्ति की गंगा तो बहती ही है, पैसे नहीं होने पर खाना भी मुफ्त मिल जाता है। खाना किसी भंडारे में नहीं, ठेला वाले की दरियादिली से मिलता है। मथुरा बस स्टैंड पर छोले-भटूरे और कचौड़ी की दुकान (रेहड़ी) लगाने वाले अमृतलाल 28 साल से जरूरतमंदों को मुफ्त खाना खिला रहे हैं। उनकी दुकान पर भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- पैसा न होने पर चाय-नाश्ता मुफ्त मिलेगा...।

गोवर्धन क्षेत्र के डीग से वर्ष 1985 में मथुरा आकर बसे अमृतलाल बस स्टैंड के सामने नाश्ते की ठेला लगाने लगे। मुफ्त नाश्ता कराने के सफर के बारे में वह बताते हैं कि वर्ष 1992 में एक दिन उनके पास दंपती अपने चार बच्चों के साथ पहुंचे। तब एक कचौड़ी 50 पैसे की थी। दंपती ने दो रुपये में चार कचौड़ी लीं। अमृतलाल ने पूछा- छह लोग हो और कचौड़ी चार? उस व्यक्ति ने जवाब दिया- इतने पैसे तो मेरे पास नहीं हैं। और वह मायूस होकर लौटने लगा। उसकी इस विवशता ने अमृतलाल को झकझोर दिया। उन्होंने उसे वापस बुलाया और दो रुपये में दस कचौड़ियां दीं। यहीं से तय कर लिया कि कोई भी भूखा उनकी दुकान से बिना खाए नहीं लौटेगा। वह बताते हैं कि हर रोज 15-20 ऐसे लोग आ जाते हैं, जिनके पास पैसे नहीं होते और भूखे होते हैं। उनके चेहरे से ही मुझे पता लग जाता है कि वे भूखे हैं। मैं उन्हें उनकी इच्छा के अनुप खाना मुहैया कराता हूं। वह कहते हैं, यह बड़ा पुण्य का काम है। भूखे लोगों का पेट भरकर मन को बेहद सुकून मिलता है।

चंदा से करते किराए में भी मदद

अमृतलाल केवल मुफ्त भोजन ही नहीं कराते। किसी भी यात्री की जेब कट जाती है या फिर यात्रा के लिए पैसे नहीं होते, वह खुद लोगों से चंदा कर उसकी मदद करते हैं। एक वाकये को याद करते हळ्ए वह बताते हैं कि एक बार जयपुर के एक यात्री की पत्नी की तबीयत खराब हो गई। उसके पास पैसे नहीं थे, ऐसे में वह निस्सहाय था। तब न केवल पैसे का इंतजाम कराया बल्कि परिवार को छोड़ने जयपुर तक गए।

पैरों से दिव्यांग पर, मदद को दौड़ते

जिंदगी में अपना मकान न बनवा सके अमृतलाल के तीन बेटे और एक बेटी है। एक बेटे और बेटी की शादी कर दी। दो बेटे हाईस्कूल में पढ़ रहे हैं। अमृतलाल की जीवटता ही है कि चार बार एक्सीडेंट में वह पैरों से दिव्यांग हो गए। लेकिन लोगों की मदद करने का उनका सफर लगातार चल रहा है।

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