प्रमोद भार्गव। विश्वव्यापी आर्थिकी में नवाचारी क्षमता वह कड़ी है, जिससे उद्यमशीलता गति पकड़ती है। 21वीं सदी में विकास और रोजगार के क्षेत्र में प्रगति की उपलब्धियों में नवाचार ही वह माध्यम है, जो किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में सहायक है। नरेन्द्र मोदी जबसे प्रधानमंत्री बने हैं, तभी से उन्होंने नवाचार के लिए न केवल माहौल रचा, बल्कि नवाचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए कई नई संस्थाएं भी गठित कीं। इनमें राष्ट्रीय नवाचार परिषद, अटल इनोवेशन मिशन और भारत समावेशी नवाचार कोष जैसी संस्थाएं वजूद में लाई गईं। हालांकि नवीन अनुसंधान और नवाचार की जितनी संभावनाएं भारत में हैं, उस नाते एक ऐसी संस्था की भी जरूरत है, जो ऐसे नवाचारियों को प्रोत्साहित करे, जिन्होंने कोई अकादमिक शिक्षा प्राप्त तो नहीं की, लेकिन अत्यंत उपयोगी आविष्कारों के जन्मदाता बन गए हैं।

यदि ऐसा होता है तो नवाचार का जो क्षेत्र महज बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली और मुंबई में सिमट गया है, उसका विस्तार पूरे भारत में दिखाई देगा। कहते हैं कि पक्षियों के पंख अपने आप में परिपूर्ण होते हैं, लेकिन हवा के बिना कोई भी पक्षी उड़ान नहीं भर सकता है। यही स्थिति भारत में नवाचारी प्रयोगधर्मियों के साथ रही है। उनमें भरपूर क्षमताएं तो हैं, लेकिन उनकी कल्पनाओं को आकार देने के लिए उचित प्रोत्साहन एवं माहौल नहीं मिल पा रहा था। मोदी सरकार ने इसके निर्माण में अकल्पनीय काम किया है। इसी का परिणाम है कि 2021 में प्रगति का बुनियादी आधार माने जाने वाले ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (वैश्विक नवाचार सूचकांक) में भारत 46वें स्थान पर था, वह एक साल के भीतर ही छह कदमों की छलांग लगाकर 40वें स्थान पर आ गया है।

भारत को यह स्थान स्टार्टअप में बेहतर माहौल बनाने के कारण मिली है। यह सूचकांक विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआइपीओ) जारी करता है। यह बढ़त बीते सात साल में िमली है, अन्यथा इसके पहले 2015 में भारत 81वें स्थान पर था। इतने कम समय में 41 पायदान चढ़कर 40वां स्थान हासिल करना बड़ी बात है। हालांकि भारत में अभी भी शोध एवं नवाचार में निवेश इसकी कुल जीडीपी का मजह एक प्रतिशत ही किया जाता है। जबकि चीन में यह आंकड़ा 2.1 प्रतिशत, अमेरिका में 2.8, दक्षिण कोरिया में 4.2 और इजरायल में 4.3 प्रतिशत तक है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने सलाह दी है कि भारत को नवप्रवर्तन, औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास में अग्रणी बनने के लिए इस मद में निजी क्षेत्र का खर्च भी बढ़ाना होगा।

फिलहाल विश्व बाजार में सूचना प्रौद्योगिकी, दवा उद्योग और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को मान्यता मिल रही है। भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोटिक जैसी अत्यंत नई तकनीक में भी अनुसंधान करते हुए प्रगति कर रहा है। इसीलिए भारत की नवाचार के क्षेत्र में साख बनी है। इस दृष्टि से देश में नवाचार की कार्य संस्कृति को जानने के लिए नीति आयोग 2019 से नवाचार सूचकांक जारी कर रहा है। इस सूची में कर्नाटक देश के नवाचार सूचकांक में प्रथम पायदान पर है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और हरियाणा भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं। हरियाणा को यदि छोड़ दें तो घनी आबादी वाले हिंदीभाषी राज्य इस चुनौती को स्वीकारने में पिछड़ रहे हैं। इसका प्रमुख कारण विज्ञान, तकनीक और रोजगार कौशल के ज्ञान को अंग्रेजी में देना है।

यदि नई शिक्षा नीति के माध्यम से विज्ञान एवं तकनीकी विषयों को उच्च शिक्षण संस्थानों में मातृभाषाओं में पढ़ाए जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है तो कालांतर में यह स्थिति बदल सकती है। आविष्कारक को जिज्ञासु एवं कल्पनाशील होना जरूरी है। कोई विज्ञानी कितना भी शिक्षित क्यों न हो, वह कल्पना के बिना कोई मौलिक या नूतन आविष्कार नहीं कर सकता। शिक्षा संस्थानों से विद्यार्थी जो शिक्षा ग्रहण करते हैं, उसकी एक सीमा होती है, वह उतना ही बताती एवं सिखाती है, जितना हो चुका है। आविष्कार कल्पना की वह शृंखला है, जो हो चुके से आगे की अर्थात कुछ नितांत नूतन करने की जिज्ञासा को आधार तल देती है।

स्पष्ट है आविष्कारक, लेखक या नए सिद्धांतों के प्रतिपादकों को उच्च शिक्षित होने की कोई बाध्यकारी अड़चन पेश नहीं आती। गौरतलब है कि 1930 में जब देश में फिरंगी सरकार थी, तब वैज्ञानिक शोध का बुनियादी ढांचा न के बराबर था। विचारों को रचनात्मकता देने वाला साहित्य भी अपर्याप्त था और गुणी शिक्षक भी नहीं थे। अंग्रेजी शिक्षा शुरुआती दौर में थी। बावजूद सीवी रमन ने साधारण देसी उपकरणों के सहारे देशज ज्ञान और भाषा को आधार बनाकर काम किया और भौतिक विज्ञान में नोबेल दिलाया। जगदीशचंद्र बसु ने रेडियो एवं सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्हें रेडियो विज्ञान का जनक माना जाता है। सत्येंद्र नाथ बोस ने आइंस्टीन के साथ काम किया। मेघनाद साहा, रामानुजन, पीसी रे और होमी जहांगीर भाभा ने अनेक उपलब्धियां पाईं।

रामानुजन के एक-एक सवाल पर पीएचडी की उपाधि मिल रही है। एपीजे अब्दुल कलाम और के. शिवम जैसे युवा मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा लेकर महान विज्ञानी बने। आयुर्वेद उपचार और दवाओं का जन्म तो हुआ ही ज्ञान परंपरा से है। गोया, हम कह सकते हैं कि प्रतिभा जिज्ञासु के अवचेतन में कहीं छिपी होती है। इसे पहचानकर गुणीजन या शिक्षक प्रोत्साहित कर कल्पना को पंख देने का माहौल दें तो भारत की ग्रामीण धरती से अनेक विज्ञानी-आविष्कारक निकल सकते हैं।

[लोक नीति विशेषज्ञ]

पक्षियों के पंख अपने आप में परिपूर्ण होते हैं, लेकिन हवा के बिना कोई भी पक्षी उड़ान नहीं भर सकता है। यही स्थिति भारत में नवाचारी प्रयोगधर्मियों के साथ रही है। उनमें असीम क्षमताएं तो हैं, लेकिन उनकी कल्पनाओं को आकार देने के लिए उचित प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा था। 

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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