अलीगढ़ [कासं]। संसद पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु की फांसी पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में भी विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला चल पड़ा है। नमाज-ए-जनाजा के दो दिन बाद सोमवार को कश्मीरी छात्रों ने अफजल को शहीद का दर्जा देते हुए शांति मार्च निकाला। जमकर नारेबाजी की। अफजल की फांसी को कश्मीरियों पर अत्याचार बताया। केंद्र सरकार को बहरा कहा। सुप्रीम कोर्ट पर भी टिप्पणी की। अफजल के केस की तुलना गुजरात दंगे से करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को फांसी की सजा देने की मांग की। अफजल का शव उसके परिजनों को देने की मांग उठाई। इतना सब सरेआम हुआ, मगर पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।

यूनिवर्सिटी इंतजामिया का सिर्फ यही कहना था कि मार्च की इजाजत नहीं दी गई। कार्रवाई के सवाल पर भी चुप्पी। पुलिस-प्रशासन और इंतजामिया को अब इस बात का डर सताने लगा है कि 16 फरवरी को होने वाले एएमयू के दीक्षांत समारोह में कश्मीरी छात्र खलल न डाल दें, क्योंकि इसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी आ रही हैं।

हाथ में शहीद मिस्टर अफजल गुरु के नाम का बैनर और माथे पर प्रोटेस्ट लिखी काली पट्टी बांधे सैकड़ों कश्मीरी छात्र यूनिवर्सिटी की पुरानी कैंटीन पर इकट्ठा हुए। वहां से नारेबाजी करते हुए मार्च बाबे सैयद गेट तक निकला। छात्रों की जुबां से निकले अफजल तेरी याद में रो रही ये जमीं, रो रहा आसमां..और अफजल के वारिस जिंदा हैं..के नारों से कैंपस घंटों गूंजा। हाथ में आइएम अफजल. हैंग मी टू, इंडिया, यू किल्ड वन अफजल एंड गेव बर्थ टू हंड्रेड अफजल, वी आल आर अफजल लिखे पोस्टर लेकर कश्मीरी छात्र मार्च में विरोध करते नजर आए। वी वांट अफजल्स बॉडी बैक का पोस्ट लिए छात्रों ने केंद्र सरकार से अफजल के शव को उसके परिजनों के हवाले करने की मांग की। बाबे सैयद गेट पर मार्च के पहुंचते ही गेट बंद कर दिया गया। वहां कश्मीरी छात्रों ने तकरीर की।

छात्र अब्दुल राउफ ने तकरीर में कहा, बताना चाहते हैं यह विरोध गैर कानूनी तरीके से एक देशवासी के कत्ल को लेकर है। दहशतगर्दी के सपोर्ट में नहीं है। अफजल रियासते कश्मीर का बाशिंदा था। वह मिलिटेंट नहीं था। वह पढ़ा-लिखा कश्मीरी था। किसी हालात में फंस कर वह इस अंजाम तक पहुंचा। हिंदुस्तान की हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में उसका वाजिब हक नहीं मिला। उसे अपनी मर्जी का वकील मुकर्रर करने का मौका नहीं दिया गया। हालातों को सबूत मानकर उसे गुनहगार करार दे दिया गया। क्या जम्मू-कश्मीर के लोग सिलेक्टिव इंजस्टिस के लिए बने हुए हैं? सरकार राजीव गांधी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री के हत्यारों को फांसी क्यों नहीं दे पा रही? रउफ ने अफजल को फांसी देने से पहले उसकी पत्‍‌नी को सूचना न देने पर सवाल उठाया। भाजपा की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगाए। छात्र इम्तियाज ने देश के प्रथम नागरिक की भूमिका को गलत बताया।

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