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    अकेलेपन से डर क्यों लगता है, आचार्य प्रशांत ने बताया इसका संपूर्ण रहस्य

    By Vineet SharanEdited By:
    Updated: Fri, 28 May 2021 10:03 AM (IST)

    आचार्य प्रशांत ने कहा कि अकेलेपन से हमें डर इसलिए लगता है क्योंकि हमें जो कुछ भी मिला हुआ है वो दूसरों से ही मिला हुआ है। हमने आपने-आपको कभी जाना नहीं ...और पढ़ें

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    आचार्य प्रशांत के मुताबिक हमने सिर्फ़ वही जाना है जो हमें किसी और से मिला है।

    नई दिल्ली, जेएनएन। लेखक और वेदांत मर्मज्ञ आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अकेलापन हम सभी को परेशान करता है। थोड़ा-सा अकेले होते नहीं हैं कि तुरंत फेसबुक खोल लिया, फ़ोन मिला लिया। इतना ही नहीं, अगर हम किसी और को अकेला देख लेते हैं तो बोलते हैं, "क्या हुआ? इतना उदास क्यों हो?” जैसे कि अकेला होना उदास होने का सबूत है।

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    आचार्य प्रशांत ने कहा कि अकेलेपन से हमें डर इसलिए लगता है क्योंकि हमें जो कुछ भी मिला हुआ है वो दूसरों से ही मिला हुआ है। और दूसरों से जो मिला है उसके अलावा हमने आपने-आपको कभी जाना नहीं है। तो यह दूसरे जब कुछ देर के लिए जीवन से हटते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि जीवन ही बंद हो गया है, क्योंकि जो पूरी तरह से अपना है, उसको हमने कभी जाना ही नहीं है।

    आचार्य प्रशांत के मुताबिक हमने सिर्फ़ वही जाना है जो हमें किसी और से मिला है। और हमें सब कुछ दूसरों से ही मिला है। नाम दूसरों से मिला है, मान्यताएँ दूसरों से मिली हैं, धर्म दूसरों से मिला है, ज़िन्दगी की परिभाषा दूसरों से मिली है। मुक्ति, सत्य, पैसा, करियर, प्रेम, समाज—इन सबकी परिभाषा दूसरों से मिली है।

    इसलिए थोड़ी देर के लिए जब यह ‘दूसरे’ ज़िन्दगी से दूर हो जाते हैं तब बड़ी ज़ोर से डर लगता है। लगना तो स्वाभाविक है क्योंकि अगर ये ज़िन्दगी दूसरों का ही नाम है तो जब दूसरे हटते हैं तो ऐसा लगता है कि ज़िन्दगी ही दूर हट गयी है। अकेलेपन से बस उसको ही डर नहीं लगेगा जिसने ख़ुद को जाना है। जो कहता है, "दूसरों के अलावा भी मेरा कुछ है जो किसी ने मुझे दिया नहीं और कोई मुझसे छीन नहीं सकता” - वही नहीं डरेगा अकेलेपन से। फ़िर उसके लिए ‘अकेलापन’ बन जाएगा ‘कैवल्य’। और इन दोनों शब्दों में बहुत अंतर है, ज़मीन-आसमान का। अब उसके लिए अकेलापन एक डरावना सपना नहीं रह जाता है, वही एकांत अब एक उत्सव बन जाएगा। पर हम में से बहुत लोगों को अपने साथ समय बिताना ही पसंद नहीं होता। हमें अकेला छोड़ दिया जाए तो बहुत असहज हो जाते हैं।

    जिसको अपना साथ पसंद नहीं है, किसी और को उसका साथ कैसे पसंद आएगा?

    आचार्य प्रशांत कहते हैं कि आप अपने साथ रहना पसंद नहीं करते, दूसरे आपके साथ रहना कैसे पसंद कर सकते हैं? आपकी हालत इतनी ख़राब है कि आप अपने साथ रहना गवारा नहीं कर सकते, आप अपने साथ रहना बर्दाश्त नहीं कर सकते, दूसरे आपको कैसे बर्दाश्त कर लेंगे? पहले तो आप कैवल्य को पाइए, अपने साथ खुश रहना सीखिए, दूसरों पर से निर्भरता हटा दीजिए। इस अकेलेपन को कैवल्य में बदलिए। और बहुत मज़े की बात है कि जो अपने में खुश होना जान जाता है, फिर जब वह दूसरों के साथ होता है तो पूरी तरह से उनके साथ हो जाता है। जो अकेला है, जब वह दूसरों के साथ होता है तो क्या होता है? साथ के लिए बेचैन – "बस कोई मिल जाए"। तो अब जो भी मिलेगा, मैं क्या करूँगा उसके साथ? – "मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता"। और दूसरा कह रहा है, "मुझसे क्या गलती हो गयी? छोड़ दे मुझे!”

    आचार्य कहते हैं किअकेलेपन के कारण जो भी संबंध बनेगा, वो दुःख ही देगा। अकेलेपन से जो भी संबंध निकलेगा, वो यही होगा – "दोनों हाथों से पकड़ लो, जाने मत देना!” अब वो आपको मुक्त नहीं छोड़ सकता। और अगर वो देख लेगा कि आप किसी और के साथ हैं तो ज़बरदस्त ईर्ष्या भी होगी। यह सब अकेलेपन की बीमारियाँ हैं – मालकियत, ईर्ष्या, डर। यही सब होगा – "मेरे साथ जितने दोस्त थे, सबकी शादी हो गयी। माँ, मेरी भी करा दो, बहुत अकेलापन लगता है।"

    संबंध तो आपकी पूर्णता से बने। कैवल्य ही पूर्णता है। उससे जो संबंध बनेगा, वो बहुत ख़ूबसूरत होगा। तब आप एक दूसरे के साथ इसलिए हैं, क्योंकि आप आनंद में हैं, इसलिए नहीं कि आप ज़रुरतमंद हैं। मानसिक या शारीरिक ज़रुरत - यदि इन दोनों में से कोई-न-कोई ज़रुरत है, तो इसमें से जो भी संबंध निकलेगा, वो शोषण का सम्बन्ध होगा।