दलबदल का खेल... चार साल में केवल 29 नेताओं ने थामा BJP का दामन, ADR की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
2022-26 के बीच 111 सांसदों-विधायकों ने दल बदले। इसमें 29 सांसदों और विधायकों ने भाजपा का दामन थामा, फिर सवाल है कि अन्य नेता कौन-कौन सी पार्टी में गए?
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भाजपा का झंडा।
HighLights
2022-2026 के बीच 111 सांसदों और विधायकों ने दल बदले।
नागालैंड में सर्वाधिक 32 दलबदल के मामले दर्ज किए गए।
भाजपा ने 29 नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, कांग्रेस ने 19 खोए।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में 'आया राम, गया राम' की संस्कृति आज भी किस हद तक हावी है, इसका एक और बड़ा सच सामने आया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच (NEW) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 से 2026 के बीच देश भर में 111 निर्वाचित सांसदों और विधायकों ने अपने राजनीतिक दल बदल लिए हैं।
24 सितंबर को जारी की गई इस रिपोर्ट ने एक बार फिर देश की चुनावी राजनीति और दल बदल विरोधी कानून के प्रभाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब सवाल है कि यह है कि ऐसे कौन-कौन से राज्य हैं जहां के सांसदों ने ज्याया पाला बदला है? फिर पाला बदलने के बाद किस पार्टी का दामन थामा और किस पार्टी को इससे फायदा हुआ? आइए जानते हैं।
कौन सा राज्य इसमें सबसे आगे?
ADR की इस रिपोर्ट में 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया है, जिनमें 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं। गौर करने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में दलबदल के मामलों में नगालैंड सबसे ऊपर रहा, जहां सबसे ज्यादा 32 मामले दर्ज किए गए।
इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20, तेलंगाना में 9, गोवा और पंजाब में 8-8, महाराष्ट्र और मेघालय में 6-6, मणिपुर में 5, अरुणाचल प्रदेश और गुजरात में 4-4, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में 2-2, जबकि कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 1-1 मामला सामने आया।
किस पार्टी ने सबसे ज्यादा विधायक/सांसद अपनाए?
बता दें कि इस सूची में सबसे आगे नगा पीपुल्स फ्रंट (NPF) रहा, जिसमें कुल 32 (29%) विधायकों ने एंट्री ली। यह मुख्य रूप से नगालैंड में राजनीतिक समीकरणों NDPP और NPF के बीच तालमेल का परिणाम माना जाता है।
सूची में दूसरे स्थान पर भाजपा का नाम है। इसमें कुल 29 यानी 26% नए सांसद विधायक शामिल हुए। एनसीपीआई (NCPI) को 20 (18%) नेता शामिल हुए। इसके अलावा कांग्रेस को 9, शिवसेना को 8, एनपीपी को 6 और पीपीए को 4 नेता मिले।
भाजपा में शामिल नहीं हुए कोई लोकसभा सांसद
ADR की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा में शामिल होने वाले 29 जनप्रतिनिधियों में 7 राज्यसभा सांसद और 22 विधायक शामिल हैं, जबकि एक भी लोकसभा सांसद बीजेपी में नहीं गया।
ध्यान दिला दें कि आप के सभी सातों राज्यसभा सांसद स्वाती मालीवाल, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राघव चड्ढा, संदीप कुमार पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता ने अप्रैल 2026 में बीजेपी का दामन थाम लिया।
विभिन्न राज्यों से आए नेता
इस बात को ऐसे समझिए कि इनमें गोवा के 8, गुजरात के 4 और हिमाचल प्रदेश के 2 कांग्रेस विधायक शामिल हैं। इसके अलावा मणिपुर के 5 जेडी(यू) विधायक, उत्तर प्रदेश से सपा विधायक मनोज कुमार पांडे, मध्य प्रदेश से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे और कर्नाटक में केआरपीपी का भाजपा में विलय शामिल है।
गुजरात के चार पूर्व कांग्रेस विधायक सीजे चावड़ा, अर्जुन मोढवाड़िया, अरविंद लादानी और चिराग पटेल ने इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर उपचुनाव भी लड़ा।
किन पार्टियों से छोड़कर गए सबसे ज्यादा नेता?
नेता बदलने के मामले में सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाली पार्टियां इस प्रकार रहीं-
- एनडीपीपी (NDPP)- सबसे ज्यादा 25 (23%) नेताओं ने इस पार्टी का साथ छोड़ा।
- तृणमूल कांग्रेस (AITC)- 20 (18%) नेताओं ने पार्टी छोड़ी ये सभी पश्चिम बंगाल के लोकसभा सांसद हैं, जिन्होंने एनसीपीआई में विलय का दावा किया है।
- कांग्रेस पार्टी- 19 (17%) नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ा।
- इसके अलावा बीआरएस से 9, आप और एनसी से 7-7, शिवसेना (उद्धव) से 6, और जेडी(यू) से 5 नेताओं ने पाला बदला।
क्या सभी 111 मामले व्यक्तिगत दलबदल थे?
गौरतलब है कि एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि सभी मामलों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसे चार अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है।
- व्यक्तिगत दलबदल- जहां कोई विधायक बिना इस्तीफा दिए स्वेच्छा से दूसरी पार्टी में चला जाता है।
- पार्टी विलय- जहां मूल पार्टी या उसका एक बड़ा हिस्सा कानूनी रूप से दूसरी पार्टी में मिल जाता है (जैसे नागालैंड का एनडीपीपी-एनपीएफ मामला)।
- इस्तीफा और उपचुनाव- जहां विधायक या सांसद पद से इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं और फिर उपचुनाव जीतकर आते हैं।
- अयोग्यता और उपचुनाव- जहां संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए जाने के बाद सदस्य दोबारा उपचुनाव लड़ते हैं।
खास बात यह रही है कि एडीआर और एनईडब्ल्यू ने यह भी सावधानी बरती है कि उनके द्वारा जुटाए गए आंकड़े अंतिम रूप से पूर्ण नहीं हो सकते, क्योंकि राजनीतिक दलों और सदनों में दलबदल से जुड़ा कोई केंद्रीकृत और व्यवस्थित आधिकारिक डेटा आसानी से उपलब्ध नहीं होता। इससे पहले सितंबर 2021 में 2014 से 2021 के बीच के दलबदलों की रिपोर्ट जारी की गई थी।
