मृगेंद्र पांडेय, रायपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्किल इंडिया का गोल छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र के आदिवासी युवा पूरा कर रहे हैं। नक्सल प्रभावित बस्तर और कांकेर के आदिवासी युवाओं को रोजगार का अवसर उपलब्ध कराने के लिए सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ प्लास्टिक्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सिपेट) में प्रवेश दिलाया गया।

सिपेट में चयनित 70 फीसद आदिवासी युवाओं का प्लेसमेंट हुआ है। इन युवाओं को पुणे, अहमदाबाद, बंगलुरू, दिल्ली, नोएडा और मुंबई की बड़ी प्लास्टिक कंपनियों में नौकरी मिली। अधिकांश युवा दसवीं, 12वीं पास थे और बेरोजगार थे। सिपेट में प्रवेश के बाद इनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। अधिकांश युवा ऐसे परिवार से हैं, जिनके पास न तो घर था, न खेती।

सबसे ज्यादा नौकरी पुणे में

सिपेट के डायरेक्टर सचिन मिश्रा ने बताया कि 21 सौ से ज्यादा युवाओं को प्लास्टिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई जा रही है। सबसे ज्यादा नौकरी पुणे की नामी प्लास्टिक कंपनियों में मिली है। बच्चों को एक से दो साल की पढ़ाई के दौरान प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी दी जा रही है, जिसके कारण आदिवासी युवाओं के प्लेसमेंट में आसानी हो रही है। रायपुर में सिपेट का कैंपस तैयार किया गया है, जिसमें बस्तर, सरगुजा और कांकेर से आने वाले युवाओं को हॉस्टल में रखा जाता है। पढ़ाई के दौरान स्थानीय प्लास्टिक कंपनियों में प्रशिक्षण के लिए भी भेजा जाता है।

महिलाएं बन रहीं परिवार का सहारा

जशपुर के पतरापाली, कांसाबेल गांव की रहने वाली बनीता बाई ने दसवीं तक पढ़ाई की थी। गरीब परिवार से तालुल्क रखने वाली बनीता के पिता एक किसान हैं और तीन हजार रुपये मासिक कमाई में बड़ी मुश्किल से घर चलाते हंै। सिपेट में आयोजित कैंपस प्लेसमेंट में उसका चयन लुसा टीवीएस उद्योग पूना (महाराष्ट्र) में हुआ। उन्हें अब 12 हजार रुपये मासिक वेतन मिल रहा है। अब वह अपने परिवार का गर्व के साथ सहारा बन गई हैं।

यह है सिपेट की खासियत

रसायन एवं पेट्रो रसायन विभाग उर्वरक और रसायन मंत्रालय की ओर से संचालित सिपेट में एडमिशन के लिए परीक्षा का आयोजन होता है। यहां डीपीटी, डीपीएमटी, पीजीडी और पीपीटी जैसे कोर्स संचालित हैं। प्लास्टिक इंजीनियरिंग करने के बाद युवा डिजाइनिंग, मोल्ड मेकिंग जैसे फील्ड में भविष्य बना रहे हैं।

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Posted By: Arun Kumar Singh