'उच्च शिक्षण संस्थानों के 9 प्रतिशत छात्रों को आते हैं आत्महत्या के विचार', सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स के सर्वे में खुलासा
सर्वे के अनुसार, लगभग 9 प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही, जबकि 15 प्रतिशत गंभीर तनाव ...और पढ़ें

उच्च शिक्षण संस्थानों के 9 प्रतिशत छात्रों को आते हैं आत्महत्या के विचार। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)
HighLights
सुप्रीम कोर्ट टास्क फोर्स ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सर्वे किया।
सर्वे में 9% छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही।
संस्थानों में भेदभाव, अकेलापन और काउंसलिंग की कमी बड़ी समस्या।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ऊंची पढ़ाई, बेहतर करियर और अपने सपनों को पूरा करने की दौड़ में देश के हजारों छात्र भीतर ही भीतर गंभीर मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं। इस पर यदि संस्थानों में जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव हो तो स्थिति और गंभीर हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्रों की आत्महत्या के मामलों की जांच और रोकथाम के लिए गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स के सर्वे में इसकी चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।
सर्वे में शामिल करीब 2.43 लाख छात्रों में से लगभग 15 प्रतिशत ने बताया कि पिछले छह महीनों में वे ऐसे दौर से गुजरे, जब वे बेहद परेशान या तनाव में थे। वहीं नौ प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही।
यह सर्वे राष्ट्रीय टास्क फोर्स की उस अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसे उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत सुधारने और आत्महत्या की घटनाएं रोकने के उपाय सुझाने के लिए तैयार किया जा रहा है। रिपोर्ट 31 अक्टूबर तक सौंपे जाने की उम्मीद है।
अकेलापन और भेदभाव भी बढ़ा रहे परेशानी
सर्वे में 34 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि परिसर में रहते हुए उन्हें कभी न कभी बाहरी जैसा महसूस हुआ। करीब 67 प्रतिशत प्रतिभागी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
टास्क फोर्स की अंतरिम रिपोर्ट में भी उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव, जातिगत अपमान, लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न और ‘मोरल पुलिसिंग’ जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया था।
सर्वे में केवल 56 प्रतिशत छात्रों को भरोसा था कि उनका संस्थान गंभीर मामलों का निष्पक्ष समाधान करेगा। करीब 32 प्रतिशत ने कहा कि उनके संस्थान में काउंसलिंग की सुविधा ही नहीं है। पढ़ाई, करियर और नौकरी को लेकर लगातार बनी रहने वाली चिंता भी छात्रों के लिए बड़ी परेशानी के रूप में सामने आई।
पंखे हटाने से नहीं बदलेगी स्थिति
आईआईटी दिल्ली और आईआईटी मुंबई में छात्रों की मौत की घटनाओं के बाद कई संस्थानों में हॉस्टल के कमरों से सीलिंग फैन हटाने या एंटी-सुसाइड पंखे लगाने जैसे कदम उठाए गए हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल ऐसी व्यवस्थाएं करना पर्याप्त नहीं है। छात्रों को लगातार भावनात्मक सहारा, काउंसलिंग और ऐसा माहौल चाहिए, जहां वे बिना डर अपनी परेशानी साझा कर सकें।
क्लिनिकल मनोवैज्ञानी श्वेता शर्मा के अनुसार, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले कई प्रतिभाशाली छात्र पढ़ाई और प्रदर्शन में तो आगे होते हैं, लेकिन रिश्तों और सामाजिक जीवन से जुड़ी परेशानियों से जूझते हैं।
उनके मुताबिक, हॉस्टल से पंखे हटाना समाधान नहीं है। सीनियर थेरेपिस्ट मैत्री चंद ने छात्रों का खुद को नुकसान पहुंचाना व्यवस्था से जुड़ी समस्या बताया। उनका कहना है कि जरूरत इस बात की है कि छात्र जब मानसिक संकट में हों तो उन्हें समय पर मदद और सुरक्षित माहौल मिले।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
