बिलासपुर, जेएनएन। छत्तीसगढ़ में समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों की शह पर कागजी संस्था के नाम पर एक करोड़ रुपये के घपले में नई जानकारियां सामने आने लगी हैं। हाई कोर्ट ने इस मामले में सीबीआइ को सात आइएएस अधिकारियों समेत 12 अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। इस मामले में पूर्ववर्ती सरकार के जमाने में ही हाई कोर्ट में लगाए गए दस्तावेजों से नई चौंकाने वाली जानकारी मिलने लगी है।

समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने घपला करने में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अल्तमास कबीर के वाहन में पेट्रोल के नाम पर भी 31 लाख रुपये की फर्जी बिलिंग की। याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल उठाया है कि सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस कबीर नौ सितंबर 2011 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में नेशनल सेमिनार में शामिल होने आए थे। वाहन व्यवस्था की जिम्मेदारी समाज कल्याण विभाग को सौंपी गई थी। जिसकी आड़ में 31 लाख रुपये का फर्जी बिल लगाया गया।

दरअसल अधिकारियों ने 2004 में समाज कल्याण विभाग की शाखा फिजिकल रिफरल रिहेब्लिटेशन सेंटर नाम से कागज में ही प्रदेशभर में इसे स्थापित किया और हर शाखा में 18 से 20 कर्मचारियों की नियुक्ति कर दी। ये ऐसे कर्मचारी हैं जो विभाग की विभिन्न शाखाओं में पहले से कार्यरत हैं। इसके अलावा इन शाखाओं में लाखों रपये की मशीन की भी खरीद होने की पुष्टि हुई है। साथ ही इन मशीनों की मरम्मत के नाम पर भी लाखों रुपये खर्च किए गए हैं।

आरोपित को ही बनाया केस का ओएसडी

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के निर्देश पर जिन अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर कर जांच के लिए कहा गया उनमें समाज कल्याण विभाग के एडिशनल डायरेक्टर पंकज वर्मा का नाम भी शामिल है। पिछली सरकार ने मामले के आरोपित पंकज को ही इस केस का ओएसडी बना दिया। ओएसडी के नाते पंकज वर्मा ने हाई कोर्ट में हलफनामा देते हुए जवाब देने के लिए कोर्ट से समय मांगा था।

तत्कालीन मुख्य सचिव ने माना था हुई है गड़बड़ी

मामले में सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य सचिव अजय सिंह ने बीते साल हाई कोर्ट में 500 पन्ने की जांच रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि इस मामले में लगभग 150-200 करोड़ रुपये की गड़बड़ी हुई है। मुख्य सचिव ने यह भी कहा है कि चार करोड़ रुपये समाज कल्याण के अफसरों ने बिना अनुमोदन लिए निजी लोगों के खातों में ट्रांसफर कर दिया।

ऐसे दिया घोटाले को अंजाम

राज्य के एक दर्जन आला अफसरों ने 16 साल के भीतर एक हजार करोड़ के घोटाले को अंजाम दिया है। अफसरों ने बड़ी सोची-समझी रणनीति के तहत पहले कागजों में पीआरसीसी सेंटर का निर्माण किया। इसके बाद फर्जी तरीके से कर्मचारियों की नियुक्ति कर दी। उन्हीं कर्मचारियों को अपने सेंटर में काम करना बताया जो राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में निचले दर्जे के छोटे पदों पर काम कर रहे हैं।

ऐसे ही एक कर्मचारी कुंदन सिंह जो रायपुर स्थित मठपुरैना स्वावलंबन केंद्र जो समाज कल्याण विभाग की एक शाखा है, में संविदा नियुक्ति पर काम कर रहा था, जिसे अफसरों ने अपनी संस्था में ग्रेड 2 का कर्मचारी बताकर हर महीने इनके नाम से वेतन का आहरण कर रहे थे। आरटीआइ से खुलासा हुआ कि अफसरों ने प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों में फर्जी तरीके से सेंटर स्थापित कर सभी सेंटरों में 17-18 कर्मचारियों की भर्ती दर्शाकर इनके नाम पर वेतन का आहरण किया।

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