नई दिल्ली, [जागरण स्पेशल]। कालाधन देश में बड़ा मुद्दा है। खासतौर पर 2014 के आम चुनाव में इस मुद्दे को भाजपा ने जन-जन तक पहुंचाया। उस वक्त योगगुरु रामदेव ने भी कालेधन के मुद्दे पर तत्कालीन केंद्र सरकार को घेरा था। इसके बाद आम चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में NDA को बहुमत मिला। कालेधन पर नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही तुरंत SIT गठित की। स्विस बैंकों में कालाधन जमा कराने वाले कई लोगों का नाम भी सामने आया। साल 2016 में सरकार ने उस समय प्रचलन में रहे हजार और पांच सौ के नोट बंद कर दिए। सरकार के इस कदम को भी कालेधन के खिलाफ एक मुहिम बताया गया। पिछले 30 साल में कालेधन का जो अध्याय लिखा गया है, वह हैरान करने वाला है। सिर्फ पिछले तीन दशक में ही 490 अरब डॉलर का कालाधन देश से बाहर जा चुका है।

स्विटजरलैंड के बैंकों में जमा है अरबों डॉलर का कालाधन
साल 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्विस बैंकों में भारतीयों का कुल सात हजार करोड़ डॉलर (करीब 5 लाख करोड़ रुपये) जमा है। स्विटजरलैंड की अर्थव्यवस्था में विदेशी कालेधन का कितना बड़ा योगदान है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां के बैंकों में विदेशी ग्राहकों का 100 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पैसा जमा है।

कालाधन देश से बाहर भेजने वाले टॉप 5 देशों में भारत
अगर आपको लगता है कि कालेधन की समस्या सिर्फ भारत में है तो आप गलत हैं। सबसे ज्यादा कालाधन हमारे पड़ोसी देश चीन से विदेश भेजा गया है। कालेधन के मामले में चीन सबसे आगे है। इस काली सूची में रूस दूसरे नंबर पर है। भारत से आगे इस सूची में अमेरिका का पड़ोसी देश मैक्सिको है। कालाधन देश से बाहर भेजने के मामले में भारत चौथे नंबर पर है, जबकि पांचवे नंबर पर मलेशिया है। इसमें भी बड़ी बात यह है कि विकासशील देशों से हर साल करीब 1 खरब डॉलर का कालाधन बाहर चला जाता है। यह आंकड़ा कितना बड़ा है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह 86 बड़ी कंपनियों के मुनाफे के बराबर है।

कालाधन बनाम GDP
कालाधन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा घातक होता है। कालाधन वह पैसा होता है जो बाजार में नहीं आता और उसे बुरी नीयत से दबाकर रख लिया जाता है। किसी अर्थव्यवस्था में जितना कालाधन होगा उसकी स्थिति उतनी ही खराब होगी। अब अगर बात की जाए कालाधन बनाम GDP की तो सब-सहारन अफ्रीकी देशों में अर्थव्यवस्था का 5.53 फीसद कालाधन है। विकासशील देशों की बात करें तो यूरोप में 4.45 फीसद, एशिया में एशिया 3.75 फीसद, मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों 3.73 फीसद और अमेरिका व कैरेबियन देशों की अर्थव्यवस्था का 3.3 फीसद कालाधन है।

तीन दशक में 490 अरब डॉलर कालाधन
कालेधन के संबंध में वित्त पर स्थायी मामलों की समिति ने तीन प्रतिष्ठित आर्थिक और वित्तीय शोध संस्थानों की रिपोर्ट का हवाला दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक 1980 से 2010 के बीच भारतीयों ने 216.48 अरब डॉलर से लेकर 490 अरब डॉलर के बीच कालाधन देश से बाहर भेजा है।

किसने किया यह शोध
यूपीए-2 के दौरान कालेधन का मुद्दा काफी गरम था। इस पर राजनीतिक विवाद के बीच मार्च 2011 में तत्कालीन मनमनोहन सिंह सरकार ने तीन संस्थानों को देश और देश के बाहर भारतीयों के कालेधन का पता लगाने की जिम्मेदारी दी थी। इन तीन संस्थानों में राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (NIPFP) राष्ट्रीय व्यावहारिक आर्थिक शोध परिषद (NCAER) और राष्ट्रीय वित्तीय प्रबंध संस्थान (NIFM) शामिल थे। कांग्रेस नेता एम. वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने 16वीं लोकसभा (मोदी सरकार का पहला कार्यकाल) भंग होने से पहले इसी साल 28 मार्च को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

क्या है रिपोर्ट में
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वह कालेधन के मामले में संबद्ध पक्षों से पूछताछ की प्रक्रिया में कुछ सीमित संख्या में ही लोगों से बातचीत कर पाई। क्योंकि उसके पास समय का आभाव था। समिति ने कहा, इसलिए इस संदर्भ में गैर सरकारी गवाहों और विशेषज्ञों से पूछताछ करने की कवायद पूरी होने तक इसे समिति की प्राथमिक रिपोर्ट के रूप में लिया जा सकता है।

ये हैं समिति के सुझाव
समिति ने कहा, वह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग से उम्मीद करती है कि वह कालेधन का पता लगाने के लिए और ज्यादा ताकत के साथ कोशिश करेगा। समिति ने कहा कि विभाग इन तीन अध्ययनों और कालेधन के मुद्दे पर गठित SIT द्वारा पेश सातों रिपोर्टों पर आगे की जरूरी कार्रवाई भी करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुप्रतीक्षित प्रत्यक्ष कर संहिता को जल्द से जल्द तैयार कर उसे संसद में रखा जाए, ताकि प्रत्यक्ष कर कानूनों को सरल और तर्कसंगत बनाया जा सके।

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Posted By: Digpal Singh

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