15 हजार करोड़ रुपये की परियोजना, 6 राज्यों का समझौता और यमुना को नया जीवन... क्यों खास है किशाऊ प्रोजेक्ट?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर 6 राज्यों के बीच दशकों पुराना जल विवाद सुलझाने के लिए 15 सितंबर, 2026 को एक ऐतिहासिक समझौता होने जा रहा है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।
HighLights
6 राज्यों के बीच किशाऊ परियोजना पर दशकों पुराना विवाद सुलझा।
15,000 करोड़ की लागत से जल वितरण, बिजली उत्पादन होगा।
यमुना नदी को मिलेगा नया जीवन, बाढ़ नियंत्रण में मदद।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दशकों से अलग-अलग राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर विवाद रहा है। केंद्र सरकार इस विवाद को सुलझाने पूरी कोशिश कर रही है। इसी कड़ी के तहत आज यानी 15 सितंबर, 2026 को ऐसा करार होने जा रहा है जो 6 राज्यों के बीच जल विवाद को सुलझा देगा। दशकों से लटकी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना लेकर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं।
नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होंगे। 15 जून को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की अध्यक्षता में हुई बैठक में सभी संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री जल वितरण के प्रस्ताव पर सहमत हो चुके हैं।
किशाऊ के करार में छिपे इन सवालों के जवाब
- परियोजना से किस राज्य को कितना पानी।
- किसे बिजली का लाभ।
- हिमाचल के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान तक कैसे पहुंचेगा।
- उत्तराखंड को इस करार से क्या हासिल होगा।
इन सवालों के जवाब किशाऊ के इस करार में छिपे हैं।
15 सितंबर का समझौता किशाऊ परियोजना के जल और बिजली घटकों से जुड़े वित्तीय तथा जल-बंटवारे के ढांचे को स्पष्ट करेगा। सबसे अहम प्रविधानों में हिमाचल प्रदेश के हिस्से के पानी का दिल्ली और राजस्थान को उपयोग शामिल है। इसके बदले दिल्ली और राजस्थान हिमाचल के बिजली घटक की लागत में योगदान करेंगे।
वहीं उत्तराखंड और हिमाचल को जल घटक की लागत में वित्तीय योगदान नहीं करना होगा, जबकि जल घटक की लागत का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार की सहायता से पूरा किया जाएगा। समझौते में पानी का हिस्सा और बिजली की लागत, दोनों को आपस में जोड़कर राज्यों के हितों का संतुलन बनाया गया है।
किस राज्य को कितना पानी मिलेगा?
परियोजना के तहत हरियाणा को 836 क्यूसेक पानी मिलने का प्रस्ताव है। वहीं, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलेगा। इस लिहाज से परियोजना केवल एक राज्य की जल जरूरत पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के कई राज्यों के लिए जल उपलब्धता और अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत करने वाली पहल बन सकती है।
क्या है किशाऊ परियोजना
- किशाऊ परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित की जाने वाली एक राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है।
- टोंस नदी यमुना नदी की प्रमुख सहायक नदी है।
- इस परियोजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट का गुरुत्व बांध बनाया जाएगा।
- निर्माण कार्य पूरा होने पर यह टिहरी बांध के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध बन जाएगा।
- इस बांध से 660 मेगावॉट हरित ऊर्जा क्षमता का सृजन होगा।
- करीब 15,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली किशाऊ परियोजना की जल भंडारण क्षमता 1561.91 मिलियन घन मीटर है।
- परियोजना में जल भंडारण के साथ बहुउद्देशीय उपयोग का प्रविधान है।
- राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद निर्माण से जुड़ी आगे की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है।
क्या है किशाऊ परियोजना का उद्देश्य?
हर साल लगभग 1,379 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया जाएगा। यह बिजली उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच समान रूप से बांटी जाएगी। इसकी जल भंडारण क्षमता 1,324 मिलियन घन मीटर होगी। परियोजना का उद्देश्य जल संरक्षण, पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसे बहुउद्देशीय लाभ सुनिश्चित करना है।
यमुना को कैसे मिलेगा लाभ?
किशाऊ बांध से बिजली और पानी के अलावा यमुना की सफाई करने में भी मदद मिलेगी। इससे मानसून के दौरान बाढ़ की विभीषिका को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। गर्मी के मौसम में टोंस और आगे चलकर यमुना नदी में निरंतर जल प्रवाह बनाए रखा जा सकेगा, जिससे यमुना नदी को साफ करने के अभियान में मदद मिल सकेगी।
छह दशक से क्यों अटका था किशाऊ?
किशाऊ परियोजना स्थापित करने की योजना करीब छह दशक पहले बनी। परियोजना को लेकर शुरुआती स्तर पर स्थल, भूगर्भीय परिस्थितियों और तकनीकी पहलुओं का अध्ययन हुआ। इसके बाद डीपीआर, लागत, जल बंटवारे और छह राज्यों की वित्तीय हिस्सेदारी जैसे मुद्दे सामने आते गए।
परियोजना को वर्ष 2008 में राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा भी मिला, लेकिन अंतरराज्यीय सहमति का पेंच नहीं सुलझ पाया। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ने आगे बढ़कर संयुक्त उपक्रम बनाया, मगर परियोजना को वास्तविक गति देने के लिए छह राज्यों के बीच व्यापक सहमति जरूरी थी। अब यही सबसे बड़ा अड़ंगा दूर होता दिखाई दे रहा है।
किशाऊ में कितना पानी जमा होगा?
नई डीपीआर ने परियोजना की तस्वीर काफी बदल दी है। बांध की ऊंचाई घटाकर 232.6 मीटर की गई है, लेकिन जलाशय की जीवंत भंडारण क्षमता बढ़ाकर 1561.91 एमसीएम कर दी गई है। पहले यह क्षमता करीब 1324 एमसीएम थी। यानी नई व्यवस्था में लगभग 237.81 एमसीएम अतिरिक्त पानी संग्रहित किया जा सकेगा।
लीटर में समझें तो यह करीब 23,781 करोड़ लीटर अतिरिक्त पानी है। यही अतिरिक्त भंडारण मानसून के दौरान पानी को रोकने और गैर-मानसूनी महीनों में उसका इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाएगा।
किशाऊ के आंकड़े एक नजर में
बांध की ऊंचाई : 232.6 मीटर
जीवंत भंडारण क्षमता : 1561.91 एमसीएम
अतिरिक्त भंडारण : 237.81 एमसीएम
स्थापित बिजली क्षमता : 422 मेगावाट
औसत वार्षिक बिजली उत्पादन : 1457 मिलियन यूनिट
पुराने मुकाबले अतिरिक्त उत्पादन : 78 मिलियन यूनिट
प्रस्तावित सिंचाई क्षेत्र : लगभग 97,076 हेक्टेयर
एमओयू में राज्य : छह
