सर्जिकल स्ट्राइक के 10 साल: भारत का एक फैसला और पाकिस्तान के खिलाफ हमेशा के लिए बदल गए नियम
उड़ी हमले के 10 साल बाद भी सर्जिकल स्ट्राइक भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का आधार बनी हुई है। इस ...और पढ़ें

सर्जिकल स्ट्राइक के एक दशक (फाइल फोटो- रॉयटर्स)
HighLights
उड़ी हमले के 10 दिन बाद हुई थी सर्जिकल स्ट्राइक।
भारतीय सेना ने 82 आतंकियों को मार गिराया, कोई नुकसान नहीं।
यह कार्रवाई भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का आधार बनी।
जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। 18 सितंबर, 2016 को उड़ी सैन्य बेस पर आतंकी हमला देश की अंतरात्मा को झकझोर गया था। 19 जवानों के बलिदान ने पूरे देश को भीतर तक आहत किया। लेकिन इस बार सिर्फ गुस्सा और पीड़ा नहीं थी, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जवाब देने का संकल्प भी था।
दस दिन बाद भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर गुलाम जम्मू-कश्मीर में आतंकी लांचपैड को निशाना बनाकर सर्जिकल स्ट्राइक की।
इस घटना को 10 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन यह कार्रवाई सीमापार आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति में बड़े बदलाव का स्थायी आधार बन गई है। बालाकोट एयरस्ट्राइक तथा ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाइयां इसी सिद्धांत का विस्तारित रूप हैं।
उड़ी हमले से पहले भी भारत कई गंभीर आतंकी हमले झेल चुका था। यहां तक कि 2008 के मुंबई हमले के बाद भी भारत ने ऐसा कदम नहीं उठाया था। सितंबर 2016 की कार्रवाई ने स्पष्ट किया कि आतंकी हमले अब केवल निंदा, कूटनीतिक दबाव और डोजियर तक सीमित नहीं रहेंगे।
भारतीय सेना ने आतंकी लांचपैड को निशाना बनाकर उड़ी हमले का जवाब दिया। सुरक्षा विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की रणनीति में अहम मोड़ मानते हैं।
आईएएनएस के अनुसार, इस कार्रवाई का असर सिर्फ सीमा पार आतंकी ठिकानों तक सीमित नहीं रहा। लंबे समय तक आतंकी हमलों के बाद कुछ कर न पाने की कसक झेल रहे लोगों में आत्मविश्वास लौटा।
सुरक्षा बलों में भी यह भरोसा मजबूत हुआ कि अपने साथियों की शहादत का जवाब लेने के लिए कठोर फैसले किए जा सकते हैं। एक खुफिया अधिकारी के अनुसार, यदि आतंकी हमलों का जवाब मजबूती से न दिया जाए तो सुरक्षा बलों का मनोबल प्रभावित होता है।
हालांकि, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी पाकिस्तान ने आतंकवाद का रास्ता नहीं छोड़ा। कश्मीर घाटी में इसके बाद भी कई बड़े आतंकी हमले हुए, लेकिन भारत की जवाबी रणनीति बदल चुकी थी।
इसी क्रम में पुलवामा और पहलगाम हमलों के बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर को देखा गया। अधिकारियों के अनुसार, 2016 की कार्रवाई ने पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकी दुस्साहस का गंभीर परिणाम हो सकता है।
ऐसे हुई थी सर्जिकल स्ट्राइक
सर्जिकल स्ट्राइक में अहम भूमिका निभाने वाले सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र रामराव निंभोरकर के अनुसार, भारतीय सेना के पास ऐसी कार्रवाई करने की क्षमता पहले से थी, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व के स्पष्ट आदेश की जरूरत थी।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर कार्रवाई के दौरान किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार थे।
निंभोरकर उस समय नगरोटा स्थित 16 कोर (व्हाइट नाइट कोर) के जीओसी थे और राजौरी-पुंछ की दोहरी सीमा पर सर्जिकल स्ट्राइक की ऑपरेशनल तैयारी और रणनीतिक अमल में केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने बताया कि 28 सितंबर, 2016 को जवानों ने सीमा पार कर उड़ी, पुंछ और भिंबर सेक्टरों में 82 आतंकियों को मार गिराया और तड़के पांच बजे भारतीय क्षेत्र में दाखिल हो गए। अभियान में भारतीय पक्ष का कोई जवान घायल नहीं हुआ।
इसके लिए उधमपुर स्थित 9 पैरा (एसएफ) और 4 पैरा (एसएफ) की दो विशेष बल इकाइयों को जिम्मेदारी दी गई थी। निंभोरकर के अनुसार, अभियान की जानकारी देश में केवल 18 लोगों को थी। इनमें तीन वे अधिकारी भी शामिल थे जो ऑपरेशन में सबसे कनिष्ठ स्तर पर थे। अभियान पूरा करने के बाद जवान अगले दिन तड़के पांच बजे वापस लौटे।
