आगरा, जागरण संवाददाता। अलग ही समय था वो, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। दिन-रात छद्म रूप में दुश्मनों की टोह लेना, आक्रमण करना और अपने देश की सेना के लिए रास्ता साफ करना। घरवाले सुबह-शाम पूजा-पाठ में लगे रहते थे। टीवी पर हर खबर पर कान और आंख गड़ाए बैठे माता-पिता के जज्बात कोई नहीं समझ सकता।पर देश सेवा के आगे यह सब कुछ याद नहीं रहता। कारगिल युद्ध में पैराशूट रेजीमेंट के सेवानिवृत्त कर्नल जीएम खान खास मिशन में थे। युद्ध की बातें याद करते हुए आज भी वो उस भयावहता को महसूस करते हैं।

कर्नल जीएम खान ने बताया कि तीन महीने तक वे द्रास सेक्टर में थे।दिन-रात का होश नहीं था। गोला कहां आकर गिरेगा, यह पता ही नहीं चलता था। दुश्मन सेना ने लैंड माइंस बिछा दिए थे। आगरा में उस समय तैनात एक अधिकारी का लैंड माइन के कारण पैर उड़ गया था। वो समय ही अलग था। घरवालों से बात नहीं होती थी। बस संदेश भेज दिया जाता था कि सब ठीक है। केवल मौत ही सच थी। उस समय परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी और बेटी थी। सभी दुआ मांगते थे कि सभी सलामत रहें।

कर्नल जीएम खान ने संसद भवन पर हुए हमले के बाद 10 महीने भारत-पाकिस्तान की सीमा पर भी गुजारे थे। उन्हें जम्मू-कश्मीर के बांदीपुरा जिला में दो आतंकवादियों को मारने पर 2011 में वीरता पुरस्कार भी मिला था। कर्नल जीएम खान ने बताया कि यह पूरा आपरेशन छह दिन का था। छह दिन तक जंगल में एक ही पोजीशन में रहे थे। न खाने की सुध और न ही दैनिक क्रिया कलापों का होश। इस आपरेशन में आगरा के जवान हरेंद्र पांडे शहीद हुए थे।रात में शून्य से नीचे पारा रहता था तो दिन में धूप। जंगल में सांप और जानवरों के साथ आतंकवादियों पर नजर रखना भी एक चुनौती था। छह दिन सोए नहीं, मसूड़े तक सूज गए थे। 

Edited By: Tanu Gupta

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