अंबाला, जागरण संवाददाता। 1857 की क्रांति में अंबाला भूमिका को कोई नहीं भूल सकता है। उस दौर में मेरठ से पहले क्रांति अंबाला में शुरू हो गई थी। कारतूस का भारतीय सैनिकों ने जबरदस्त विरोध किया था।

पूरे देश में फैल गई थी विरोध की आग

बंगाल में बने इन कारतूसों को लेकर पहले बंगाल के बैरकपुर में मंगल पांडे ने विरोध किया। इसके बाद यह आग पूरे भारत में फैल गई, जबकि अंबाला भी इससे अछूता नहीं रहा। उस दौरान अंबाला में प्रशिक्षण के लिए दो सौ से अधिक सैनिक आए थे, जिन्होंने इसका विरोध किया था। उस दौरान भड़की चिंगारी को अंग्रेजों ने तो दबा दिया, लेकिन अंबाला से शुरू हुई यह क्रांति अंग्रेजों को भीतर तक हिला गई।

अंबाला की फायरिंग रेंज में दिया गया था प्रशिक्षण

मार्च से ही धीरे-धीरे अंबाला में सैनिकों ने विरोध करना शुरू कर दिया था। इन कारतूसों में काफी चिकनाई होती थी, और कारतूसों का इस्तेमाल इनफील्ड रायफलों में किया जाता था। भारतीय सैनिक इस में गाय अथवा सूअर की चर्बी होना मान रहे थे, जबकि इनको मुंह से खोलकर चलाया जाता था।

केमिकल जांच के बाद भी जवान नहीं माने

उन दिनों अंबाला में 60वीं, 5वीं और चौथी लांसर रेंजिमेंट के जवान तैनात थे, जो फायरिंग रेंज में प्रशिक्षण लेने आए थे। इन सभी ने कारतूसों को चलाने से इनकार कर दिया। करीब दो सौ सैनिक उक्त रेजिंमेंट से आए हुए थे। जब इन सैनिकों ने विरोध किया, तो तत्कालीन इंस्ट्रक्टर ने अपने उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी थी। इसके बाद केमिकल जांच भी हुई, लेकिन जवान नहीं माने।

हर रात अंग्रेज अफसरों के घरों को फूंक दिया जाता था

उन दिनों भारतीय सैनिक विद्रोह कर चुके थे और हर रात को अंग्रेज अफसरों के घरों को आग लगा देते थे। एक बार तो चर्च में घेरने की कोशिश की, लेकिन इसकी भनक अंग्रेजों को लग गई और इसे खाली ही छोड़ दिया। अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को घेर कर सरेंडर करवा लिया और कहा कि उनको माफ कर दिया जाएगा। लेकिन इसके विपरीत इन सभी को अंग्रेजों ने माैत के घाट उतार दिया।

Edited By: Anurag Shukla