कानपुर, [शिवा अवस्थी]। स्वाधीनता के लिए स्वाभिमानी परिवारों ने अपने लाडलों को भी लड़ाई में भेजने से परहेज नहीं किया। इन्हीं में से एक थे मूलरूप से कानपुर देहात के औनहां क्षेत्र के ग्राम करोम के कन्हैया लाल दीक्षित। उन्होंने अपने बेटे अवध बिहारी दीक्षित को सिर्फ इसलिए अंग्रेजी पढ़ाई कि वह अंग्रेजों की रणनीति समझकर क्रांतिकारियों से साझा कर सकें। 

अवध बिहारी ने भी इसे बखूबी अंजाम दिया और क्रांतिकारियों की मदद में डटे रहे। उन्हें एक साल तक जेल में भी रहना पड़ा, लेकिन पीछे नहीं हटे। स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान अवध बिहारी दीक्षित का परिवार चटाई मोहाल में रहता था।

उनके पिता कन्हैया लाल ने वर्ष 1935 में हाईस्कूल तक उन्हें पढ़ाया और अंग्रेजी सिखाई। इसके बाद अवध बिहारी पटकापुर, कुरसवां, पुराना कानपुर, मेस्टन रोड से लेकर बाकी जगहों पर क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की सूचनाएं पहुंचाने लगे।

1942 में जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया तो उन्होंने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया। जब उन्हें एक साल के लिए लखनऊ जेल भेजा जा रहा था तब उनकी पत्नी गर्भवती थीं, लेकिन देश के लिए उन्होंने कुछ भी परवाह नहीं की।

उनके पौत्र प्रशांत दीक्षित बताते हैं, वर्तमान में उनका परिवार लाजपतनगर में रह रहा है। बाबा का वर्ष 1997 में 76 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया।

कानपुर में ही खींची गई थी आजाद की मूछों को ताव देती तस्वीर

प्रशांत के मुताबिक, बाबा अवध बिहारी बताते थे कि चंद्रशेखर आजाद अक्सर कानपुर आते-जाते थे। उसी समय स्वतंत्रता सेनानी परिवार से जुड़ी एक महिला पत्रकार ने जब वह यहां आए तो उनकी मूछ ऐंठते हुए फोटो खींच ली। इस पर आजाद ने पिस्टल निकाल ली। बाद में उन्हें कसम दी गई कि लुंगी पहने यह फोटो कहीं प्रकाशित नहीं होगी। बाद में यही फोटो सबके सामने आई।

मनेथू के क्रांतिकारी रंगलाल ने 16 अंग्रेजों को मारा

कानपुर देहात के सरवनखेड़ा क्षेत्र के ग्राम मनेथू निवासी क्रांतिकारी रंगलाल शुक्ल ने 1857 की क्रांति में 16 अंग्रेजों को मारा था। वर्तमान में नौबस्ता के खाड़ेपुर में रह रहे डा. दीप कुमार शुक्ल के मुताबिक, पिता राम गोपाल शुक्ल बताते थे कि रंगलाल उनके परदादा थे।

उन्होंने शादी नहीं की थी। वह अंग्रेजी सेना में सिपाही थे। 1857 में वह गोंडा जिले की सकरौरा छावनी में तैनात थे। वहीं की अदालत में उनके खिलाफ यह मुकदमा भी चला था। अधिवक्ता डीएस मिश्र व जेएन मिश्र बताते हैं कि साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया था। उस समय उनकी आयु 29 साल की थी।

अदालती साक्ष्यों में उन्हें 10 जनवरी, 1860 को रिहाई मिलने की बात कही गई है। वहीं, कानपुर के नरवल क्षेत्र के पाल्हेपुर के ओमकारेश्वर पांडेय ने भी स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया। आचार्य निर्मल शास्त्री बताते हैं, उनके बाबा ने अंग्रेजों से लोहा लिया था, जिसमें उन्हें जेल जाना पड़ा था।

Edited By: Abhishek Agnihotri