आजादी के आंदोलनों का प्रमुख केंद्र हुआ करते थे गांधी आश्रम

----स्वाधीनता की गवाह हमारी धरोहर------

- ब्रिटिश हुकूमत ने कई बार गांधी आश्रमों को बंद करने का किया था प्रयास, लगाया जुर्माना

- राष्ट्र प्रेम, एकता, अखंडता की आज भी प्रेरित करते है गांधी आश्रम

चंद्रशेखर द्विवेदी, अल्मोड़ा

कुमाऊं में ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों के खिलाफ आंदोलन 1915 के बाद से शुरू हो गए थे। लेकिन आजादी के लिए राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना का प्रसार महात्मा गांधी के कुमाऊं प्रवास के बाद हुआ। उनकी यात्रा के बाद कुमाऊं में 26 से अधिक अलग-अलग जगहों पर गांधी आश्रम, कुटीर बनाए गए। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी आश्रम आंदोलन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। खुद अंग्रेज अधिकारियों ने माना कि जब तक यह गांधी आश्रम चल रहे हैं, उनका हुकूमत करना मुश्किल है। गोरों ने जुर्माना लगाया, प्रतिबंध किया लेकिन फिर भी गांधी आश्रम चलते रहे। आजादी के बाद भी महात्मा गांधी की स्मृति में बने आश्रम राष्ट्र प्रेम, देश की एकता, अखंडता की प्रेरणा दे रहे हैं।

रक्तहीन क्रांति कुली बेगार आंदोलन से महात्मा गांधी काफी प्रभावित हुए थे। यही कारण था कि सन् 1929 में कुमाऊं दौरा किया। कुमाऊं में महात्मा गांधी का प्रवास 14 जून 1929 से चार जुलाई 1929 तक रहा। 22 दिनों के प्रवास के दौरान उन्होंने 26 स्थानों पर जनसभाओं को संबोधित किया। जिन जगहों पर उन्होंने रात्रि विश्राम किया और जनसभाएं की, उनके जाने के बाद वह जगह गांधी आश्रम, कुटीर, गांधी स्मृति स्थल, गांधी चबूतरा, गांधी मार्ग के रूप में प्रसिद्ध हो गए। अल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल, हल्द्वानी सभी जगहों पर यह आज भी बने हुए हैं। राष्ट्रीय चेतना ऐसी की आश्रम बनाने के लिए लोगों ने अपनी जमीनें तक दान में दे दी। दूसरा कुमाऊं प्रवास मई 1931 में हुआ। लेकिन वह नैनीताल तक ही आए। महात्मा गांधी ने अपने प्रवास के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन की जो अलख जगाई, जो बाद में वह ज्वालामुखी बनकर फूटने लगी। यही गांधी स्मारक आंदोलन के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इन्हीं स्थानों पर जनसभाएं व आंदोलन की रणनीति बनती थी। लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एकजुट होने का आह्वान किया जाता था। गोरे सैनिकों की नजर भी इन्हीं जगहों पर अधिक रहती थी। यहां पर कोई भी सभा आदि करता तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता था। बोरारौ घाटी में गांधी आश्रम चनौदा में आंदोलनकारियों की सबसे अधिक सक्रियता थी। इसकी स्थापना 1937 में शांति लाल त्रिवेदी ने की। एक बार तो अल्मोड़ा के डिप्टी कमिश्नर ने कुमाऊं कमिश्नर को पत्र लिखा था कि जब तक यह आश्रम चालू है, इस क्षेत्र में ब्रिटिश हुकूमत चलना मुश्किल है। आज भी महात्मा गांधी की स्मृति में बनी यह धरोहर हमें प्रेरित करती है। जो भी इन जगहों पर जाता है वह राष्ट्रीय चेतना लेकर लौटता है।

Edited By: Jagran