नई दिल्ली [विवेक भटनागर]। प्रोफेशनल लाइफ हो या पर्सनल, यदि आप अपने काम या टास्क पर एकाग्र नहीं हैं, तो आपका जोश और जज्बा भी काम नहीं आता है। ऐसी स्थिति में आपसे तमाम गलतियां होती रहेंगी। संभव है कि आप उस टास्क को पूरा ही न कर पाएं। कोई भी कार्य सहज नहीं होता। उसे सहज हम ही अपने विवेक से बनाते हैं। हम उसमें सौ प्रतिशत ध्यान का निवेश करते हैं, तब हमारी एकाग्रता उस कार्य को सही ढंग से करने के रास्ते देती है।

एक कहानी है कि एक व्यक्ति की घड़ी खो गई। उसने पूरे घर में उसे छान मारा, लेकिन वह उसे नहीं ढूंढ़ सका। तब उसने बाहर खेल रहे कुछ लड़कों को घर में बुलाया और उन्हें घड़ी ढूंढ़ने के काम में लगा दिया कि जो भी खोई हुई घड़ी ढूंढ़कर देगा, उसे एक चॉकलेट मिलेगी। सारे बच्चे उत्साह, जोश और जज्बे के साथ काम पर लग गए। आधा घंटा हो गया, पर वे नहीं खोज पाए। तब उनमें से एक बच्चा ऐसा था, जिसमें सिर्फ उत्साह और जोश ही नहीं, बल्कि समझदारी भी थी, वह उस व्यक्ति से बोला-अगर वह घड़ी इसी कमरे में है, तो मैं उस घड़ी को ढूंढ़ सकता हूं, बशर्ते सभी को कमरे से बाहर जाना पड़ेगा। सभी को बाहर कर उसने भीतर से कमरे का दरवाजा बंद किया और पांच मिनट बाद उसने दरवाजा खोला, तो उसके हाथ में घड़ी थी।

उस व्यक्ति ने पूछा, जिस घड़ी को सभी लोग ढूंढ़-ढूंढ़ कर हार गए, उसे तुमने कैसे ढूंढ़ा? तो लड़के ने कहा- जब कमरे में शांति हो गई, तो मैं कमरे के बीच में एकाग्र होकर बैठ गया। धीरे-धीरे मुझे घड़ी की टिकटिक सुनाई देने लगी और मैंने देखा कि घड़ी अलमारी के पीछे पड़ी थी। उस लड़के ने घड़ी जोश से नहीं, बल्कि होश से ढूंढ़ी थी। उसने घड़ी एकाग्रता से ढूंढ़ी थी। इसी प्रकार आम जीवन में हमें जो भी टास्क मिलते हैं, उनको लेकर हम उत्साहित तो बहुत हो जाते हैं, लेकिन उस होश और एकाग्रता को भूल जाते हैं, जिसकी उस टास्क को पूरा करने में सबसे बड़ी भूमिका है। अत: जब भी आप कोई कार्य करें, तो इस बात का ख्याल रखें कि आपकी एकाग्रता उस काम में कितनी है।

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